किसी साजिश का मोहरा बन रहे हैं लोग
| -K.P. Singh - Apr 25 2018 1:16PM

सोशल मीडिया पर कुछ दिनों से दलितों के लिए बेहद ही अमर्यादित गालियों की बाढ़ आई हुई है। लोग क्रोधित हैं कि उनके देवी-देवाताओं की मूर्तियों पर दलितों ने जूते-चप्पल बरसाये। हालांकि इसमें बहुत कुछ कौवा कान काट ले गया लेकिन कहां जैसी बात है। संघ हिंदुत्व की छतरी को व्यापक बनाने के लिए लंबे समय से परिश्रम कर रहा था। उसकी योजना का परिणाम था कि गत चुनाव में भाजपा को सवर्णों के साथ-साथ पिछड़ों और दलितों का भी व्यापक समर्थन हिंदुत्व के नाम पर मिला। लेकिन भाजपा के राज में सामाजिक सौहार्द के स्तर में जिस इंतहा की गिरवाट आई है उसके चलते संघ की पूरी मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
    जहां तक हिंदू आस्था को दलितों द्वारा चोट पहुंचाये जाने का सवाल है, इसकी वास्तविकता पर विचार होना चाहिए। बाबा साहब अंबेडकर ने 1956 में धर्मांतरण कर लिया था और हिंदू धर्म छोड़कर लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली थी। इस दौरान उन्होंने पूरे दलित समाज का आवाहन किया था कि जातिगत बटवारे को अपने अंदर से मिटाने के लिए उनका अनुसरण करते हुए बौद्ध धर्म की दीक्षा ले लें लेकिन आज बाबा साहब के परिनिर्वाण के इतने वर्षों बाद भी कितने प्रतिशत दलित हैं जिन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली है। यहां तक कि दिवंगत कांशीराम जी और मायावती ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा नही ली। जबकि दोनों धम्म का ढिंढोरा बहुत पीटते रहे। मायावती ने कुछ ही दिन पहले धमकी दी थी कि अगर दलितों पर होने वाले अत्याचार बंद न हुए तो वे बौद्ध धर्म की दीक्षा स्वीकार कर लेगीं। इससे मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि वे अभी तक हिंदू हैं। उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार के समय बौद्ध धर्म के लिए काफी लगाव जताया गया था। जिसके तहत बौद्ध चिन्हों पर आधारित कई सार्वजनिक निर्माण कराये गये।

     बौद्ध पुण्य स्थलों का सुंदरीकरण कराया गया। इसके साथ-साथ मायावती समय-समय पर स्वयं को ही देवी मानने और देवी-देवताओं पर चढ़ावा बंद करने जैसी अपीले भी दलितों से करती रहीं लेकिन मायावती ने बाकायदा धर्म परिवर्तन नही किया। जहां तक हिंदू धर्म पर प्रहार करने के उनके भाषणों का सवाल है हिंदुओं में धार्मिक कुरीतियों पर कटु प्रहारों का रिवाज आम रहा है। संतों तक ने ऐसा किया लेकिन उन्हें हिंदू समाज में निंदित न कर समादृत किया गया। इसलिए दलितों की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मायावती के हिंदू धार्मिक मान्यताओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को बहुत महत्व नही दिया जा सकता। बाबा साहब का दर्जा दलित समाज में आराध्य जैसा है। इसके बावजूद धर्म के मामले में वे दलितों के संस्कार नही बदल सके यह मात्र पहेली जैसी लगती है। वजह यह है कि चाहे अंधा विश्वास कहें, चाहे संस्कारगत भीरुता कहें लेकिन हिंदू धर्म की जड़े दलित समाज में इतनी गहरी हैं कि इसका स्वरूप कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि दलितों की वजह से ही जीवित है। ज्वारे जैसे अनुष्ठानों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी दलित करते हैं। सवर्ण उतनी श्रद्धा के साथ मंदिर नही जाते जैसा दलितों में देखा जाता है जिनकी महिलाएं पर्वों पर कई किलोमीटर पहले से जमीन पर बिछ-बिछ कर मंदिर की ओर आगे बढ़ती हैं।
    हिंदू समाज में दलितों के साथ जो भेदभाव और तिरस्कार का व्यवहार होता रहा है उसके क्षोभ में उनके द्वारा उदगार व्यक्त करना अलग बात है। लेकिन कुल मिलाकर आज भी दलितों में इन्ही संस्कारों के चलते हिंदू देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा मिश्रित डर समाया रहता है। दलित समाज में स्वेच्छा से लोग यह साहस नही कर सकते किसी देवी-देवता की प्रतिमा के साथ कोई उत्पात करें। सच्चाई तो यह है कि इसी डर की वजह से बसपा जैसी पार्टी कई दलित नेता जिलों-जिलों में हैं जिन्होंने मिशन के दौर में धार्मिक अन्याय के खिलाफ आग उगली लेकिन संपन्नता आने के बाद वे पूरी तरह कर्मकांडों में लिप्त हो गये। मायावती को भी इसकी जानकारी मिलती रही लेकिन वे चुप बनी रहीं।
    इसलिए संघ तक को लग रहा है कि हिंदू एकता में दरार डालने की साजिश के तहत यह प्रचारित कराया जा रहा है कि दलितों ने अमुख जगह देव प्रतिमाओं पर जूते-चप्पल चलाये। जिसकी वजह से पहले से दुराग्रह से पीड़ित सर्वण युवक उत्तेजित होकर सोशल मीडिया पर गालियों के साथ दलितों पर पिल पड़े हों। इस अनर्थ को रोकने और क्षति प्रबंधन के लिए संघ के निर्देश पर भाजपा के बड़े नेताओं के दलितों के यहां भोज आयोजित कराये जा रहे हैं। संघ अपने स्तर पर भी दलितों के साथ सहभोज के कार्यक्रम व्यापक रूप से आयोजित कराने मे लग गया है।
    सही बात यह है कि दलितों में अगर किसी ने ऐसा काम किया भी हो तो या तो वह कोई सिरफिरा होगा या अति क्रांतिकारी। इसलिए इसे उसकी व्यक्तिगत धृष्टता के रूप में सीमित संज्ञान में लिया जाना चाहिए। लेकिन पूरे दलित समाज को इसके कारण गरियारे लग जाने के पीछे जो मानसिकता है उसका निवारण आज की सभ्य दुनियां में नितांत आवश्यक है। वरना आधुनिक विश्व में भारत की गरिमा को बहुत बड़ा धक्का पहुंचेगा। अतीतजीवी आज भी ऊंच-नीच और अस्पृश्यता के युग की वापसी चाह रहे हैें जिसकी गंजाइश उन्हें भाजपा की सत्ता में नजर आई तो उन्होंने तांडव कर डाला।

     खास तौर से उत्तर प्रदेश में मायावती के समय बसपा का टिकट जीत की गारंटी बन जाने से सवर्णों को भी उनके दरवाजे पर जिस तरह सिर-मत्था टेकना पड़ा उसकी कुंठा भी इस समय काम कर रही है। लेकिन यह न समाज हित में है न देश हित में। अतीत में सैकड़ों साल की गुलामी का दौर भारत ने सामाजिक एकता न होने की वजह से झेला है। सत्ता में होने पर उफनाने लगना एक अलग बात है लेकिन यह असली पराक्रम नही होता। इसकी परीक्षा तो जब होती है तब पराई हुकूमत दमन करती है। सैकड़ों साल की गुलामी का दौर भारत में इसलिए चला क्योंकि भारतीय समाज का नेतृत्व करने वाली जमात बगावत और पराक्रम का चरित्र तब दिखा नही सकी जब जरूरत थी वरना विदेशी हुकूमतों की वही हालत होती जो अफगानिस्तान और इराक में हो रही है। बहरहाल यह एक लंबी बहस है लेकिन आपस में ही एक दूसरे को चुनौती देने की वजाय राष्ट्रहित का तकाजा है कि हम बाहरी चुनौती के मुकाबले के लिए समाज को एकजुट और कटिबद्ध रखने की तैयारी कैसे कर सकें।



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