अम्बेडकरनगर : अकबरपुर की बिजली गुल....कारण आप भी जानें.....
| By- Reeta Vishwakarma - Apr 11 2018 5:29PM

अप्रैल महीने के शुरूआती दिनों में जब किसान अपनी रबी की प्रमुख फसल की कटाई और मड़ाई तथा इसके उत्पाद का विक्रय व भण्डारण कार्य करना प्रारम्भ करता है तब ऐसे में चक्रवातिक बरसात व अन्य तरह की प्राकृतिक आपदाएँ उसके इस कार्य में बाधक बनकर उनके द्वारा देखे गए सपनों को फलीभूत होने पर तुषारापात करते हैं। अभी तक छिटपुट स्थानों पर हुए अग्निकाण्ड जहाँ लोगों की चिन्ता का विषय बने हुए थे वहीं लगभग प्रतिदिन आने वाले आंधी-तूफान और जलवृष्टि उनकी समस्याओं में और इजाफा कर रहे हैं। किसान ही नहीं इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं से हर आम खास त्रस्त व पीड़ित हो गया है।

अम्बेडकरनगर जिले में अप्रैल महीने की शुरूआत से ही तेज अंधड़ और बरसात होने से किसानों की खेतों में तैयार व कटी हुई गेहूँ की फसल जहाँ नष्ट हो गई है वहीं सड़कों के किनारे उखड़कर गिरने वाले पेड़ों से यातायात प्रभावित होने लगा है। यही नहीं विद्युत पोल व तारों के टूटने से विद्युतापूर्ति चरमरा गई है। थोड़ी सी हवा चली यानि पवन देव की कृपा हुई नहीं कि बिजली गुल। वरूण देव खुश हुए दो बूंद पड़ी नहीं कि पावर सप्लाई बाधित। और कहीं वरूण और पवन देव की कृपा एक साथ हो गई तो यह पता नही चलता कि यहाँ बिजली महकमा भी कार्य कर रहा है....? जी हाँ..... विश्वास न हो और आप अम्बेडकरनगर जनपद के मुख्यालयी शहर अकबरपुर में न रहते हों तो मात्र 24 घण्टे के लिए आ जाइए आपको स्वयं सब कुछ पता लग जाएगा। ऊपर वाले पवन व वरूण देव की कृपा को जहाँ प्राकृतिक आपदा कहा जाता है वहीं गुल हुई बिजली से उत्पन्न स्थिति को क्या कहा जाएगा?

प्रायः अकबरपुर की बिजली आपूर्ति लोकल फाल्ट्स व अन्य ब्रेक डाउन की वजह से ठप्प रहती है जिसे ठीक करने व आपूर्ति की बहाली के लिए आधा दर्जन अभियन्ताओं एवं दर्जनों विभागीय एवं निजी लाइन स्टाफ की नियुक्ति है बावजूद इसके उपभोक्ताओं की समस्या का ससमय कोई निराकरण नहीं हो पाता है। फलतः उपभोक्ताओं में आक्रोश पनपता देखा जा रहा है। ये विद्युत कर्मचारी/अभियन्ता उपभोक्ताओं को इस कदर नजर अन्दाज करते हैं जैसे ये किसी राज्य के राजा और उपभोक्ता उनकी प्रजा। ऐसे स्थिति को क्या कहा जाए? जंगलराज या फिर अंधेर नगरी.....वैसे अम्बेडकरनगर के लोग न तो मूर्ख हैं और न ही कम अक्ल.....इन्हें भी राजनीति की एबीसीडी खूब अच्छी तरह मालूम है। ये भी अपनी विरोधी आवाज बुलन्द कर सकते हैं। तब इसका हश्र क्या होगा इसे बिजली विभाग के लोगों को पता होना चाहिए। 

हम यहाँ विद्युत व्यवस्था के बारे में चर्चा करेंगे क्योंकि इस समय जिले के प्रमुख शहरों व ग्रामीण इलाकों में प्राकृतिक आपदा और मानवीय उपेक्षा की वजह से लोग बिजली को तरसने लगे हैं। यहाँ बताना आवश्यक है कि एक माह से ऊपर की अवधि उत्तर प्रदेश बिजली महकमें के कर्मचारियों/अभियन्ताओं ने बिजली निजीकरण के विरोध में धरना-प्रदर्शन व हड़ताल में गुजार दिया। बिजली विभाग के इस आन्दोलन की वजह से विद्युत आपूर्ति बाधा का दंश प्रदेश की जनता ने झेला। इससे अम्बेडकरनगर भी अछूता नहीं रहा। अब जबकि सरकार ने बिजली निजीकरण का इरादा बदल दिया है तब स्थानीय स्तर पर पूर्व की तरह बिजली विभाग के कर्मचारी, लाइन मैकेनिक एवं अभियन्तागण मनमाने ढंग से कार्य करने लगे हैं। ये लोग विद्युत उपभोक्ताओं की परेशानियों की तरफ कम अपने हितापूर्ति की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं।

मसलन यदि कोई उपभोक्ता विद्युत अनापूर्ति सम्बन्धि कोई सूचना अथवा शिकायत करता है तो ये लोग सीधे मुँह बात नहीं करते हैं। विद्युत उपकेन्द्र अकबरपुर के ऑपरेटर से लेकर स्थानीय उच्च अभियन्ता यहाँ तक कि फैजाबाद जोन के मुख्य अभियन्ता तक आम उपभोक्ताओं व मीडिया से बात करने में अपनी तौहीन समझते हैं। अकबरपुर विद्युत वितरण खण्ड में तैनात एस.डी.ओ. प्रथम के पद पर तैनात उपेन्द्र कुमार पटेल ही एक मात्र ऐसे विद्युत अभियन्ता हैं जो कभी-कभार आम उपभोक्ताओं की समस्याओं को सुनते रहे हैं। परन्तु इस समय वह भी यहाँ के अन्य विद्युत कर्मियों की भाँति व्यवहार करने लगे हैं।

एस.एस.ओ. आन ड्यूटी, अवर अभियन्ता, अधिशाषी अभियन्ता से फोन पर सम्पर्क हो पाना मुश्किल है। रही बात अम्बेडकरनगर जनपद में तैनात अधीक्षण अभियन्ता की तो...........ये बड़े अधिकारी हैं.............खबरदार.......होशियार.........। इनसे बात करने की जुर्रत कैसे......? फैजाबाद बैठे जोन के मुख्य अभियन्ता की तो बात ही अलहदा है। उनका कहना यह होता है कि छोटे-छोटे काम के लिए उनको डिस्टर्ब न किया जाए। उनकी यह बात सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है- आखिर ये किस लिए और किसके लिए विभाग के उच्च पद पर तैनात किए गए हैं? क्या इन्हें कोई अन्य संस्था, संगठन अथवा लोग पगार के रूप में लाखों रूपए प्रतिमाह देते हैं? या ये किसी राजतन्त्र के बड़े हाकिम हैं.....?

बिजली महकमें के निरंकुश/स्वेच्छाचारी कर्मचारियों की करतूतों पर तो बाद में फिलवक्त अभी बस इतना ही कि- यदि ये समय रहते अविलम्ब न चेते तो आम जन के कोप का भाजन बन सकते हैं। ये लोग आखिर अपने कार्य व्यवहार में बदलाव लाने के साथ ही अपने दायित्वों को कब समझेंगे? इन्हें शायद यह नहीं मालूम है कि इस जिले का गधा भी रेंकता नहीं है बल्कि ध्रुपद गाता है। राहत इन्दौरी के शब्दों में - किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े हैं......?



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