डॉ. आंबेडकर के राजनीतिक विचार
| Ajay Kumar Chaubey 'Ehasas' - Apr 14 2018 12:09PM

साथियो! जैसा कि आप अवगत हैं कि वर्तमान दलित राजनीति एक बहुत बड़े संकट में से गुज़र रही है. हम लोगों ने देखा है कि पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित रेडिकल रिपब्लिकन पार्टी कैसे व्यक्तिवाद, सिद्धांतहीनता और अवसरवाद का शिकार हो कर बिखर चुकी है. इसके बाद बहुजन के नाम पर शुरू हुयी दलित राजनीति कैसे सर्वजन के गर्त में समा गयी है. इस समय दलितों के सामने एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति पैदा हो गयी है. मेरे विचार में इस संकट के समय में सबसे पहले हमें डॉ. आंबेडकर के राजनीति, राजनेता, राजनैतिक सत्ता और राजनीतिक पार्टी के सम्बन्ध में विचारों का पुनर अध्ययन करना चाहिए और उसे वर्तमान परिपेक्ष्य में समझ कर एक नए रेडिकल विकल्प का निर्माण करना चाहिए. इसी ध्येय से इस लेख में डॉ. आंबेडकर के राजनैतिक पार्टी, राजनेता और सत्ता की अवधारणा के बारे में विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इन माप-दंडों पर वर्तमान दलित राजनीति और राजनेताओं का आंकलन करके एक नया विकल्प खड़ा किया जा सके.

1. “राजनीति वर्ग चेतना पर आधारित होनी चाहिए. जो राजनीति वर्ग चेतना के प्रति सचेत नहीं है वह ढोंग है.”
2. “केवल राजनीतिक आदर्श रखना ही काफी नहीं है. इन आदर्शों को विजयी बनाना भी ज़रूरी है. परन्तु आदर्शों की विजय एक संगठित पार्टी द्वारा ही संभव है न कि व्यक्तियों द्वारा.”
3. एक राजनैतिक पार्टी एक सेना की तरह होती है. इसके ज़रूरी अंग हैं:-
एक नेता जो एक सेनापति जैसा हो.
एक संगठन जिस में (1) सदस्यता, (2) एक ज़मीनी योजना (3) अनुशासन हो.
इसके सिद्धांत और नीति ज़रूर होनी चाहिए.
इसका प्रोग्राम या कार्य योजना होनी चाहिए.
इस की रणनीति और कौशल होना चाहिए यानि कि कब क्या करना है तथा लक्ष्य तक कैसे पहुंचना है, की योजना होनी चाहिए.”
3. “किसी भी पार्टी में कभी भी न बिकने वाला इमानदार नेतृत्व का बहुत महत्त्व है. उसी प्रकार पार्टी के विकास के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का होना भी बहुत ज़रूरी है.”
4. “एक राजनैतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता है. एक राजनैतिक पार्टी का काम लोगों को राजनीतिक तौर से शिक्षित करने, उद्देलित करने और संगठित करने का होता है.”
5. “आप के नेता बहुत योग्य होने चाहिए. आप के नेताओं का साहस और बौद्धिकता किसी भी पार्टी के सर्वोच्च नेता की टक्कर की होनी चाहिए.”
6. शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरशन के एजंडा के बारे में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था:-
7. “आज हमारा मुख्य काम जनता में वर्ग चेतना पैदा करना है और तब वर्तमान विरोधी नेतृत्व अपने आप ध्वस्त हो जायेगा.
8. राजनीतिक आज़ादी जीतने के लिए शोषकों और शोषितों का गठजोड़ ज़रूरी हो सकता है परन्तु शोषकों और शोषितों के गठजोड़ से समाज के पुनर्निर्माण हेतु साँझा पार्टी बनाना जनता को धोखा देना है.
9. पूंजीपतियों और ब्राह्मणों के हाथ में राजनीतिक सत्ता देने से उन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी. इस के विपरीत दलितों और पिछड़ों के हाथ में सत्ता देने से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और यह भौतिक समृद्धि बढ़ाने में सहायक होगा.
10. राजनीतिक सत्ता सामाजिक प्रगति की चाबी है और दलित संगठित होकर सत्ता पर कब्ज़ा करके अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं. राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए.
11. “राजनीतिक सत्ता का मुख्य ध्येय सामाजिक और आर्थिक सुधार करना होना चाहिए.”
12. “हमें पिछड़ों और आदिवासियों के साथ गठजोड़ करना चाहिए क्योंकि उन की स्थिति भी दलितों जैसी ही है. उनमें फिलहाल राजनीतिक चेतना की कमी है.”
13. नायक पूजा के खिलाफ:

“असीमित प्रशंसा के रूप में नायक पूजा एक बात है. नायक की आज्ञा मानना एक बिलकुल अलग तरह की नायक पूजा है. पहली में कोई बुराई नहीं है परन्तु दूसरी बहुत घातक है. पहली प्रकार की नायक पूजा व्यक्ति की बुद्धि और कार्य स्वतंत्रता का हनन नहीं करती है. दूसरी व्यक्ति को पक्का मूर्ख बना देती है. पहली से देश का कोई नुक्सान नहीं होता है. दूसरी प्रकार की नायक पूजा तो देश के लिए पक्का खतरा है.”

“यदि आप शुरू में ही नायक पूजा के विचार पर रोक नहीं लगायेंगे तो आप बर्बाद हो जायेंगे. किसी व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति में विश्वास करने लगते हैं जिस का नतीजा होता है कि आप निर्भर रहने तथा अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन रहने की आदत बना लेते हैं. यदि आप इन विचारों के शिकार हो जायेंगे तो राष्ट्रीय जीवन में आप लकड़ी के लट्ठे की तरह हो जायेंगे. आप का संघर्ष समाप्त हो जायेगा.”



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