समाज को अपार क्षति पहुँचाते हैं आर्थिक व परीक्षा घोटाले
| Dr. S.K. Raina - Mar 30 2018 2:53PM

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा/ किसी भी परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनने से लेकर प्रश्नपत्र वितरण तक की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुज़रती है। प्रश्नपत्र बनाने वाले की नियुक्ति, प्रेस में पूर्ण गोपनीयता के साथ प्रश्नपत्र का मुद्रण, प्रश्नपत्रों की पैकिंग, परीक्षा-केन्द्रों तक मुद्रित प्रश्नपत्रों के पैकेट्स की समय पर रवानगी आदि-आदि। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सारा काम अतीव गोपनीयता, परस्पर-विश्वास और समय की पाबन्दी मांगता है। समय पर और निर्विघ्न परीक्षा करवाना परीक्षा-प्रभारी के लिए हमेशा चुनौता-भरा काम होता है। चूंकि पूरी प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है, इसलिए कई व्यक्ति इस काम से जुड़े रहते हैं।

यों, किसी भी परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनाने वाले वाले परीक्षक वरिष्ठ और अपने-अपने क्षेत्र के अनुभवी विद्वान-शिक्षक होते हैं। परीक्षा-नियंत्रक ऐसे योग्य/विद्वान शिक्षकों की सूची तैयार करता है और उसी में से पेपर-सेटर आदि चयनित होते हैं।प्रसाशन मानकर चलता है कि ये चयनित विद्वान परम विश्वसनीय महानुभाव हैं। अगर बाद में यही भद्रजन किसी प्रलोभन के कारण बेईमानी पर उतर आएं तो समूचे परीक्षा-तंत्र पर बट्टा लगना स्वभाविक है।

परीक्षा-नियंत्रक की हज़ार आंखें तो हैं नहीं जो सब जगह नज़र घुमाता फिरे। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ कभी-कभी परीक्षा-नियत्रक के अधीन काम करने वाले ‘गोपनीय-प्रकोष्ठ’ के कर्मचारी भी प्रलोभन के मारे पेपर-लीक कराने में पीछे नहीं रहे हैं। दरअसल, विश्वासघात की भावना और नैतिक मूल्यों में गिरावट ने हमारे समाज को हमेशा अपार क्षति पहुंचाई है। चाहे वे आर्थिक घोटाले हों या फिर परीक्षा-घोटाले।



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