देखिये आगे-आगे होता है क्या
| -K.P. Singh - May 25 2018 12:14PM

कर्नाटका में मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी एकता के प्रचंड शो से सत्तारूढ़ खेमे की नींद निश्चित रूप से उड़ गई होगी। अन्य लोगों के साथ-साथ इस शो में सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हुए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भले ही अगले चुनाव में पार्टी के लिए 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट बटोरने का दावा कर रहे हों लेकिन वे खुद भी जानते हैं कि यह काम नामुमकिन है। इसलिए वृहत्तर विपक्षी एकता 2019 के चुनाव में केंद्र से भाजपा की अलविदाई का कारण बन सकती है। लेकिन सवाल इस बात का है कि क्या बैंगलौर का शो 2019 के चुनाव में विपक्षी महागठबंधन के रूप में परणित हो पायेगा।
    गठबंधन की राजनीति आसान काम नही है। हाल के दौर में विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके प्रणेता थे। उनसे व्यक्तिगत ईष्र्या के कारण विपक्षी दिग्गज भी उनके नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने से बाज नही आते थे। लेकिन सही बात यह है कि जब तक वीपी सिंह रहे संयुक्त मोर्चा, बाम मोर्चा बार-बार बिखराव के बावजूद चुनौतीपूर्ण मौके पर आकार लेता रहा। उन्हें कमतर दिखाने के लिए उनका श्रेय मुलायम सिंह के खाते में डाल दिया जाता था। लेकिन अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मुलायम सिंह में सबको साथ लेकर चलने का गुण न होने के चलते ही विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद रामो-बामो स्थाई तौर पर बिखर गया। दक्षिण पंथी खेमें की बात यहा नही हो रही है। लेकिन बेशख इस खेमें में अटल बिहारी बाजपेयी ने गठबंधन के मामले में बेहतर प्रयोग किया और 24 दलों के गठबंधन के साथ एनडीए को लंबे समय तक सुचारू बनाये रखा। बात इसमें दूसरे खेमें की हो रही है। इसमें विरासत में कांग्रेस को मिले सर्व सत्तावादी चरित्र के बावजूद सोनिया गांधी ने गठबंधन राजनीति में साख कमाई। इसीलिए 10 वर्षों तक मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में गठबंधन सरकार चल सकी। सोनिया गांधी अपनी बीमारी व पुत्र राहुल गांधी को पूरी तरह स्थापित कर देने की जरूरत के तहत नेपथ्य में जाने का इरादा बना चुकी थीं लेकिन ऐन समय उन्हें लगा कि उनके लिए राजनीति से मुक्ति प्राप्त करना आसान नही है। क्योंकि राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने के बावजूद गठबंधन राजनीति के लिए स्वीकार्यता नही बन पा रही थी। ऐसे में सोनिया गांधी एक बार फिर आगे आईं।
    कर्नाटका में भले ही बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नही मिल पाया था लेकिन उसके सबसे बड़ी पार्टी बनकर कांग्रेस को सत्ता की दहलीज के बाहर खड़ा कर देने से नरेंद्र मोदी को अपना करिश्माई मिथक मजबूत करने में काफी मदद मिली थी। इसमें अगर उनकी सरकार बनना कर्नाटका में कामयाब हो जाता तो 10 से 20 प्रतिशत इस आधार पर फ्लोट होने वाला वोटर कि ताकत किस ओर है भाजपा की ओर पूरी तरह रुख कर जाता। यह शक्ति पूजक देश है। अगर यहां किसी की यह इमेज बन जाये कि वह अपराजेय है तो 20 प्रतिशत यही सरेंडरवादी तबका बिना किसी औचित्य और तर्क के उसके साथ हो जाता है। इसीलिए लोहिया जी को जरूरत महसूस हुई कि देश में लोकतंत्र को सहज बनाना है तो यह साबित करके दिखाना होगा कि कांग्रेस भी पराजित हो सकती है। इसके लिए उन्होंने गैर कांग्रेसवाद का नारा देते हुए जनसंघ को भी साथ लेने में परहेज नही किया। सोचा कि जब कांग्रेस को एक बार गिरा लेगें तब विचारधारा के आधार पर लामबंदी का खेल वे सही तरीके से शुरू कर पायेगें। सोनिया गांधी ने भी कर्नाटका के मामले में इसी मर्म को ख्याल में रखा। उन्होंने सोचा कि कर्नाटक में भाजपा ने सरकार बना ली तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी उसके लिए माहौल बदल जायेगा। इसलिए उन्होंने पहल करके जेडीएस के सामने उसे मुख्यमंत्री बनाने की शर्त स्वीकार करते हुए गठबंधन की पेशकश कर दी। इसके बाद जब उन्होंने भाजपा की सरकार बन जाने के बावजूद अदालती सहयोग से कर्नाटका की लड़ाई जीत ली तो मंजर बदल गया। इसके बाद उन्होंने एक कदम और आगे बढ़कर जेडीएस को प्रेरित किया कि बैंगलौर के शपथ ग्रहण समारोह में समूचे विपक्ष को न्यौता दिया जाये। इस तरह शपथ ग्रहण समारोह में किये गये शो ने विपक्ष के मनोबल को एक बार फिर पूरे देश में आसमान पर पहुंचा दिया है। इसी महीने उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में अगर इतनी अधिक सीटे नही मिलती तो भाजपा को केंद्र में स्पष्ट बहुमत नही मिल सकता था। इसलिए उत्तर प्रदेश में भाजपा का खेल बिगाड़ने को विपक्ष सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी ही है। लेकिन सम्पूर्णता में अपने लिए लाभ को देखते हुए वह सपा-बसपा गठबंधन के पीछे चलने की हामी भर चुकी है। कर्नाटका के शो से कैराना और नूरपुर के परिणाम विपक्ष के हक में जाने के 90 फीसदी आसार बन गये हैं। अमित शाह चाहे जितने जमीन-आसमांन के कुलाबे जोड़ें लेकिन धरातल की हकीकत कुछ और ही कह रही है।
    फिर भी विपक्षी एकता में अभी कई पेंच हैं। कुछ ही दिन पहले विपक्षी गठबंधन की सरकार के आसार 2019 में पैदा होने की स्थिति में प्रधानमंत्री कौन बन सकता है यह सवाल अखिलेश से पूंछा गया था। अखिलेश ने इसके जबाव में अपने पिता के नाम को एक बार फिर स्मरण कर लिया। जिससे लगा कि कहीं इसी बिंदु पर विपक्षी एकता की गाड़ी अटक न जाये। सबसे ज्यादा भड़कने का खतरा मायावती से था क्योंकि उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते मुलायम सिंह को रिटायर माना जा चुका है। ममता बनर्जी व शरद पवांर को राहुल गांधी को नेता मानने में असुविधा है। ऐसे में यह नजर आ रहा है कि अगर विपक्ष के सपने साकार होते है तो मायावती का नाम नाटकीय ढंग से प्रधानमंत्री के लिए सामने आ सकता है। उनके पास सीटे भी हो सकता है कि कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा हों। अखिलेश को अभी दिल्ली की राजनीति के लिए इंतजार करने में कोई दिक्कत नही है और मायावती को वे बुआ मानते हैं। कांग्रेस भी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुत प्रबलता के साथ प्रधानमंत्री का दावा करे। इसमें संदेह है क्योंकि राहुल गांधी पद के लिए बहुत लालायित नही हैं। अगर यह होता तब तो मनमोहन सिंह बीच में ही ड्राप हो जाते और राहुल गांधी कुर्सी संभाल रहे होते। ऐसे में अखिलेश द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए एक बार फिर नेताजी का नाम अप्रत्याशित तौर पर आगे किये जाने से मच्छिकापाते की स्थिति बन जाने का जोखिम पैदा हो गया था। लेकिन यह ठीक रहा कि मायावती ने इसे बहुत संज्ञान में नही लिया और रंग में भंग का खतरा टल गया। इस तरह के कई और मोड़ अभी विपक्षी राजनीति में आने हैं। देखिये आगे-आगे होता है क्या।



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