लोकतंत्र की आड में बिखरता सुनहरा भविष्य!
| -Jagjeet Sharma - Apr 3 2018 2:41PM

-जगजीत शर्मा/ भारत के लोकतंत्र को समझने से पहले लोकतंत्र शब्द का अर्थ और इसकी शुरआत कैसे हुई ये समझ लेना जरूरी है। लोकतंत्र शब्द अपने आप में पूर्ण है। लोकतंत्र  का अर्थ है एक ऐसा तंत्र/व्यवस्था/प्रणाली जिस पर आम जनता का हक¸ हो। अब्राहम लिंकन के शब्दों में लोकतंत्र का मतलब है जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन । लोकतंत्र के शुरुआत सबसे पहले एथेंस (ग्रीस) में 508-507 ई. पूर्व हुई थी। क्लेस्थेनेस को एथेंस के लोकतंत्र का पिता माना जाता है। 18वीं सदी के शुरुआत में जब मुग़लों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी और औरंगजेब के बाद बहादुर शाह के हाथों से शासन फिसलता जा रहा था और देश छोटे छोटे राजाओं और निज़ामों के हाथ में आ गया था उसी वक्त ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने व्यापर के बहाने से इन निज़ामों और राजाओं के आपसी दुश्मनी का फायदा उठाते हुए धीरे-धीरे पूरे देश को अपने कब्जे में ले लिए था। 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद ब्रिटेन की महरानी ने भारत की बागडोर अपने हाथ में ले ली और ये शिलशिला चलता रहा। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व में दो तरह की शासन व्यस्था जोरों पर थी, एक क युनिस्ट और दूसरा लोकतंत्र। जहाँ उद्योगों का विकास तेजी से हुआ और श्रमिकों के साथ अत्याचार ज्यादा हुए वहां क युनिस्ट की पकड़ मजबूत हुई और जहाँ राजतन्त्र के कारण जनता ज्यादा त्रस्त  थी, वहां लोकतंत्र की पकड़ मजबूत हुई। ब्रिटेन में भी लोकतंत्र आ गया था, यूँ तो ब्रिटेन में लोकतंत्र की शुरुआत 15  जून 1215  में  ही रू्रत्रहृ्र  ष्ट्रक्रभ््र  के रूप में हो गई थे जिसमे जनता को कुछ मौलिक अधिकार दे दिए गए थे ।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद  ब्रिटेन  की आर्थिक हालत ख़राब होने लगी थी। अतः भारत पर ब्रिटिश  हुकूमत होने के कारण यहाँ भी लोकतंत्र की नींव रखी जाने लगी। 1935 ई. में भारत सरकार अधिनियम लाया गया जिसके तहत भारत में लोकतंत्र की स्थापना की शुरुआत की गई। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की हालत और ज्यादा ख़राब होने लगी और अंततः भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ाद कर दिया गया लेकिन आज़ादी से पहले ही देश में सियासी ज़हर घोल दिया गया और देश को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर दो भाग में बाँट दिया गया। सियासत के गलियारों में सभी को अपनी कद और कुर्सी की पड़ी थी किसी ने आम जनता का नहीं सोचा । जिस देश में लोकतंत्र की शुरआत ही जनता  की लाशों पर हुई उस देश को तो आगे न जाने और क्या देखने थे । नेताओं को अपनी मर्जी से जो करना था किया। देश के बंटवारे में लाखों लोगों की जाने गईं, जिसका दर्द आज भी हरा है और हम आज भी अपने पडोसी देश के साथ रिश्ते सही नहीं कर पाए। बंटवारे के बाद से ही सियासी गलियारे में तुष्टिकरण की निति दिखने लगी थी ।
लोकतंत्र को सुचारु रूप से चलाने के 26 जनवरी 1950 को देश का अपना संविधान मिला। वो अलग बात है इस संविधान का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ही लिया गया और बाकि दूसरे देशों से लिया गया जिसमें दूसरे देश जैसे अमेरिका, आयरलैंड ,रसिया आदि से लिया गया जो की हमारे देश से बहुत पहले ही आज़ाद हो चुके थे और वहां की जनता अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक थी क्यूंकि वहां एजुकेशन पर ज्यादा जोर दिया गया था। पर अपने देश में एजुकेशन को वरीयता सूचि में ही नहीं रखा गया। संविधान में जनता को सारे अधिकार दिए गए जो एक लोकतंत्र के लिए जरुरी हैं पर उनको जनता तक पहुँचाया ही नहीं गया। यही तो भारत के लोकतंत्र की पहचान है। खैर, भारत का लोकतंत्र अपनी पटरी पर चल रहा था। 1952 में पहला लोकतंत्र का चुनाव हुआ कांग्रेस भारी मतों से जीती क्यूंकि उस समय और कोई पार्टी की पकड़ नहीं थी । ये सिलसिला यूं ही चलता रहा। इस बिच कई पंचवर्षीय योजनाएं आयीं जिसमे कुछ को अमली-जमा पहनाया गया कुछ सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गए। लोकतंत्र 1964 तक तो स्थिर बना रहा। 1964 में नेहरू जी निधन के बाद 13 दिन के लिए गुलजारी नंदा को प्रधानमंत्री बनाया गया फिर लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी अचानक 1966 में ताशकंद में मृत्यु के बाद गुलजारी नंदा एक बार फिर 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बनाये गए। अभी तक तो सब ठीक चल रहा था पर 1966 में श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं और उसके बाद भारत के लोकतंत्र में बहुत तेजी से बदलाव आने शुरू हो गए । 1971 में पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश का निर्माण कराया गया। सरकर ने  ऐसे फैसले लिए जिससे आम जनता में एक रोस पैदा होने लगा और उसे नाम दिया गया एंटी-इंकबेंसी। 1975  आते-आते देश में रोस इतना बढ़ गया था की सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र की हत्या कर दी गई और देश में इमरजेंसी लगा दी गई। 1976 में संविधान में 42वां संशोधन किया गया जिसे द्वद्बठ्ठद्ब  ष्शठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वद्गठ्ठष्4 भी बोलते हैं । और सरकार के विरोध में उठने वाली हर आवाज को दबाया जाने लगा । 1977 में जनता पार्टी के नेतृत्व में एक नई सरकार बनीं और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने । लोगों को लगा कि यह सरकार आम जानत के हित में कार्य करेगी पर जिस तरह एक तराजू में 4 मेंढ़क को एक साथ नहीं तौल सकते हैं उसी तरह से अलग-अलग स्वार्थ और मत के कारण 2 साल बाद ही चरण सिंह प्रधान मंत्री बने । पर स्वार्थ की राजनीती के कारण 1980 में फिर से चुनाव हुआ और फिर से इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं । लोकतंत्र के नाम पर जनता और देश को किसी भी तरह बेवकूफ बनाकर कुर्सी पाने की जोड़-तोड़ अब बहुत तेजी से चल रही थी। उधर पंजाब में खालिस्तान का मांग उठने लगी और अपने फायदे के लिए बनाये गए संगठन ने ही बगावत कर दी तथा गोल्डन टे पल ( स्वर्ण मंदिर ) अमृतसर पर कब्ज़ा कर लिया गया। इसके लिए 1 जून  से 8 जून 1984 तक ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार’ चलाया गया । ये पहली बार था जब धर्म के नाम पर राजनीति खुलकर शुरू हो गई थी । इसका नतीजा ये हुआ कि 30 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की उन्ही के सुरक्षा कर्मी ने गोली मारकर हत्या कर दी । इसके बाद राजीव गाँधी जी को प्रधानमंत्री बनाया गया। इसी बीच 1980 के दशक में विश्व हिन्दू परिषद् और हिन्दू नेशनलिस्ट नामक दो संगठन ने राम जन्म भूमि की मांग तेज कर दी और कौन जनता था कि ये मांग भारत के लोकतंत्र में एक दिन इस देश की राजनीति का सबसे अहम् मुद्दा बन जायेगा। देश की जनता और हिन्दू को खुश करने के लिए राजीव सरकार ने हिन्दुओं को पूजा करने की अनुमति दे दी ।
उधर श्रीलंका  में लिट्टे नमक संगठन सरकार पलटने की पूरी कोशिश कर रहा था। बहरत सरकार श्रीलंका सरकार का साथ दे रही थी। 1987 में देश का सबसे बड़ा घोटाला बोफोर्स तोप सामने आया। इस घोटाले ने तो भारत के लोकतंत्र की दिशा और दशा ही बदल दी। इस घोटाले के कारण 1984 में जिस कांग्रेस को 404 सीट मिलीं थी वो 1989 के आम चुनाव में हार गई। भारत के लोकतंत्र के इतिहास में मिली-जुली सरकार का एक नए अध्याय की शुरुआत हुई । बहरहाल वी.पी सिंह को प्रधान मंत्री बनाया गया पर एक साल में ही उन्हें हटाकर चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाया गया। 2 साल में ही आपसी स्वार्थ और राजनैतिक फायदे के कारण सरकार अल्पमत में आ गई और लोकसभा का विघटन कर दिया गया । इस घटना ने भारत के लोकतंत्र को एक नया मोड़ दिया । अब तक हम ये जानते थे कि जिसके पास बहुमत होगा सरकार उसी की बनेगी पर भारत के लोकतंत्र में अब ऐसा नहीं था अब तो किसी को भी सीट ज्यादा मिली हो कोई फर्क नहीं पड़ता है अब तो जोड़-तोड़ करके कुर्सी और सत्ता चाहिए ।
दुनियां के किसी भी देश में जहाँ लोकतंत्र है वहां ऐसा नहीं होता। यहाँ का लोकतंत्र धर्म, जाती के नाम पर चलता है । देश की आज़ादी से लेकर आज तक एजुकेशन पर कभी जोर नहीं दिया गया । दूसरे अधिकांश देशों में जहाँ सरकार झुंड बच्चों के पढाई की जि मेदारी लेती है वहीँ हमे एजुकेशन के नाम पर अलग से टैक्स देना पड़ता है पर मिलता कुछ नहीं। 1991 में पी.वी नरसि हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस और गठबंधन की सरकार बनीं । बहुमत जुटाने के चक्कर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदने का मामला सामने आया और एक बार फिर जनता के वोटों का अपमान करते हुए लोकतंत्र की हत्या हो गई । भारत के लोकतंत्र पर  क्षेत्रीय पार्टियों का हावी होना अब शुरू हो गया था । 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद तो राम मंदिर भारत के लोकतंत्र का सबसे ज्वलंत मुद्दा बन गया । 1996 से 1998 तक भारत के लोकतंत्र की हालत खस्ता होने लगी थी । दिल्ली की गद्दी पर क्षेत्रीय पार्टी का बोलबाला होने लगा। 10-10, 20-20 सीट लेकर लोग सरकार बनाने का दवा करने लगे थे। फिर सरकार चाहे भारतीय जनता पार्टी की हो या कांग्रेस की या थर्ड फ्रंट की सभी को क्षेत्रीय पार्टियों का सपोर्ट चाहिए। राज्यों में अपनी सरकार बनाने के लिए भी सीटों की जोड़-तोड़ शुरू हो गई। लोकतंत्र और संविधान को तोड़-मरोड़ कर सिर्फ अपनी कुर्सी और अपनी सत्ता चाहिए नेताओं के लिए बस यही एक मात्र मकसद रह गया । जनता के बारे में या उनके मतों का कोई मोल नहीं रह गया ।
इस बीच बिहार ने एक अलग ही इतिहास रच दिया था। बिहार में उन दिनों लालू प्रसाद के नेतृत्व में क्रछ्वष्ठ का शासन था । लालू यादव को करीब 900 करोड़ के चारा घोटाला के आरोप के कारण मु यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मु यमंत्री बना दिया । भारत के लोकतंत्र में ये रिमोट कंट्रोल की सरकार का नया अध्याय जुड़ गया । 1998 से 2004 तक दिल्ली में अटल जी के नेतृत्व में सरकार रही । 2002 में गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए और जान-माल का काफी नुकसान हुआ इसे भी राजनीति और भारत के लोकतंत्र का एक अहम् मुद्दा बनाया गया। 2004 में बीजेपी के स्नश्वश्वरु त्रह्रह्रष्ठ अवधारणा को जनता ने नहीं सुना और बीजेपी आम चुनाव हार गई । 2004 में फिर से कांग्रेस और गठबंधन की जीत हुई । भारत के लोकतंत्र में एक और अध्याय जुड़ा कि विदेशी मूल के नागरिक को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे, जब सोनिया गाँधी को प्रधान मंत्री बनाने की बात उठी तो विपक्ष में बैठी उमा भर्ती और सुषमा स्वराज ने इसके विरोध में  अपने सर मुंडवाने की धमकी दे दी। 2004 से 2014  तक मनमोहन सिंह (जिन्हे जनता ने कभी चुनाव में नहीं जिताया) के नेतृत्व में कांग्रेस और गठबंधन की सरकार रही। और ऐसा माना जाता है की लालू जी की तरह ही प्रधान मंत्री जरूर मनमोहन जी रहे पर कंट्रोल गाँधी फैमिली के पास ही था ।
लोकतंत्र की हत्या संविधान के अनुच्छेदों का हवाल देकर कैसी की गई है इसके कुछ उदहारण आपको हतप्रभ कर देंगे। भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इंदिरा गाँधी के ज़माने से सरकार में मंत्री रहे पर कभी चुनाव नहीं जीते, हर बार राज्य सभा का सदस्य बनाये गए। मनमोहन सिंह दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्ति्रक देश का प्रधानमंत्री कभी चुनाव लड़कर लोकसभा में नहीं पहुंच पाए। मौजूदा सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली जी को तो जनता ने हरा दिया था फिर भी उन्हें राज्य सभा का सदस्य बनाकर वित्त मंत्री बना दिया गया । स्मृति ईरानी को भी जनता ने हरा दिया फिर भी मंत्री हैं । अब इसे संविधान के अनुच्छेद 80 का गलत फायदा उठाना बोलिये या जनमत/लोकतंत्र की हत्या?
हमारे संविधान में लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्त भों का उल्लेख किया गया है - विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका । पर भारत के लोकतंत्र में विधायिका बाकि दोनों स्तंभों पर हावी रहती है । इसका बहुत सटीक उदाहरण आपको के. एम नानावटी 1ह्य महाराष्ट्र सरकार केस में दिख जाएगी। इस केस के बाद भारत के न्यायपालिका से जूरी सिस्टम ख़त्म हो गया । ये कोई इकलौता उदहारण नहीं है। कोई केस जिसमे कोई राजनीतिक दल से स बंधित कोई व्यक्ति हो उसका इस्तेमाल राजनितिक फायदे के लिए करना यहाँ आम धरना बन गई है । उस देश का लोकतंत्र और न्यायपालिका पर राजनितिक दबाव का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि लगभग हर दूसरा राजनेता पर एक आपराधिक मामला चल रहा है । यहाँ राजनेता को किसी केस में सजा होना राजनितिक बदला माना जाता है जबकि दूसरे देशों में इसे न्यायपालिका का निर्णय माना जाता है । हमारे देश में जहाँ गरीब के केस की 6 महीने तक सुनवाई नहीं होती वहीं राजनेता और राजनैतिक प्रभाव वाले लोगों की जमानत 10 मिनट के अंदर हो जाती है। उदाहरण के लिए सलमान खान के हिट एंड रन केस हो या दलेर मेहंदी के कबूतरबाज़ी का केस हो, सजा सुनाने में वर्षों लग गए पर छूटने में मात्र 10 मिनट ही लगे ।
इतना ही नहीं भारत के लोकतंत्र में आतंकियों को भी 10- 10 साल तक अपने फायदे के लिए फांसी नहीं दी जाती है। लोकतंत्र की की हत्या उस दिन भी हुई जिस दिन एक आतंकी को बचाने के लिए कुछ तुष्टिकारक दल हस्ताक्षर अभियान छेड़ते हुए नजर आए और आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खोलना पड़ता है । जबकि अपना पडोसी देश में 6 महीने के अंदर सजा भी सुना दी जाती है और तुरंत फांसी भी दे दी जाती है । यहाँ अç ाव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देश विरोधी नारे को भी अपने राजनैतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है । क्या यही है हमारा लोकतंत्र? क्या इसी लोकतंत्र के सहारे हम हिन्दुस्तान के सुनहरी भविष्य की कल्पना करे हुए बैठे हैं, यह सोचने विषय है।



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