अस्मा जहांगीर : खामोश शहर में बगावत का चिराग
| -Javed Anis - Apr 5 2018 11:37AM

-जावेद अनीस/ दक्षिण एशिया की मशहूर मानवअधिकार कार्यकर्ता अस्मा जहांगीर का 66 साल की उम्र में देहांत हो गया है. उनकी मौत पाकिस्तान के लिबरल और लोकतंत्रवादियों के लिए बहुत बड़ा धक्का है. उनके अचानक मौत से पाकिस्तान के लिबरल सदमे में है, आखिर उनके बिरादरी की सबसे बुलंद आवाज जो चली गयी है. वो एक निडर और बेबाक औरत थी और जिंदगी भर बगावती ही बनीं रहीं जिसकी उन्हें कई बार कीमत भी चुकानी पड़ी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी भी हथियार नहीं डाला.

अस्मा जहांगीर की कहानी असाधारण हैं, वो जब 21 साल की थी और कानून की पढाई कर रही थीं तो उनके पिता मालिक जिलानी को सैनिक तानाशाही का विरोध करने के चलते जनरल याह्या खान ने जेल में डाल दिया था. वो अपने पिता की रिहाई के लिए पाकिस्तान के कई बड़े वकीलों के पास गयीं लेकिन सभी ने जनरल याह्या के खौफ से उनका केस लेने से इनकार कर दिया. जिसके बाद उस कम उम्र लड़की ने अदालत से दरखास्त की कि वह अपने पिता का केस खुद लड़ेगी और फिर शुरू होता है अस्मा जहांगीर के बनने की कहानी. वो केस जीत जाती है फिर न केवल वो अपने पिता को ही रिहा करती हैं बल्कि पाकिस्तान में लागू डिक्टेटरशीप को अदालत से असंवैधनिक दिलवाने में भी कामयाब होती हैं. बाद में अदालत के इसी फैसले की वजह से ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को भी सिविल मार्शल ला ख़त्म करना पड़ा था.

पाकिस्तान की ये बहादुर बेटी अपने जीवन भर सत्ताधारीयों और डिक्टेटरों से लोहा लेती रही. जब वे किशोरी ही थी तो अयूब खान और याह्या खान के खिलाफ लड़ीं, जवान हुई तो ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के खिलाफ भी खड़ी हुयीं और जनरल जियाउल हक के खिलाफ तो उन्होंने जम कर लोहा लिया था. बेनजीर भुट्टो उनकी बचपन की सहेली थीं लेकिन वे बेनजीर के खिलाफ भी लड़ीं. उन्होंने नवाज़ शरीफ़ को भी चैलेंज किया और परवेज मुशर्रफ के लिए तो वे एक बुरे सपने की तरह थीं. ताउम्र वे अपने देश के अल्पसंख्यकों, औरतों, गरीबों, मजलूमों और बेआवाजों की आवाज बनीं रहीं, पाकिस्तान में बलूचों और मुजहिरों के पक्ष में जितना अस्मा जहागीर खड़ी हुयीं उतना कोई नहीं खड़ा हुआ और इसके बदले उम्र भर उन्हें देशद्रोही, गद्दार, इस्लाम मुखालिफ होने का ताना सहना पड़ा.

इन्साफ और कानून के लिए उनकी प्रतिबद्धता बहुत ठोस थी. उनके अपने उसूल थे जिनके आगे वो किसी की भी नहीं सुनती थीं. वे उन दुर्लभ लोगों में शामिल थीं जो ताकत के सामने हमेशा सच्ची बात कहते थे. उनकी दिलेरी की मिसालें लम्बे समय तक दी जायेगी, पाकिस्तान का बड़े से बड़ा सियासतदान फ़ौज और जरनैलों के खिलाफ बोलने से घबराता है लेकिन वे याह्या खान से लेकर परवेज मुशर्रफ तक को उनके मार्शल लॉ के दौरान ही ललकारती रहीं. ये अस्मा जहागीर ही थीं जो पाकिस्तान में टेलीविजन में बैठ कर जनरलों को “डफर” कह सकती थीं. वे पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली महिला अध्यक्ष थी, वैसे तो उनके द्वारा किये गए कामों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है लेकिन उन्हें विशेष रूप से पाकिस्तान में मानव अधिकार से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए याद किया जाएगा. एक तरह से वो पहली महिला थीं जिन्होंने पाकिस्तान का इस बात से परिचय कराया कि मानव अधिकार क्या होते हैं. ऐसा कहा जाता था कि पाकिस्तान में जिसको सरकार की तरफ से संरक्षण नहीं मिलता उसका बचाव अस्मा जहागीर करती थीं. यहाँ तक की कई बार जब उनके विरोधी मुश्किल में फंसते थे तो वो उनके हक़ में भी आवाज उठती नजर आती थीं.

1986 में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर ह्युमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान की स्थापना की जिसका पाकिस्तान में मानव अधिकार से जुड़े मुद्दों को सामने लाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उनका दृढ़ विश्वास था कि सभी के साथ कानून के मुताबिक सलूक होना चाहिए फिर चाहे वो किसी भी मजहब या पंथ का मानने वाला हो.   
एक समय पाकिस्तान में ऐसा कानून था कि कोई औरत अपने मर्जी से शादी नहीं कर सकती थी. पाकिस्तान का संविधान कहता था कि औरत की शादी के लिए उसकी मर्जी हो न हो लेकिन उसके सरपरस्तों की मर्जी जरुरी है, अस्मा इसके खिलाफ भी लड़ीं और अंततः उन्होंने पाकिस्तान की औरतों को अदालत से यह हक़ दिलावाया कि अब वो अपने मर्जी से कहीं भी शादी कर सकती हैं. लेकिन उनके तमाम योगदानों के बावजूद ये भी हकीकत है कि पाकिस्तान की अक्सरियत अस्मा जहागीर को नापसंद करती थीं. इसके कई कारण थे उनका एक कादियानी से शादी कर लेना, लिबरल होना, कट्टरवाद के खिलाफ खड़े रहना, फ़ौज के खिलाफ खुलेआम बोलना और ये कहना कि फ़ौज की वजह से भारत और पाकिस्तान में शान्ति नहीं है.

जिंदगी भर उनके खिलाफ नफरत और प्रोपेगेंडा भरी बातें की गयीं. मरने के बाद भी उन्हें इससे छुटकारा नहीं मिल सका. पाकिस्तान के राजनीतिक टिप्पणीकार ज़ैद हामिद ने अपने फेसबुक पर अस्मा जहागीर के मौत के बाद लिखा कि भारत ने आज अपना सबसे कीमती समर्थक गंवा दिया है जबकि पाकिस्तान ने एक गद्दार से निजात हासिल कर ली....उन्होंने आगे लिखा कि अपनी पूरी जिंदगी अस्मा जहागीर इस्लाम, पाकिस्तान और उसके फ़ौज के खिलाफ संघर्ष करती रही हैं. अल्लाह का शुक्र है कि एक बड़े दुश्मन का ख़ात्मा हो गया है. उनका आखिरी सफ़र भी रवायतों को तोड़ने वाला रहा उनके अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में औरतें शामिल थीं औरतों ने उनके मय्यत को कंधा दिया और उनके जनाजे की नमाज को औरतों और मर्दों ने एक साथ पढ़ा. उनके जनाजे में औरतों की इतनी बड़ी संख्या में शिरकत, एक ही जगह पर सफबंदी और औरतों का उन्हें कंधा देना नयी रिवायतों की तरह है जो पहले पाकिस्तान में किसी महिला के जनाजे में नहीं हुआ और सिर्फ अस्मा जहांगीर के जनाजे में ही संभव था. दूसरे ख़सूसियत इसी तरह से उनके जनाने में विभन्न धर्मों और मसलक के लोगों की भागीदारी रही, वहां हिन्दू, सिख और ईसाई मजहब के लोग तो थे ही साथ ही इसमें मुसलमानों के सभी फिरकों के लोग भी शामिल हुये.  

अस्मा जहांगीर ताउम्र अपने मुल्क को सेक्युलर, लिबरल और लोकतांत्रिक बनाने के जद्दोजहद में लगी रहीं, पाकिस्तान में अस्मा के बाद अब उन जैसा दूर दूर तक कोई दूसरा नजर नहीं आता है. एक और अस्मा जहांगीर नामुमकिन है लेकिन उम्मीद है कि उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया जाएगा. उस दिन कराची में चल रहे पुस्तक मेले में भारत-पाकिस्तान के बीच अमन को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन शुरू ही होने वाला था तभी वहां अस्मा जहांगीर के मौत की खबर पहुंचती है जिससे माहौल में मातम पसर गया जिसके बाद वहां मौजूद किश्वर नाहिद ने अस्मा जहांगीर पर लिखी अपनी नज्म पढ़कर उन्हें श्रद्धांजली दी.

किश्वर नाहिद की नज्म

दुनिया सोचती थी और हैरान होती थी
क्या कभी दरांती (हसिया) से घास काटती औरत
आसमान में सितारा बन कर चमकेगी
क्या ये कभी होगा कि अंगूठा लगा कर अपना हक़ दे देने वाली औरत
दुनिया के सामने अपना हक़ मांगेगी
वो मनहनी (टेढ़ी रेखा ) सी औरत अस्मा जहांगीर
जिसने हुक्मरानों को ललकारा हो
जिसकी एक आवाज पर बांदी बनी औरतें हों
या ईटो के भट्टो पर गुलाम दर गुलाम खानदान हों
ऐसे खिंचे चले आएं,जैसे रक्स करती हुई हवा
जैसे झूमती टहनियां, जैसी खुशबू फैलाती बहार
वो सलीब से भी इन्साफ के तराजू को उतरवा लेती थी
जमीन पर राज करते हुए खुदाओं को ललकारती
बेड़ियों को पाजेब में बदल देती
ताजेज ( सुदृढ़ ) सियासत के परदे चाक करती
वाज़ों (धर्म उपदेशकों) और फतवाफरोशों को बेनकाब करती
खज़ा जदा (मुरझाये) चेहरों को बहारें पहनाती



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