युवाशक्ति की निराशा का कारण
| Ajay Kumar Chaubey 'Ehasas' - Apr 24 2018 3:05PM

परिवर्तन चक्र तीव्र गति से घूम रहा है। सामाजिक स्थिति बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसे में मनुष्य एक विचित्र से झंझावात में फंसा हुआ है। बाह्य रूप से चारों ओर भौतिक एवं आर्थिक प्रगति दिखाई देती है, सुख-सुविधा के अनेकानेक साधनों का अंबार लगता जा रहा है, दिन-प्रतिदिन नए-नए आविष्कार हो रहे हैं, पर आंतरिक दृष्टि से मनुष्य टूटता और बिखरता जा रहा है। उसका संसार के प्रति विश्वास, समाज के प्रति सद्भाव और जीवन के प्रति उल्लास धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। अब तो समाज में चारों ओर आपसी सौहार्द, समरसता एवं सात्विकता के स्थान पर कुटिलता, दुष्टता और स्वार्थपरता ही दृष्टिगोचर होती है। बुराई के साम्राज्य में अच्छाई के दर्शन अपवाद स्वरूप ही हो पाते हैं।

जो देश कभी जगद्गुरु हुआ करता था, उसी भारतवर्ष के राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन में चतुर्दिक् अराजकता और उच्छृंखलता छाई हुई है। जीवन मूल्यों एवं आदर्शों के प्रति आस्था-निष्ठा की बात कोई सोचता ही नहीं। वैचारिक शून्यता और दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ दिशाहीन मनुष्य पतन की राह पर फिसलता जा रहा है। उसे संभालने और उचित मार्गदर्शन देने वालों का भी अभाव ही दिखाई देता है। कुछ गिने-चुने धार्मिक-आध्यात्मिक संगठन, सामाजिक संस्थाएं और प्रतिष्ठान ही इस दिशा में सक्रिय हैं अन्यथा अधिकांश तो निजी स्वार्थ एवं व्यवसायिक दृष्टिकोण से ही कार्यरत लगते हैं। ईमानदारी, मेहनत और सत्यनिष्ठा के साथ निःस्वार्थ भाव से स्वेच्छापूर्वक जनहित के कार्य करने वालों को लोग मूर्ख ही समझते हैं। उनके परिश्रम एवं भोलेपन का लाभ उठाकर वाहवाही लूटने वाले समाज के ठेकेदार सर्वत्र दिखाई देते हैं।

समाज सेवा का क्षेत्र हो या धर्म-अध्यात्म अथवा राजनीति का, चारों ओर अवसरवादी, सत्तालोलुप, आसुरी प्रवृत्ति के लोग ही दिखाई देते हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र, जहां कभी सेवा के उच्चतम आदर्शों का पालन होता था, आज व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के केन्द्र बन गए हैं। व्यापार में तो सर्वत्र कालाबाज़ारी, चोरबाजारी, बेईमानी, मिलावट, टैक्सचोरी आदि ही सफलता के मूलमंत्र समझे जाते हैं। त्याग, बलिदान, शिष्टता, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, श्रमशीलता का सर्वत्र उपहास उड़ाया जाता है। सामान्य नागरिक से लेकर सत्ता के शिखर तक अधिकांश व्यक्ति अनीति-अनाचार के आकंठ डूबे हैं। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निजी स्वार्थ व महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ ईर्ष्या, घृणा, बैर की भावनाएं जड़ जमाए हुए हैं। ऐसी विकृत मानसिकता के चलते मनुष्य वैज्ञानिक प्रगति से प्राप्त सुख-सुविधा के अनेकानेक साधनों का भी दुरुपयोग ही करता रहता है। फलतः उसका शरीर अन्दर से खोखला होकर अनेकानेक रोगों का घर बनता जा रहा है। मनुष्य की इच्छाओं व कामनाओं की कोई सीमा नहीं है, धैर्य व संयम की मर्यादाएं टूट रही हैं, अहंकार व स्वार्थ का नशा हर समय सिर पर सवार रहता है। ऐसी स्थिति में क्या सामाजिक समरसता व सहयोग की भावना जीवित रह सकती है? सुख, शान्ति व आनन्द के दर्शन हो सकते हैं? जहां चारों ओर धनबल और बाहुबल का नंगा नाच हो रहा हो, घपलों-घोटालों का बोलबाला हो, उस समाज में क्या वास्तविक प्रगति कभी हो सकती हैं?

मानव के इस पतन-पराभव का कारण खोजने का यदि हम सच्चे मन से प्रयास करें तो पता चलेगा कि सारी समस्याओं की जड़ पैसा है। सारा संसार की अर्थप्रधान हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति हर समय अधिक से अधिक धन कमाने की उधेड़बुन में लगा रहता है। इसके लिए अनीति, अनाचार, भ्रष्टाचार जैसे सभी साधनों का खुले आम प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार कमाए हुए धन के कारण ही समाज में सर्वत्र मूल्यविहीन भोगवादी संस्कृति का अंधानुकरण और विलासिता का अमर्यादित आचरण चारों ओर देखा जा सकता है। यह सब जानते समझते हुए भी आदमी पैसे के पीछे पागल हो रहा है।

आज का युवा वर्ग ऐसे ही दूषित माहौल में जन्म लेता है और होश संभालते ही इस प्रकार की दुखद एवं चिन्ताजनक परिस्थितियों से रूबरु होता है। आदर्शहीन समाज से उसे उपयुक्त मार्गदर्शन ही नहीं मिलता और दिशाहीन शिक्षा पद्धति उसे और अधिक भ्रमित करती रहती है। ऐसे दिग्भ्रमित और वैचारिक शून्यता से ग्रस्त युवाओं पर पाश्चात्य अपसंस्कृति का आक्रमण कितनी सरलता से होता है, इसे हम प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। भोगवादी आधुनिकता के भटकाव में फंसी युवा पीढ़ी दुष्प्रवृत्तियों के दलदल में धंसती जा रही है। विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान जो युवाओं की निर्माण स्थली हुआ करते थे आज अराजकता एवं उच्छृंखलता के केन्द्र बन गए हैं। वहां मूल्यों एवं आदर्शों के प्रति कहीं कोई निष्ठा दिखाई ही नहीं देती। सर्वत्र नकारात्मक एवं विध्वंसक गतिविधियां ही होती रहती हैं। ऐसे शिक्षक व विद्यार्थी जिनमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्य करने की तड़पन हो, बिरले ही मिलते हैं। इसी का परिणाम है कि हमारा राष्ट्रीय एवं सामाजिक भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’—जैसा बीज होगा, जैसी पौध होगी, उसी के अनुरूप तो वृक्ष विकसित होगा, पुष्पित, पल्लवित और फलित होगा। आज की युवा पीढ़ी की जो दुर्दशा हो रही है उसका सर्वप्रथम दायित्व तो उनके माता-पिता और परिवार का ही है। वे स्वयं ही दुष्प्रवृत्तियों के शिकंजे में फंसे हुए हैं फिर अपनी संतान को उचित शिक्षा व संस्कार कहां से दे सकेंगे? युवावस्था की प्रारम्भिक स्थिति में अनेक शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। जीवन का यह काल अत्यन्त उथल-पुथल भरा होता है जब वह चारों ओर की परिस्थितियों का अपने अनुसार विवेचन करता है। इसमें अनेक प्रतिमान ध्वस्त होते हैं और नए बनते हैं। इस अवधि में वह अपने अस्तित्व को परिवार व समाज में स्थापित करने का प्रयास करता है। अपनी अस्मिता को खोजता है और ऐसे मार्गदर्शक नायक की तलाश करता है जिसके अनुरूप स्वयं को ढाल सके। इस खोजबीन की उलझन में उसे घर से तो कुछ विशेष मिल नहीं पाता और बाहर उसका सर्वत्र शोषण ही होता है। एक समय था जब अभिमन्यु को गर्भावस्था में ही माता-पिता से शिक्षा और संस्कार प्राप्त हुए थे। आज के माता-पिता एवं समाज के कर्णधार स्वयं ही यह चिन्तन करें कि वे अपने अभिमन्युओं को क्या बना रहे हैं?

पहले युवापीढ़ी को अपने आदर्श ढूंढ़ने के लिए परिवार व समाज के अतिरिक्त पुस्तकों का भी सहारा रहता था जो कि भारतीय संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर हैं। आदर्श व प्रेरक साहित्य के प्रति अभिरुचि में भारी कमी आई है। अश्लील एवं स्तरहीन साहित्य की भरमार है। उच्चस्तरीय साहित्यिक रचनाएं पढ़ने की परम्परा लुप्त हो रही है। युवावर्ग समझ ही नहीं पाता कि वह क्या पढ़े और कैसे पढ़े? देव संस्कृति की इस उपेक्षा के कारण ही आज वह किसी सज्जन, वीर, महात्मा और महापुरुष को अपना आदर्श बनाने के स्थान पर टी.वी. और फिल्मों के पर्दे पर उनको खोजता है। वहां उसे फिल्मों के पर्दे पर उनको खोजता है। वहां उसे हिंसा, अश्लीलता, फैशनपरस्ती, स्वच्छंदता, फूहड़ता आदि के अतिरिक्त कुछ मिलता ही नहीं। इसी सब का अनुसरण करने को वह प्रगतिशीलता समझता है। यही कारण है कि चारों ओर अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा और स्तरहीन आदर्शों की अंधभक्ति ही दिखाई देती है। ऐसे में टी.वी. पर अनेकानेक सैटेलाइट चैनलों द्वारा हमारी लोक-संस्कृति को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का ही यह परिणाम है कि खान-पान, वेश-भूषा, आचार-व्यवहार आदि सभी क्षेत्रों में युवाओं द्वारा पाश्चात्य अपसंस्कृति का अंधानुकरण हो रहा है। भारत की बहुमूल्य सांस्कृतिक परम्पराओं की वह अवहेलना करता है या उपहास उड़ाता है। पाश्चात्य संस्कृति के जीवन मूल्य को अपनाती युवा पीढ़ी अपने देश की संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने लगी है। प्रगतिशीलता के नाम पर नैतिकता का परित्याग और भारतीयता का विरोध विशेष उपलब्धियों को गिना जाता है। उसी को आदर्श हीरो का सम्मान मिलता है।

राजनीतिज्ञों के दुष्चक्र ने तो युवा पीढ़ी को और अधिक उलझा दिया है। शिक्षा केन्द्र तो पूरी तरह से राजनैतिक द्वंद्व का अखाड़ा बन गए हैं। इस युद्ध में युवावर्ग का प्रयोग कच्चे माल के रूप में खुले आम होता है। सुरा-सुंदरी तक उन्हें उपलब्ध कराने में राजनीतिक दलों को कोई हिचक नहीं होती। काले धन की थैलियां तो खुली ही रहती हैं। इस प्रकार के दूषित वातावरण में युवापीढ़ी ऐसी कुसंस्कृति को अपनाने के लिए मजबूर है जहां व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता और नाते-रिश्तों की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यौन उच्छृंखलता को फैशन व आधुनिकता का प्रतीक समझा जाता है जिससे युवक-युवतियां आत्मघाती दुष्चक्र में उलझते जाते हैं। उनकी ऊर्जा और प्रतिभा किसी सार्थक कार्य में लगने के स्थान पर सौन्दर्य प्रतियोगिताओं, फैशन शो और फिल्मों में बर्बाद होती है तथा अपराधी व बुरे लोगों के जाल में उनके फंसने की संभावनाएं बढ़ती जाती हैं। उच्च आदर्शों एवं प्रेरणा स्रोतों के अभाव में वे नित नए कुचक्रों में उलझते रहते हैं। सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व बोध से कटे हुए ऐसे लोगों का जीवन मात्र स्वार्थपरता के संकुचित घेरे तक ही सीमित रह जाता है।



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