शब्द साधना से स्थापित किये जा सकते हैं नये कीर्तिमान
| Dr. Ravindra Arjariya - Apr 8 2018 3:00PM

जीवन के सुकोमल भावों से लेकर जटिलताओं तक को उजागर करने में लेखनी ने हमेशा ही महात्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। सदियों पहले का दुर्लभ संवाद, आदिकालीन ग्रन्थों के माध्यम से आज भी हमें मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है। वेदों की व्याख्यायें साइवर युग की नवीन खोजों पर भारी पड रही हैं। ऐसे में लेखनी की साधना करने वाले साधकों के प्रति समाज हमेशा ऋणी रहेगा। देश, काल और परिस्थितियों के साथ लेखन के आयामों ने भी करवट बदली। साहित्य सृजन के शिल्पियों ने समसामयिक शैलियों को अंगीकार किया। गद्य और पद्य दौनों विधाओं ने अभिनव प्रयोग किये और नये मापदण्ड स्थापित किये। ऐसे मापदण्ड स्थापित करने वालों को हैदराबाद की चारमीनार के निकट वाले मैदान में अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन के भव्य आयोजन में आमंत्रित किया गया।

यह हमारा सौभाग्य था कि उन दिनों हैदराबाद की धरती अस्थाई रूप से हमारी कर्म-स्थली बनी हुई थी। आयोजन समिति के संयोजक सुरेन्द दुवे जयपुरी ने हमारे कार्यालय में निमंत्रण-पत्र भेजा था। पत्र में श्रीप्रकाश पटैरिया ‘हृदयेश’ का नांम प्रमुखता से देखकर हृदय गद-गद हो गया। उनकी लिखी अंजान राहें, रामानुज, तपस्वनी, अप्रमेय, अवतंश, चक्रव्यूह, भरतप्रिया, तापस सहित दर्जन भर से अधिक पुस्तकें एक बार फिर मस्तिष्क में सजीव हो उठी। महाराज छत्रसाल की नगरी के इस लाल को इतने गरिमामय समारोह में जिस प्रमुखता से प्रकाशित किया गया उस पर गर्व किया जा सकता है। निर्धारित समय पर आयोजन स्थल पर पहुंच गये। आयोजन समिति के सदस्यों नें प्रथम पंक्ति के तीसरे सोफे पर जहां हमारी चिट पहले से ही लगी थी, वहां तक पहुचाया। वेटर काफी लेकर हमारे पास तक पहुंचा ही था कि मंच से अंतर्राष्ट्रीय़स्तर पर अपनी प्रतिभा का परचम फहराने वाले कवि का एक-एक करके परिचय कराया जाने लगा। सभी ने अपने नाम की घोषणा के साथ ही मंच पर आकर अभिवादन किया और आसन जमाया।

उदघोषणा के तीसरे क्रम में कवि ‘हृदयेश’ को आमंत्रित करना, उनकी वरीयता को स्वतः ही प्रदर्शित कर गया। अभिवादन के दौरान ही उनसे हमारी नजरें मिलीं और चिर-परिचित अंदाज में भावनाओं का आदान-प्रदान स्वतः ही हो गया। गीत-गजल की कीर्ति काले, हास्य के सुरेन्द्र दुवे और गीतकार डा. कुंवर बेचैन के अलावा यदि किसी ने पूरा सम्मेलन अपने नाम किया था तो वह थे ‘हृदयेश’। दौनों दौर में श्रोताओं ने ‘हृदयेश’ को जिस तरह से ‘वन्स मोर, वन्स मोर’ के शोर के साथ बार-बार आवाज दी, वह उनके काव्य शिल्प के साथ-साथ प्रस्तुतिकरण के प्रभावी होने का स्पष्ट प्रमाण था। जितनी बार उनके लिए तालियां बजती, हमारा सीना गर्व से चौडा हो जाता। आखिर बुंदेली धरा का यह लाडला गैर हिन्दी भाषी परिवेश में अपनी कलम की सफलता का परचम जो फहराया रहा था। कार्यक्रम के समाप्त होते ही उन्होंने मंच से ही हमें आवाज दी। इशारों में ही हमने उन्हें आश्वस्त किया कि बिना मिला नहीं जाऊंगा। विशाल पण्डाल से वाहर निकल कर हमने अतिविशिष्ट अतिथिशाला के बोर्ड लगे स्वीस टैंट की ओर रुख किया। यह स्थान कवियों के विश्राम के लिए आरक्षित किया गया था। अन्दर पहुंचते ही पटैरिया जी ने बांहें फैलाकर स्वागत किया।

हमने भी उन्हें इस अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मंच पर सफलता के लिए भाव-भरी बधाई दी। अन्य कवियों ने भी पुरानी जान-पहचान के कारण आत्मीय अभिवादन किया। हमारा लक्ष्य तो ‘हृदयेश’ के विशाल होते दृष्टिकोण के मध्य समसामयिक समस्याओं के समाधान ढूंढने थे, सो टैंट के कोने में पडे सोफे पर जा बैठे। साइवर युग में कवि सम्मेलनों के भविष्य पर संभावनायें टटोलना शुरू की। जो खोते हैं, वो पाते हैं, जो पाते हैं, वो खोते हैं, से अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि कवि सम्मेलनों की संख्या में कमी आई है परन्तु यह भी सत्य है कि गुणवत्ता में भी रेखांकित करने योग्य सुधार हुआ है। सोसल मीडिया के माध्यम से अनेक प्रतिभायें उभरी हैं. सशक्त लेखनी सामने आयी है। नेट पर कवियों की रचनाये भरी पडी हैं परन्तु प्रत्यक्ष संवाद से जो भावनाओं का आदान-प्रदान होता है, संवेदनाये जीवित हो उठतीं हैं और मंच-श्रोता का भेद समाप्त हो जाता है, वह नेट की यांत्रिक प्रस्तुति से नितांत असम्भव है। अगर ऐसा होता तो क्रिकेट के टिकिटों की बिक्री का ग्राफ ऊपर उठने के स्थान पर नीचे की और आता। लोग विदेशों के मैदानों तक में अपने देश की टीम का प्रदर्शन देखने के लिए जाते हैं। तभी स्वाल्पाहार लेकर वेटर हमारे सामने आ खडा हुआ। हमने उसे टेबिल पर प्लेट्स रखने का इशारा किया और चल रहे संवाद को आगे बढाया। पुस्तकों के प्रकाशन में आई गिरावट का मुद्दा उछाल दिया।

वे एक क्षण के लिए गम्भीर हुए। माथे को सहलाया फिर बोले कि यह समस्या उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी रचना के लिए शब्द उधार लिए हों, भाव और विचारों को अधिग्रहीत किया हो, मौलिकता के स्थान पर अनेक स्थापित पक्षों के समुच्चय को स्थापित किया हो। मौलिक लेखनी के लिए आज भी प्रकाशक उतने ही लालायित रहते हैं जितने कि रचनाकार छपे हुए शब्द देखने के लिए। शब्द साधना से स्थापित किये जा सकते हैं नये कीर्तिमान। साहित्य सृजन की दुर्गम राह पर भावनाओं का तूफान सम्हालना सहज होता। अभी बातचीत चल ही रही थी कि हमारे स्टाफ के सहयोगी हमें ढूढते हुए इस टैंट तक पहुंच गये। सभी ने निवेदित नजरों से हमसे चलने का आग्रह किया। मजबूरी में संवाद समाप्त करना पडा। न चाहते हुए पटैरिया जी से विदा ली और अपने सहयोगियों के साथ आफिस के गाडी की ओर चल पडे। हमारे मन में एक ही बात बार-बार आ रही थी कि क्या वास्तव में शब्द साधना से स्थापित किये जा सकते हैं नये कीर्तिमान। उदाहरण सामने थे पटैरिया जी। इस बार बस इतना ही। अगले हफ्ते एक नयी शक्सियत के साथ फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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