जी हाँ! यह संवेदनशीलता नहीं बल्कि हृदयहीनता का एक उदाहरण है......
| Posted by- Editor - May 9 2018 4:13PM

जरा रूकिए..............देखिए.....यह क्या है? कौन पड़ा है सड़क पर? गौर से देख लीजिए कहीं कोई आपका अपना तो नहीं.......और न भी हो तो मनवता के लिहाज से आपका क्या फर्ज बनता है कुछ फर्ज तो पूरा कीजिए। माना कि 21वीं सदी है, सबकी भागम-भाग जिन्दगी है। हर कोई रफ्तार में ही है। होना भी चाहिए। रफ्तार खतम तो सब कुछ खतम। अपना देश लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत संचालित होता है। कोई जरूरी नहीं कि हर कार्य प्रशासन या फिर सरकारी अहलकार ही करें। आम आदमी की संख्या से उनकी संख्या काफी कमतर है। आपका और हमारा क्या दायित्व है इसका भी बोध होना चाहिए।

मसलन- जब हम नित्य अपने शरीर व घर की साफ-सफाई करते हैं तो सहन सफाई कर्मी आकर साफ करे इस इन्तजार में क्यों रहते हैं? सफाई कर्मी यदि नहीं आया तो घर का सहन भी गन्दा ही रह जाएगा। और यदि यह क्रम कई दिन तक चला तो हमारे घर का सहन कूड़े का डम्प बन जाएगा। खैर! सड़क पर गिरे-पड़े लोगों की दशा दुर्दशा हम तमाशबीनों की तरह ही देखते हैं और अपनी तरह से अनेकानेक टिप्पणियाँ करते हुए एकत्र भीड़ की इकाई के रूप में शामिल हो जाते हैं। देखा गया है ये कि घटना-दुर्घटना उपरान्त अनेकों लोग मृत शरीरों पर से कीमती वस्तु व आभूषण उतार लेते हैं। उनके द्वारा किया जाने वाला यह कृत्य क्या कहलाएगा......? मानव संवेदनहीनता या कुछ और.....?

शहर की सड़कों पर पड़ा मानव शरीर तमाशबीनों के लिए कौतूहल का विषय हो सकता है। ये तमाशबीन एक दम बेचारा बने प्रशासन और पुलिस की ही खामियाँ निकालते हुए उन्हीं पर दोषारोपण करते हैं। किसी को क्या पड़ी है कि अचेत शरीर को उठाकर अस्पताल ले जाए। उन्हें तो इंतजार रहती है एम्बुलेंस की, सरकारी मुलाजिमों की। इन सबके पीछे बहुत से तर्क हो सकते हैं। थाना-पुलिस की पूछतांछ का भय................कौन उठाए जहमत..........पड़ा है पड़ा रहने दो.........कोई सरकार कर्मचारी आएगा तो ले जाएगा।

फर्ज अदाएगी के लिए 100, 108 और 102 डायल कर दो........और सड़क पर पड़े घायल, बेहाश या बीमार व्यक्ति को देखकर आनन्द उठाओ, चटखारे लेकर बातें करो। होगा वह किसी अन्य का सगा- बाप, भाई, बेटा, माँ, बहन, बेटी आदि....इत्यादि.....।

अबे चुप हाईटेक युग है। ला ला खैंच एक फोटो डाल दे फेसबुक पे.......भेज दे व्हाट्सएप्प पर......... बघार दे ज्ञान..........तेरे इस कार्य को अन्य ज्ञानियों द्वारा जरूर सराहा जाएगा। आजकल लगता है कि समूचा मानव प्राणी खलिहर है। वह हमेशा सोशल साइट्स का अवलोकन करता देखा जा सकता है.......। स्कूल/कालेजों से दूर रहने वाला हर मानव प्राणी स्मार्ट फोन लिए अपने नेत्रों की ज्योति को स्वयं अपनी करतूतों से समाप्त कर रहा है। खैर छोड़! आ खैंच फोटो........डाल दे फेसबुक पर.........सेन्ड कर दे व्हाट्स एप्प पर क्योंकि इससे बड़ा पुनीत कार्य और कोई नहीं।

खाने को नहीं, नहाने को तड़के.........जी हाँ स्मार्ट फोन रखने वालों में अधिकांश लोग निकम्मे और होपलेस लोगों के घरों की माली हालत कुछ ऐसी ही है। कुछ भी हो इनसे बड़ा कोई फिलासफर नहीं..........ज्ञानी नहीं...........तार्किक नहीं। बेचारे/बेचारा होपलेस।

मित्रों! एक फोटो संयोग से हमें भी फेसबुक पर देखने को मिली साथ ही चस्पा करने वाले बन्धु की पोस्ट पढ़ने का सुअवसर मिला। क्षमा चाहेंगे........फेसबुक के अरण्य में हम भी लहलहाते रेंड़ हैं। क्या करें इस सोशल साइट से बहुत कुछ जानने-सुनने के साथ ही चिन्तन-मन्थन की सामग्री मिलती है। जबरिया ज्ञानियों के ज्ञान और तर्क से दो-चार होना पड़ता है। घनश्याम भारतीय जैसे पत्रकार ने उक्त फोटो अपनी टिप्पणी के साथ 2 मई 2018 दिन बुधवार को पोस्ट किया था। जिसमें उन्होंने लिखा है कि- ‘इसे प्रशासन की निर्लज्जता कहें या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ...मंगलवार को अकबरपुर रोडवेज के निकट समाचार पत्र विक्रेता शैलेंद्र के घर के सामने यह अज्ञात महिला चिलचिलाती धूप में घंटों तड़पती रही और फोन के बावजूद भी न तो एंबुलेंस पहुंची और न ही कोतवाली पुलिस ...जबकि दोनों को शैलेंद्र भाई ने दिन में 1:30 बजे सूचना दे दिया था।’’ और साथ ही फोटो भी चस्पा किया है।

माना कि भारतीय जी उस मौके पर नहीं थे, परन्तु जिस शैलेन्द्र भाई के घर के सामने उक्त अज्ञात महिला चिलचिलाती धूप में तड़प रही थी.......क्या शैलेन्द्र भाई और आस-पास तथा उधर से गुजरने वाले लोग एम्बुलेन्स व पुलिस को सूचना देने तक ही अपनी नैतिक व मानवीय जिम्मेदारी समझते रहे। क्यों नहीं इन लोगों का हृदय पसीजा और विवेक जागा...............। यदि चाहते तो उक्त महिला को निजी या सहयोग व्यवस्था से अस्पताल पहुँचा देते। आश्चर्य तो तब और बढ़ जाता है जब तमाशबीनों में कुछ लोग स्मार्ट फोन से फोटों खैंच जैसा कार्य करने लगते हैं। यदि इस अचेत महिला के साथ कुछ लोग बैठकर सेल्फी खिंचवाते तो बात ही कुछ और होती..........। फोटो कमेन्ट्स और अन्य पोस्ट संग्रहणीय हो जाते....। जो भविष्य के लिए सनद रहते। इस तरह का फोटो कालान्तर में संग्रह कर्ता को आर्थिक रूप से काफी सुदृढ़ करने वाला साबित होता।

मित्रों! ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर.........। मन में जो विचार आया उसे लिख दिया। मेरा अपना मानना है कि आप की अदालत सर्वोच्च है। मुझे क्या हर किसी को इस महापंचायत के सम्माननीय सदस्यों की टिप्पणियों से गुरेज नहीं होना चाहिए और न होता होगा.....। हमारी तरफ से बस इतना, शेष सब आप पर.......।

वरिष्ठ लेखक/पत्रकार भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी के फेसबुक वाल से साभार......



Browse By Tags



Other News