देश गृहयुद्ध की तरफ तो नहीं अग्रसर
| -K.P. Singh - Apr 12 2018 12:13PM

गृह युद्ध छिडने के बाद अमेरिका में एकीकरण का नया सूत्रपात हुआ और महाशक्ति के रूप में विश्वपटल पर स्थापित होने की प्रस्तावना लिखी गई। अमेरिका के उत्तरीय राज्य दास प्रथा को समाप्त करने के पक्षधर थे जबकि दक्षिणी राज्य इसके विरुद्ध। यह द्वंद गृह युद्ध में बदला जिसमें इतना खून बहा कि लगभग साढ़े छह लाख लोग मारे गये। इसके बाद एक नये अमेरिका का उदय हुआ।
    कभी-कभी लगता है कि भारत को भी नई संरचना के लिए जाति व्यवस्था के चलते किसी गृह युद्ध की विभीषिका से गुजरना पड़ेगा। मंडल आयोग की रिपोर्ट जब लागू हुई तो इस दिशा में परिस्थितियां बनती दिखी थीं। गनीमत यह रही कि आबादी में बहुत बाहुल्य में होने के बावजूद पिछड़ी जाति के लोग जबाबी आंदोलन के लिए सड़कों पर नही उतरे। एक गुबार था जो विनाशकारी बबंडर में बदलने के पहले ही शांत हो गया।
    लेकिन हालिया घटनाक्रम से लगता है कि यह देश अभी भी सामाजिक भूकंपीय संवेदनशीलता का क्षेत्र है। सोशल मीडिया जैसी नई ईजाद ने इसकी तीव्रता को चरम पर ले जाने का खतरा पैदा कर दिया है। एक ओर राष्ट्रवादी ज्वार का दौर है, दूसरी ओर जाति के आधार पर हिंसा की परिणति तक विखंडन का उबाल। राष्ट्रवाद अगर महत्वपूर्ण है तो पूरे देश को सहेजने की उदात्व भावना प्रदर्शित होनी चाहिए। एक-दूसरे के लिए नफरत की पराकाष्ठा तो देश को तोड़ सकती है एक स्वतंत्र और मुक्त देश में कोई अपने ऊपर किसी के आधिपत्य को स्वीकार नही कर सकता। हर एक को आत्म निर्णय का अधिकार चाहिए। जिनमें लड़ाई जो रही हो उनमें कोई बाहर से आये हुए अंग्रेज नही हैं। इसके सभी पक्षों का यहां की धरती पर पैतृक अधिकार है। अगर सहअस्तित्व की गुंजाइश नही छोड़ी गई तो धर्म के बाद जाति के आधार पर बटवारे की भूमिका लिखी जा सकती है। पूना पैक्ट के पहले जातिगत दुराग्रहो की वजह से ऐसी परिस्थितियां बन गई थीं। अंग्रेज खंड-खंड करके इस देश को आजाद करना चाहते थे लेकिन उन्हें इसमें बहुत कामयाबी नही मिली। न उन्होंने कम्युनल आबार्ड का दायरा विस्तृत कर पाया और न देशी रियासतों को अपने बारे में निर्णय का अधिकार देकर वे अपना मकसद साध पाये।
    यह अच्छा है कि इस देश में विद्रोही चेतना के अवलंब महामानव बुद्ध और बाबा साहब अंबेडकर जैसे व्यक्तित्व रहे जिन्होंने समता और स्वतंत्रा के साथ-साथ बंधुता और मैत्रीय के उददेश्य पर भी पूरा बल दिया। उनके द्वारा आरोपित इन संस्कारों और मूल्यों का परिणाम है कि दुर्भावनाओं से कितना भी पीड़ित होने के बाद कोई समाज उस लकीर को नही लांघना चाहता जो पारस्परिक बंधुत्व को समाप्त कर दे। इसीलिए यहां यह आशा बनती है कि अमेरिका जैसे गृह युद्ध के छिड़ने की नौबत यहां कभी नही आयेगी।
    मैत्रीय और बंधुत्व के इन मूल्यों को अगर सभी पक्ष आत्मसात कर सकें तो तमाम डरावनी आशंकायें निर्मूल हो सकती हैं। कलकत्ता शहर में कुछ दिनों पहले एक निर्माणाधीन ओवर ब्रिज के गिर जाने से कई मौते हो गई थीं। सोशल मीडिया पर आनन-फानन प्रतिक्रियाएं पोस्ट होने लगी कि जिस देश में 50 प्रतिशत से ज्यादा इंजीनियर योग्यता नही आरक्षण के आधार पर बनते हैं वहां पुल तो गिरेगें ही। जो लोग यह ज्ञान बता रहे थे उन्होंने यह जानने की जरूरत महसूस नही की कि ओवर ब्रिज निर्माण का ठेका एक निजी कंपनी का था जिसने पुल गिरने में लापरवाही को लेकर जिन पांच इंजीनियरों पर कार्रवाई की उनमें से एक भी आरक्षित वर्ग का नही था। सोशल मीडिया पर इन दिनों इस तरह की पोस्ट आम है कि हमें आरक्षण से विरोध नही है लेकिन आरक्षण से बने डाक्टर से डर लगता है। हकीकत यह है कि सरकारी अस्पतालों में रात में ज्यादातर इमरजेंसी मेडिकल आफीसर के रूप में दलित डाक्टर होता है। किसी भी घटना, दुर्घटना के होने पर लोग सबसे पहले सरकारी अस्पताल में मरीज को लेकर आते हैं। उन्हें पता भी चल जाता है कि डाक्टर आरक्षित वर्ग का है फिर भी वे अपने मरीज को इलाज कराने के लिए कहीं और नही ले जाते हैं बल्कि इस बात के लिए गिड़गिड़ाते हैं कि उसे रेफर न करें बल्कि वे इलाज शुरू कर दें। उरई के जिला अस्पताल के सर्जन डा. बसंत लाल से आपरेशन कराने के लिए लोग पैसा देने को तैयार रहते हैं जबकि डा. बसंत लाल भी आरक्षित वर्ग के हैं।
    सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में आये दिन गलत इलाज की वजह से मरीज की मौत के कारण बखेड़ा होता रहता है लेकिन कभी इसमें जाति या आरक्षण का मुददा नही सुना गया। लोगों की पूरी कल्पना शक्ति आरक्षण को बदनाम करने की दलीलों को गड़ने में खर्च हो रही है। यहां तक कि आरक्षण की व्यवस्था के कारण योग्य सवर्ण युवकों को रोजगार न मिलने की दलीलें भी बनावटी हैं। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने से सवर्ण छात्रों, युवाओं में उनके लिए रोजगार के अवसर संकुचित होने की आशंका के चलते जो उद्वेलन हुआ था वह बाद में इसलिए ठंठा पड़ गया क्योंकि नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने आर्थिक उदारीकरण शुरू करके सार्वजनिक क्षेत्र को समेट दिया जहां पर आरक्षण था। निजी क्षेत्र में इसके कारण बूम आया जहां 90 प्रतिशत तक सवर्ण युवकों को ही अवसर मिले मीडिया उसका उदाहरण है। यहां जिला स्तर तक अखबारों के ब्यूरो कार्यालय खुले, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रतिनिधि बने इनमें आरक्षित वर्ग को नगण्य अवसर मिला। यह दूसरी बात है कि प्रतिभाशाली सवर्ण युवकों को इसके बावजूद चप्पलें चटकानी पड़ीं। मीडिया के महंतों ने नौकरी योग्यता के आधार पर नही चेलागीरी के आधार पर बांटी और आज भी बांट रहे हैं। जिन संस्थाओं में आरक्षण नही है उन सभी का यही हाल है। उनमें जो महंत बैठे हैं वो सवर्ण हैं जो नौकरी देने में हर दर्जे का पक्षपात करते हैं लेकिन योग्यता को कोई भाव नही देता। इसलिए जहां सवर्णवाद चला वहां अपेक्षाकृत योग्य सवर्ण युवा इक्का-दुक्का अवसर ही प्राप्त कर सके।
    यह भी एक स्वयंभू दलील है कि गरीबी क्या सवर्णों में नही है तो दलितों और पिछड़ों को आरक्षण कयों। जबकि ऐसी दलील देने वालों को यह मालूम होना चाहिए कि यह कहीं नही कहा गया कि आरक्षण गरीबों को राहत देने का उपाय है। सवर्ण दूल्हे को किसी दलित बाहुल्य गांव में भी घोड़े पर चढ़ने से नही रोका जा सकता। सार्वजनिक कुआ, तालाब यहां तक कि हैंडपंप से उन्हें पानी लेने से रोकने का भी कोई उदाहरणा मौजूद नही है। लेकिन दलितों के साथ ऐसा होता था और कमोवेश आज भी कहीं-कहीं ऐसा हो रहा है। आज भी वह धार्मिक साहित्य सामाजिक स्वीकृत में है जिसमें शूद्रों को शिक्षा और संपत्ति के अधिकारी की मनाही है। आज भी शूद्रों का उपनयन संस्कार नही किया जाता जिसका दूसरा अर्थ यह है कि वे जन्मनाहीन माने जाते हैं। इस तरह के भेदभाव अकेले भारत में नही हर देश में नश्ल या अन्य आधार पर रहें हैं। इसलिए आरक्षण की व्यवस्था दुनियां के विकसित देशो ने भारत से बहुत पहले भेदभाव से पीड़ितजनों को मुआवजे के तौर पर की थी। आरक्षण भारत की कोई मौलिक व्यवस्था नही है बल्कि दुनियां के उक्त देशों का अनुकरण है।
    इसका मतलब यह नही कि सवर्णों की दुर्दशा के प्रति किसी को कोई संवेदना नही है या नही होनी चाहिए। लाखों की संख्या में सरकारी पद खाली हैं। आरक्षित वर्ग के लोगों से ज्यादा आनुपतिक अवसर उनमें सवर्णों को मिलेगा। लेकिन इनकी भर्तियों के लिए प्रभावी आंदोलन सही दिशा नही दी जाने की वजह से नही हो पा रहा। सरकारी शिक्षा शून्य होती जा रही है जिसकी वजह यह नही है कि सरकार के पास संसाधनों की कमी है। दरअसल सरकार में ऐसे लोग बैठ गये हैं जो चाहते हैं कि सिर्फ उन्हीं लोगों के बच्चे पढ़कर साफ बने जिनके पास पैसा है। गरीब सवर्णों के नौनिहाल इससे कम प्रभावित नही हैं। गरीबों के बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए शिक्षा के निजीकरण के साथ सवर्ण और शूद्र मिलकर क्यों नही लड़ते।
    फिर वहीं आते हैं मैत्रीय और बंधुत्व के मूल्यों पर। डा. अंबेडकर ने लिखा है कि सवर्णों और शूद्रों में नश्ल और खून का कोई अंतर नही है। जाति व्यवस्था के कठोर होने के कारण ऐतिहासिक ज्यादा हैं। लेकिन अगर नश्ल और रक्त का अंतर भी हो तो मानवीयता और बड़प्पन हमें यह सिखाती है कि जो कष्ट में है तो उसके प्रति हमारे अंदर करुणा उमड़े, बिना उसकी जाति, धर्म को जानने का प्रयास किये। यह बंधुत्व राष्ट्रवाद को वास्तविक रूप से मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है। सवर्ण गरीबों के लिए दलित लड़ाई लड़े अगर कोई सवर्ण लड़का मेधावी है और उसके पास आगे पढ़ने के लिए पैसे नही हैं तो दलितों में सक्षम लोग उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ायें। दूसरी ओर सवर्ण संगठन उन दलित छात्रों का अभिनंदन करें जो सामान्य श्रेणी की मैरिट में स्थान बनाते हैं। परिवेश का प्रभाव होता है। बाबा साहब जब तक हिंदुस्तान में रहे औसत से भी नीचे दर्जे के विद्यार्थी थे। अमेरिका पहुंचे तो वहां के परिवेश के कारण उनकी बौद्धिक ऊर्जा धमाके के साथ फट पड़ी और आज उन्हें विश्व के प्रमुखत ओलंबिया विश्व विद्यालय से ढाई सौ वर्षों के इतिहास में सबसे बुद्धिमान छात्र के रूप में नवाजा गया है। हम श्रेष्ठ हैं या हमारी जाति श्रेष्ठ है इसका अपने मुंह से सार्वजनिक दावा शील के विरुद्ध है। हमारा आचरण और बड़प्पन हमारी श्रेष्ठता को स्वयं सिद्ध रक देगा हमें कहने की जरूरत नही पड़ेगी। दूसरे हमें खुद श्रेष्ठ कहेंगे यह बंधुता में ही संभव है। बंधुता के कारण ही बाबा साहब की शुरूआती अस्पृश्य हितकारिणी समिति में सबसे महत्वपूर्ण सदस्य ब्राह्मण जाति के सहस्त्रबुद्धे थे। बाबा साहब ने अपनी जाति के सरनेम की बजाय अपने गुरू महादेव अंबेडकर जो कि ब्राह्मण थे का सरनेम अपनाया था। क्या इस तरह का बंधुत्व अब नही दिखाया जा सकता। अगर घमंड भी जताना है तो यह लिखो भारतीय सबसे श्रेष्ठ हैं, भारतीय का कोई मुकाबला नही है। भारतीय किसी के सामने झुकता नही है, भारतीय किसी से डरता नही है बगैरह-बगैरह। अगर हम इन उदघोषणाओं को जाति से बांध देगें तो बंधुत्व के लिए यह बहुत घातक होगा।
    जातिगत मंचों के विकल्प में आज मैत्रीय मंच और बंधुता मंच बनाने की जरूरत है जिनमें इस तरह के मूल्यों को बढ़ावा देने के कार्यक्रम बनाये जायें। यह एक नई शुरूआत हो सकती है। समाज कभी गलत नही होता, कभी-कभी नादान हो सकता है। आज जैसा माहौल बन गया है उसमें लड़ने लड़ाने की बाते कहने की नादानी हो रही है। लेकिन यह शुरूआत की गई तो ऐसा कहने वाले सबसे ज्यादा सहयोग करेगें यह विश्वास रखा जाना चाहिए क्योंकि उनके पास अधिक ऊर्जा भी है और लगन भी।



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