राष्ट्रकवि : रामधारी सिंह दिनकर
| -Lal Bihari Lal - Apr 25 2018 4:31PM

जन्मः 23 सितम्बर 1908
देहान्तः 24 अप्रैल 1974

आधुनिक हिंदी काव्य में राष्ट्रीयसांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करने वाले तथा युग चारण नाम से विख्यात। दिनकर जी काजन्म 23 सितम्बर 1908 ई0 को बिहार के तत्कालीन मुंगेर(अब बेगुसराय) जिला केसेमरिया घाट नामक गॉव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नामबाबू रवि सिंह और माता का नाम मनरुप देवी था। इनकी शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल मेंहुई जबकि उच्च शिक्षा पटना कॉलेज में हुई जहॉ से उन्होने इतिहास विषय लेकर बी ए(आर्नस) किया था। दिनकर बाल्यकाल से ही मेधावी थे। इन्हें हिन्दी , संस्कृत,मैथिलि,बंगाली,उर्दू और इंगलिश सहित कई भाषा का ज्ञान था।

एक विद्यालय केप्रधानाचार्य, बिहार सरकार के अधीन सब रजिस्टार,जन संपर्क विभाग के उप निदेशक, लंगट सिंह कॉलेज, मुज्जफरपुर के हिन्दी विभागाध्यक्ष, 1952 से1963 तक राज्य सभा के सदस्य,1963 में भागलपुर विश्वविद्यालयके कुलपति, 1965 में भारत सरकार के हिन्दीसलाहकार (मृत्युपर्यन्त) आदी जैसे विभिन्न पदो को सुशोभित किया एवं अपने प्रशासनिकयोग्यता का परिचय दिया।

साहित्य सेवाओं के लिएइन्हें डी लिट् की मानद उपाधि, विभिन्न संस्थाओं से इनकीपुस्तकों पर पुरस्कार। इन्हें 1959 में साहित्य आकादमी एवं पद्मविभूषण सम्मान सेसम्मानित किया गया। 1972 में काव्य संकलन उर्वशी के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कारद्वारा सम्मानित किया गया था। दिनकर के काव्य में परम्मपरा एवं आधुनिकता का अद्वितीय मेल है।

राष्ट्रीयता दिनकर कीकाव्य चेतना के विकास की एक अपरिहार्य कडी है। उनका राष्ट्रीय कृतित्व इसलिएप्राणवाण है कि वह भारतवर्ष की सामाजिक, संस्कृतिक और उनकीआशा अकाकांक्षाओं को काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने में सक्षम है। वेवर्त्तमान के वैताली ही नहीं बल्कि मृतक विश्व के चारण की भूमिका भी उन्हें निभानीपडी थी। परम्मपरा एवं आधुनिकता की सीमाओं से निकलकर उनका ऐतिहासिक एवंसांस्कृतिक दृष्टिकोण ही दिनकर की राष्ट्रीयता के फलक को व्यापक बनाती है।

दिनकर के काव्य में जहॉअपने युग की पीडा का मार्मिक अंकन हुआ है,वहॉ वे शाश्वत औरसार्वभौम मूल्यों की सौन्दर्यमयी अभिव्यक्ति के कारण अपने युग की सीमाओं काअतिक्रमण किया है। अर्थात वे कालजीवी एवं कालजयी एक साथ रहे हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन काजितना सुन्दर निरुपण दिनकर के काव्य में उपलब्ध होता है,उतनाअन्यत्र नहीं?उन्होने दक्षिणपंथी और उग्रपंथी दोनों धाराओं को आत्मसात करते हुएराष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास ही काव्यवद्ध कर दिया है।

सन 1929 में 25 अक्टूबर को लॉर्ड इरविनने जब गोलमेज सम्मेलन की घोषणा की तो युवको ने विरोध किया। तत्कालीन भारत मंत्रीवेजवुड के द्वारा उक्त ब्यान को 1917 वाले वक्तव्य का पुर्नरावृति माना। 1929 में कांग्रेस का भी मोह भंग हो गया। तब दिनकर जी ने प्रेरित होकर कहा था-

टूकडे दिखा-दिखा करतेक्यों मृगपति का अपमान।
ओ मद सत्ता केमतवालोंबनों नायूंनादान ।।

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी कवि युगधर्म से जुडा रहा। उसने देखा कि स्वतंत्रता उस व्यक्ति के लिए नहीं आई है जो शोषितहै बल्कि उपभोग तो वे कर रहें हैं जो सत्ता के केन्द्र में हैं। आमजन पहले जैसा हीपीडित है, तो उन्होंने नेताओं पर कठोर व्यंग्य करते हुए राजनीतिकढाचे को ही आडे हाथों लिया-

टोपी कहती है मैं थैली बनसकती हू ।

कुरता कहता है मुझेबोरिया ही कर लो।।

ईमान बचाकर कहता हैऑखे सबकी,

बिकने को हू तैयार खुशीसे जो दे दो ।।

दिनकर व्यष्टि और समष्टि के सांस्कृतिकसेतु के रुप में भी जाने जाते है, जिससे इन्हेंराष्ट्रकवि की छवि प्राप्त हुई। इनके काव्यात्मक प्रकृति में इतिहास, संस्कृति एवं राष्ट्रीयता का वृहद पूट देखा जा सकता है। दिनकर जी ने राष्ट्रीय काव्य परंपरा के अनुरुप राष्ट्र और राष्ट्रवासियोंको जागृत और उदबद बनाने का अपना दायित्व सफलता पूर्वक सम्पन्न किया है। उन्होने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रीय कवियों की राष्ट्रीय चेतना भारतेन्दू से लेकर अपने सामयिक कवियों तकआत्मसातकी और उसे अपने व्यक्तित्व में रंग कर प्रस्तुत किया।

किन्तु परम्परा केसार्थक निर्वाह के साथ-साथ उन्होने अपने आवाह्न को समसामयिक विचारधारा से जोडकरउसे सृजनात्मक बनाने का प्रयत्न भी किया है।“उनकीएक विशेषता थी कि वे साम्राज्यवाद के साथ-साथ सामन्तवाद के भी विरोधीथे। पूंजीवादी शोषण के प्रति उनका दृष्टिकोण अन्त तक विद्रोही रहा। यही कारण है किउनका आवाह्न आवेग धर्मी होते हुए भी शोषण के प्रति जनता को विद्रोह करने कीप्रेरणा देता है। ’अतः वह आधुनिकता के धारातल कास्पर्श भी करता है।

इनकी मुख्य कृतियॉः

काव्यात्मक- रेणुका, द्वन्द गीत, हुंकार(प्रसिद्धी मिली), रसवन्ती (आत्मा बसतीथी)चक्रवात. धूप-छांव, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथि (कर्ण पर आधारित), नील कुसुम, सी.पी. और शंख, उर्वशी (पुरस्कृत), परशुराम प्रतिज्ञा, हारे को हरिनाम आदि।

गद्य- संस्कृति का चार अध्याय, अर्दनारेश्वर, रेती के फूल, उजली आग,शुध्द कविता की खोज, मिट्टी की ओर, काव्य की भूमिका आदि।



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