सच की कसौटी पर योगी का दलित प्रेम
| -Shivendra Kumar Pathak - Apr 17 2018 12:34PM

-शिवेन्द्र कुमार पाठक/ आज हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब तरह-तरह के नारे संकल्प और आन्दोलन देश या समाज हित में नहीं बल्कि स्वहित में बुलन्द किये जा रहे हैं। लोकतंत्र जनता के द्वारा जनता के लिए और जनता की सरकार है। जनता का जागरूक रहना इसलिए विशेष आवश्यक है क्योंकि उसके चुने प्रतिनिधि ही सरकार चलाते हैं। प्रतिनिधियों के चयन करते समय लोकतन्त्र के अधिकारों और कर्तव्यों को समझने में भूल तो हम कर जाते हैं और दोष मढ़ते हैं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर।

अबसे एक वर्ष पूर्व 19 मार्च 2017 को देश के सबसे बड़े राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नयी सरकार ने सत्ता की बागडोर सम्भाली। लक्ष्य था उत्तर प्रदेश को सकारात्मक, सुरक्षित और परिणामदायी प्रदेश के रूप में स्थापित करना। सरकार के गठन के समय ही अनुसूचित जाति एवं जन जाति तथा पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष प्रयास के साथ ही कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए विशेष ध्यान केन्द्रित करने की बात कही गयी और यह भी कहा गया कि अराजक माहौल से त्रस्त लोगों के लिए यह बदलाव राहत भरा होगा।

जहां तक अनुसूचित जाति और जनजाति के सुरक्षा और सम्मान की बात है मुख्यमंत्री ने शुरूआत में ही साफ कहा था कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ भेद-भाव और उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जाति और जनजाति का विकास और उत्थान प्रदेश सरकार का नारा नहीं मिशन है। इस कथन के पूरे एक वर्ष बाद जांच की कसौटी पर पाया गया कि जिला गाजीपुर में ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत वर्ष 2017-18 में विगत वर्षों की तुलना में सर्वाधिक 275 मामले दर्ज हैं और पीड़ित को आर्थिक सहायता वाले नियम के तहत 23206750 दो करोड़ बत्तीस लाख छः हजार सात पचास रूपये भुगतान किया गया है।

इसके पूर्व वर्ष 2016-17 में 218 तथा वर्ष 2015-16 में 162 मुकदमें दर्ज हैं। तथा आर्थिक सहायता के रूप में वर्ष 2016-17 में 8307125 तिरासी लाख सात हजार एक सौ पच्चीस रूपये व वर्ष 2015-16 में 4408250 चौवालिस लाख आठ हजार दो सौ पचास रूपये दिये जा चुके हैं। ऐसे मामलों में पीड़ितों को आर्थिक सहायता के लिए नियम है कि उन्हें प्राप्त होने वाली पूरी धनराशि का 25 प्रतिशत एफ. आई. आर. दर्ज करते ही देय होगा और 50 धनराशि आरोप पत्र दाखिल किये जाने पर तथा अन्तिम 25 प्रतिशत अन्तिम किस्त आरोपी पर आरोप सिद्ध होने के बाद दी जायेगी। आंकड़े बोलते हैं कि यह अन्तिम किस्त अब तक किसी को भी भुगतान नहीं किया गया है।

इस सम्बन्धित चर्चा में स्वयं मुख्यमंत्री सहजता से स्वीकार कर रहे हैं कि हमने वर्ष 2017-18 में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 तथा पीसीआर एक्ट के अन्तर्गत 15506 लोगों को एक सौ बावन करोड़ बासठ लाख रूपये की आर्थिक सहायता प्रदान की है। श्री योगी ने अभी बीते शनिवार को राजधानी स्थित अम्बेडकर महासभा परिसर में डॉ0 भीमराव जी अम्बेडकर की जयन्ती पर आयोजित दलित महासभा को सम्बोधित करते वक्त अपने सम्बोधन में पुनः दलितों, गरीबों और पिछड़ों के प्रति अन्याय नहीं होने देने की बात दुहरायी है। इस अवसर पर डॉ0 निर्मल द्वारा दलित समाज की ओर से दिया गया दलित मित्र सम्मान भी स्वीकार किया है।

मुख्यमंत्री के इस कथन से प्रश्न उठना स्वाभाविक कि वर्ष 2017-18 में क्या योगी सरकार अपने इस मिशन में फेल हो गयी? या फिर यह कानून ही अत्याचार निवारण के लिए निष्प्रभावी हो चुका है? क्योंकि विगत ढाई दशक का रिकार्ड तो यही कह रहा है कि आने वाले प्रत्येक वर्षों में इस प्रकार के मुकदमों की संख्या घटने के वजाय क्रमशः बढ़ती ही रही है। अनुभव कहता है कि व्यक्ति या समूह उत्श्रृंखल होता है या स्वच्छन्दता को ही स्वतंत्रता मानकर अपना और समाज का नुक्सान करता है तो ये सब आर्थिक जीवन, एकांगी विकास और व्यक्तिगत लोभ आधारित भौतिक विकास पर जोर देने के नकारात्मक पहलू हैं। वास्तव में ये विसंगतियां सही नेतृत्व के अभाव की सूचक हैं। अभी हाल ही में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम सन्दर्भ में सर्वोंच्च न्यायालय के निर्देश के विरूद्ध हिंसा, आगजनी व असामाजिक तत्वों का नग्न ताण्डव हम सभी ने देखा है।

इस प्रकार की यह घटना पहली नहीं है जब राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थ और वोट की घटिया राजनीति के लिये देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अपने-अपने ढंग से गलत व्याख्या न की हो। इसके कुछ समय पूर्व ही इसी न्यायालय के आदेश के बावजूद पद्मावती फिल्म को न चलने देने की पुरजोर कोशिश और राज्य सरकारों की इस मामले में ढिलाई देखी जा चुकी है। आन्दोलन चाहे जाट का हो या गुर्जर का, पटेल का हो चाहे कापू का, राम-रहीम बवाल हो या एससी एसटी का, इसके पीछे कहीं न कहीं वोट की राजनीति तो है ही दलित व पिछड़ों को मिलाने की मुहिम भी। अब जनता को अपने-अपने हिसाब से जोड़ने व बांटने में ही राजनीतिज्ञों को अपना लाभ दिखाई दे रहा है। हिन्दू को मुसलमान से, पिछड़े को सवर्ण से, दलितों को गैर-दलित से तथा स्थानीय को बाहरी के विरूद्ध भड़काने की यह सियासत ही अब वोट बैंक प्रबन्धन बन चुका है।

हमारे संविधान में कार्यपालिका और विधायिका की कार्यप्रणाली एवं गतिविधियों की संवैधानिक व्याख्या करने तथा देश के प्रत्येक नागरिक को समान न्याय दिलाने के उद्देश्य से ही स्वतंत्र रूप से न्यायपालिका की व्यवस्था हमारे संविधान निर्माताओं ने की है। अब इस व्यवस्था का सम्मान करने के वजाय न्यायपालिका के सर्वोच्च शिखर के निर्णयों को ही हमारे राजनीतिक दलों द्वारा चुनौती दी जाने लगी है।  विडम्बना ही है कि पर्यावरण प्रकरण पर शीर्ष न्यायालय को आज कहना पड़ रहा है कि हमने कार्यपालिका पर भरोसा किया लेकिन अधिकारी काम नहीं करते अगर कोर्ट कुछ कहती है तो इसे न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाना और एक्टिविज्म बताया जाता है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टिन ने कहा था कि देश की महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान सोच के उसी स्तर पर रहते हुए नहीं हो सकता जिस स्तर पर हमने उसे पैदा किया है। हम अनैतिक हैं अर्थात् भ्रष्ट है। कानून बनाते है, जब कानून से अपना भला नहीं होता तो एक और कानून बनाते है वह भी फेल होता है तो सतर्कता आयोग बनाते है। उससे भी समस्या हल नहीं होती तो लोकपाल की बात करते हैं। इसी तरह लाखों कानून बना दिये गये पर समस्या जस की तस रही। सोच का समान स्तर होने की वजह से संसद खामी भरा कानून बनाता है। सर्वोच्च न्यायालय उसकी खामी बताते हुए उसे खारिज करता है फिर संसद के लोग न्यायालय को उसकी लक्ष्मण रेखा न लांघने की नसीहत देने लगते हैं। तब सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ता है कि यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा न लांघी होती तो रावण का वध न होता।

हम केन्द्रीय सतर्कता आयोग बनाते है, केन्द्रीय सूचना आयोग लाते है फिर जब सूचना आयोग कुछ कहता है तब सब राजनीतिक दल मिलकर उसके आदेश के खिलाफ कानून बनाते हैं, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की व्याख्या भी इसी प्रकार की जाती है। यह अत्यधिक दुःखद और अवसादी है। अगर अब हम अपने संविधान एवं संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए निष्ठापूर्ण आचरण नहीं करेंगे तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। हमें वोट की राजनीति न कर देशहित में काम करना होगा। खोखले लुभावने नारे देश एवं समाज का हित नहीं करेंगे। जनता को जागना होगा। देश को बचाइये इसी में हम सबका हित है।

(लेखक के विचार निजी हैं।)



Browse By Tags



Other News