बेटियाँ चीख रहीं हैं....बेटियों को बचाओ
| Rainbow News - Apr 7 2018 12:37PM

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने महज तीन दिन पहले बाराबंकी के असंदरा थाने की बलात्कार पीड़ित महिला ने दो साल से पुलिस और प्रशासन में सुनवाई न होने के विरोध में खुद को आग के हवाले कर दिया| उसे 40 फीसदी झुलसी हालत में अस्पताल पहुंचाया गया| ऐसे ही वाराणसी एयरपोर्ट पर कार्यरत युवती से दो दिन पहले एक होटल में गैंग रेप किया गया, घटनाएं और भी हैं, जो अखबारों में छपे अक्षरों के बीच चीख-चीख कर बेटियों की पीड़ा जाहिर कर रही हैं| सच तो यह है कि अपराध की खौफनाक रक्तरंजित सड़कों पर इधर महिला अपराधों की संख्या में ख़ासा इजाफा हुआ है, कहीं-कहीं की घटनाएँ तो मानवता को भी शर्मसार कर देती हैं. सबसे अव्वल आंकड़े महिला अपराधों के हैं, तो वो यूपी के हैं| साल २०१६ में महिलाओं के खिलाफ हत्या और दुष्कर्म के ४९,२६२ मामले दर्ज किये गये. आज चाहें तो आधुकनिकता की दौड़ में शामिल होने के लिए या घर के पालन पोषण के लिए घर से बाहर निकली औरत कतई सुरक्षित नही है.

हद तो ये कि दिल्ली में महिला मंत्री स्मृति ईरानी तक को अपने को शोहदों से बचाने के लिए पुलिस से गुहार लगानी पड़ी| आये दिन ऐसी घटनाएँ देखने सुनने पढने को मिल ही जाती हैं. कहीं महिला अपने कार्यालय में ही शोषित होती है, तो कहीं स्कूल में शिक्षक उसका शोषण करते हैं, तो कहीं रास्ते पर. प्रतापगढ़ की एक घटना में एक युवती के साथ दुष्कर्म करने का विरोध करने पर चार दरिंदों ने युवती को पीट-पीट कर मार डाला. इसी तरह की एक घटना और है जहाँ गर्भवती युवती से दुष्कर्म किया गया और बाद में उसे बेचने की कोशिश की गई. स्कूल आती जाती बच्चियों को हर समय मनचलों का भी डर रहता है. आजकल कुछ घटनाएँ ऐसी सुनने में आ रहीं हैं की लडकियों ने मनचलों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. ये मनचले अभद्रता और दबंगई की हदें पार कर देते हैं यहाँ तक् कि हत्या भी करने से नही चूकते हैं कई शहरों, गांवों में इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ देखने सुनने में आईं हैं.

कई घटनाएँ तो व्यक्ति के रोंगटे खड़े कर देती है जब सुनने में आता है कि आठ महीने, दो साल की बच्चियों से हैवानियत की गई है. किशोरियों के साथ दुष्कर्म करने के बाद उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. कहीं धमकी दे जाती है कि उनके खिलाफ केस न दर्ज करें और अक्सर तो मार ही डाली जाती हैं. दुष्कर्म का ये सिलसिला साधू संतों द्वारा करना कोई नई बात नही है. मथुरा में भागवत सिखाने के नाम पर लाई गई लडकियों का शोषण किया गया, भगवताचार्य ने नहाते समय लडकियों का वीडियो बना लिया और उसे वायरल कर देने की धमकी देकर उनके साथ दुष्कर्म करता रहा . इसी तरह लखनऊ के यासीनगंज में एक मदरसे से छुड़ाई गई लडकियों की कहानी, मदरसा मैनेजर अक्सर लडकियों को बुलाकर दरिंदगी किया करता था और शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी देता था.बाबाओं और शोहदों के बाद लडकियों के शोषण में जनप्रतिनिधियों का हाथ भी कम नही है इस समय देश में ३ ऐसे सांसद और ४८ विधायक हैं, जिन पर महिलाओं के यौन शोषण का मामला चल रहा है.

इनमे सबसे ज्यादा १४ जनप्रतिनिधि भाजपा के हैं और ७ शिवसेना के. तृणमूल कांग्रेस के ६ कांग्रेस और टीडीपी के ५-५, बीजू जनतादल के ४, जेएमएम, आरजेडी और डीएमके के २-२ सीपीएम के १ और निर्दलीय के ३ जनप्रतिनिधियों पर शोषण के मामले चल रहे हैं और इन लोगों ने चुनाव लड़ते वक्त शपथ पत्र में खुद ही इस बात को कबूल भी किया है. कुछ समय पहले हरियाणा में सामूहिक बलात्कार की घटना जो रोंगटे खड़े कर देने वाली है जिससे यह एहसास भी होता है कि लिंगानुपात में राज्य की स्तिथि सुधरने और निर्भया कांड के बाद कड़े कानून बनने के बावजूद महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं. सबसे तकलीफदेह स्तिथि तब होती है जब पुलिस सहयोग नही करती है. लडकी को रेप -  एसिड की धमकी मिलती है और पुलिस कहती है कि जब घटना हो तब आना. दुखद यह भी है कि उनके अपने ही विभाग की दुष्कर्म पीड़िता कांस्टेबल को अपने ही विभाग में न्याय का मोहताज होना पड़ता है. कई बार तो पुलिस खुद ही इस तरह की घटनाओ को अंजाम दे देती है. तो फिर न्याय की गुहार लगाये तो कहाँ लगाये ? कुल मिला कर यह कहने में कोई हिचक नहीं कि पूरे देश में बेटियाँ चीख रहीं हैं कि बेटियों को बचाओ|

कुछ समय पहले बीएचयू परिसर में छात्राओं की छेड़खानी का मामला बहुत गहराया था. छात्राओं पर लाठीचार्ज, धरना अनशन बहुत कुछ हुआ. बाद में सियासी जमा पहना दिया गया लेकिन अगर छात्राओं की बात सुन ली गई होती तो नौबत यहाँ तक नही पहुचती. एक तरफ हम बेटी बचाओ, समानता की बात करते हैं दूसरी ओर इस तरह के आंकड़े दिखते हैं जो सच को बयाँ करते हैं. हमारा समाज भी संवेदनहीन हो गया है जहाँ लोग इस तरह की घटनाओं का वीडियो बनाते हैं बजाय मदद करने के. समाज में बड़े बड़े बुद्धिजीवी वर्ग चिंतन मनन तो करता है लेकिन वो भी सियासी हो चुका है, समाज को लोगों में जागरूकता नहीं रह गई है. मानसिकता में बदलाव लाना होगा, पशुतापूर्ण व्यवहारों को रोकना होगा और ये बिना सामाजिक संस्थाओं के, कड़े नियम कानून के और नागरिकों के सहयोग से संम्भव नही है.

-प्रियंका वरमा महेश्वरी



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