काशी विश्वनाथ कोरीडोर, सुलग रही है काशी
| Rainbow News - May 14 2018 3:44PM

-बृजेश सती/ काशी में तापमान दिनों दिन बढ रहा है। आने वाले दिनों में और अधिक बढेगा। लेकिन इस सबके बीच काशी के लोग अपने आराध्यों व अपने पूर्वजों की विरासत को लेकर संशकित हैं। कुछ ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व के मंदिरों को गिरा दिया गया और कुछ की तैयारी है। दरअसल ये सब काशी विश्वनाथ कारीडोर के चलते किया जा रहा है। प्रसासन की इस कार्रवाई को लेकर काशीवासी सडकों पर उतरकर अपना विरोध जता रहे हैं। प्रसासनिक स्तर से लोगों को यह नही बताया जा रहा है कि इस योजना में कितने मंदिरों, भवनों व व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को हटाया जायेगा। यही लोगों के विरोध की मुख्य वजह भी है। प्रशासन व आदोलनकारियों के बीच संवाद हीनता का आलम यही रहा तो आने वाले समय में स्थिति असामान्य हो सकती है।  
विश्वनाथ के जयकारों से गूंजायमान रहने वाली काशी में इन दिनों, काशी को काशी रहने दो के नारे सुनाई दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सरकार यहां काशी विश्वनाथ कोरीडोर नाम से महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य कर रही है। इस योजना को अलग अलग नाम दिया जा रहा है। कोई इसे विश्वनाथ सुन्दरीकरण योजना, गंगा पाथ वे योजना बता रहा है। खैर जो भी हो, लेकिन काशी मंदिरों के घ्वंस से सुलग जरूर रही है। अंादोलनकारियों व प्रशासन के योजना को लेकर अपने अपने तर्क व तथ्य हैं। आंदोलनम का नेतृत्व कर रहे स्वामी अभिमुक्तेशरानंद इसे विध्वसात्मक विकास बता रहे हैं। उनकी अबुवाई में चलाये जा रहे आंदोलनम में विभिन्न सामाजिग वर्ग भी जुड रहे हैं। लेकिन आंदोलनम अभी वह गति नहीं पकड पाया है। इसका अहम कारण लोगों का इस योजना को लेकर अलग अलग मत है। कुछ लोग इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उनको लगता है कि इस कोरीडोर के बनने से यहां तीर्थाटन व पर्यटन गतिविधि बढेगी। जबकि कुछ लोग इसे सरकारी धन का दुरूपयोग बता रहे हैं।  
इधर प्रशासन ने योजना पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके तहत काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे 166 भवनों, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों व कुछ प्रमुख मंदिरों को हटाये जाने का प्रस्ताव है। इसके शुरूआती चरण में कुछ प्राचीन मंदिरों व भवनों को घ्वंस कर दिया गया है।
कुलमिलाकर मंदिर बचाओ आंदोलनम अभी अपने शुरूआती दौर में है। काशीवासियों की ओर से अपेक्षित सहयोग आंदोलनकारियों को नहीं मिल पाया है। जनसमर्थन जुटाने के लिये प्रभावी रणनीति पर काम करने की आवश्यकता है। आदोलन की सफलता जन समर्थन पर काफी हद तक निर्भर है। अब देखना दिलचस्प होगा कि स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद आंदोलन को कैसे और किस तरह अंजाम तक पहुचाते हैं।
काशी का ऐतिहासिक महत्व
गंगा के निकट वसा यह धार्मिक नगर भगवान शिव को समर्पित है। ऐसी पौराधिक मान्यता है कि इस नगर की स्थापना स्वयं भगवान शिव ने की थी। इसके बारे में कहा जाता है कि विश्व के सबसे प्राचीन शहरों में है। सभी प्रमाणिक हिन्दू धर्म ग्रन्थों में इसका उल्लेख किया गया है। स्कंद पुराण में इस शिव नगरी की महिमा का वर्णन 15,000 श्लोकों में किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि यह धार्मिक नगरी शिव के त्रिशूल पर बसी है। इसलिये इसे अभिमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है।
इसके  अलावा इस स्थान का एक और महत्व है। मणिकर्णिका घाट पर ही माता सती ने अपने शरीर को अग्नि को अर्पित कर दिया था। कहा जाता है कि यही ंपर उनके कान का गहना भी गिरा था। मणिकर्णिका घाट पर अग्नि हमेशा प्रज्ज्वलित रहती है।
काशी में जीवन के हर रंगों का समावेश है। यहां कहीं हसता हुआ बचपन है तो कहीं बढता हुआ यौवन। भोले के जयकारों से सरावोर रहने वाली इस नगरी में माया और मोह के संयोग को जीवंत देखा जा सकता है। यहां एक तरफ दशमेश्रर घाट पर वैदिक मंत्रों गंुजायमान रहते ह,ैंं तो दूसरी ओर इससे लगे घाट पर शरीर के अग्नि में भष्म होने का मंजर होता है।
स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद ने संभाला मोर्चा
जब जब पृथ्वी पर धरम की हानी होगी, तब तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर अधर्मियों को सबक सिखायेंगे। आज भगवान के द्वारा स्वयं स्थापित किये गये एक पौराणिक व ऐतिहासिक नगर के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। हमारे प्राचीन मंदिरों का विध्वंस किया जा रहा है। सदियों से यहां रह रहे लोगों को बेघर किया जा रहा है। धार्मिक नगर का इतिहास व भूगोल बदला जा रहा है। जो किसी भी सूरत में क्षम्य नहीं है। इसेे लिये प्राणों का उत्सर्ग भी करना पडे तो वो तैयार हैं। यह कहना है, ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी शिष्य स्वामी अथमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का। काशी में मंदिरों के तोडे जाने के लेकर वो अपने अनुयायियों व अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर मदिर बचाओ आंदोलनम का नेतृत्व कर रहे हैं। गुजरे एक सप्ताह से अंादोलनम को विभिन्न सामाजिक संगठनों का भी सहयोग मिल रहा है। आंदोलनम के बारे में स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उनके द्वारा  प्रशासन के समक्ष सात मांगे रखी गई हैं। उस पर प्रशासन व सरकार को जवाब देना चाहिये। प्रशासन द्वारा लोगों से वार्ता न करने पर भी उन्होंने नाराजगी जताते हुये कहा कि लोकतांत्रिक प्रकिया के तहत ऐसा किया जाना चाहिये। स्वामी अभिुमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि सरकार की इस संदर्भ में जो योजना प्रस्तावित है उसको काशवासियों के सामने रखा जाना चाहिये।
आंदोलनम के समर्थन में उतरे सामाजिक संगठन
काशी विश्वनाथ कोरीडेार के नाम पर मंदिरों के विध्वंस के खिलाफ समाज के विभिन्न वर्गो का साथ मिलने लगा है। संतों की अगुवाई में चले  रहे मंदिर बचाओ आंदोलनम डोम समाज, यादव समाज,दलित वस्ती के लोग भी शामिल हो गये हैं। लेकिन बडा सवाल यही है कि विभिन्न वर्गों के लोग क्या आदोलनम के साथ अंतिम समय तक जुडे रहेंगे।
उत्तराखंड से भी समर्थन मिला
काशी कोरीडोर के विरोध में स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद की अगुवाई में चलाये जा रहे मंदिर बचाओ आंदोलनम को उत्तराखंड में भी समर्थन मिल रहा है। गंगा आरती सेवा समिति रूद्रप्रयाग व नव क्राति संगठन उत्तरकाशी केन्द्र व उत्तरप्रदेश सरकार से पौराणिक महत्व के मंदिरों के घ्वस्तीकरण पर चिंता जाहिर की है। दोनों संगठनों से जुडे लोगो का कहना है कि विकास के नाम पर ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व के मंदिरों को तोडा जाना उचित नहीं है।
गंगा सेवा समिति, रूद्रप्रयाग के संरक्षक सचिदानंद सेमावाल का कहना है कि हमारे ऐतिहासिक धरोहरों की कीमत पर काशी का विकास नहीं किया जाना चाहिये। सरकार को अपनी योजना को धरातल पर उतारने से पहले काशीवासियों को विश्वास में लेना चाहिये। यमुना घाटी के कथा व्यास आचार्य लोकेश बडोनी ने मंदिरों तोडे जाने की निंदा करते हुये कहा कि पौराणिक मंदिरों को तोडकर कर सीमेंट कंकरीट के जंगल खडा करना हास्यास्पद है। सरकार को अपने निर्णय पर पुर्नविचार करना चाहिये। 



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