बसपा में उलटफेर की अंर्तकथा
| -K.P. Singh - May 28 2018 11:57AM

बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार से पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद छीन लिया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए खुद आनंद कुमार ने उन्हें पद से हटाने की पेशकश की थी। मायावती ने पहले आनंद कुमार के पुत्र को भी पार्टी में कोई बड़ी जिम्मेंदारी सौंपने का संकेत दिया था। लेकिन इस पर अब उन्होंने यह कहकर स्थाई विराम लगा दिया है कि वे और उनके बाद होने वाले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के जीवन में और उनकी मृत्यु के बाद भी उनके परिवार का कोई सदस्य बसपा में पद प्राप्त नही कर सकेगा।

मायावती नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में उच्च परंपराओं की स्थापना और पालन की कायल कभी नही रहीं। हाल में सरकारी बंगला खाली कराने के प्रकरण में भी उन्होंने जिस तरह से पैतरेबाजी की है उससे भी यह जाहिर होता है कि वे नैतिक मान्यताओं की बहुत ज्यादा परवाह नही करतीं। इसके बावजूद आनंद कुमार को पार्टी में उपाध्यक्ष पद से हटाने का फैसला उन्होंने लिया। जिसे अगर वे अप्रत्याशित और चैकाने वाले कदम के रूप में देखा जाये तो गलत नही होगा। इसके चलते राजनीतिक विश्लेषक उन कारणों की पड़ताल के लिए जिज्ञासु होगें जिसके कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। आनंद कुमार समेत अपने पूरे परिवार को राजनीति में हमेशा के लिए नेपथ्य में धकेलने के उनके एलान के क्या निहितार्थ हैं इस पर अटकलों का बाजार गर्म होगा।

एक कारण तो स्वयं मायावती ने बताया है कि आनंद कुमार की देखादेखी में परिवार के अन्य सदस्य और रिश्तेदार भी पार्टी में पद के लिए उन पर दबाव बनाने लगे थे। मायावती का तुनुक मिजाज स्वभाव सर्व विदित है। इसलिए वास्तव में मायावती ऐसे दबाव के चलते भड़क गई हों और उन्होंने आनंद कुमार को हटाने के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष के परिवार के सदस्यों के लिए पार्टी के किसी पद पर पहुंचने के सारे रास्ते बंद करने की भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली हो। कांशीराम बहुजन आंदोलन के प्रणेता थे। जब उन्होंने यह आंदोलन शुरू किया था तो दलित समेत उनका लक्षित सारा समाज बेहद कमजोर स्थिति में था।

नैतिक बल जगाकर उन्हें निर्भीक बनाया जा सकता था जिसके लिए उन्होंने स्वयं को त्याग के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। राजनीतिक मिशन की अपने परिवार से दूरी बनाकर उन्होंने ऐसा काम किया जो भारतीय समाज में बहुत बड़े व्रत का महत्व रखता है। परिवार से मोह भारतीय समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है। विदेश से आईं सोनिया गांधी भी इस मोह से अपने को मुक्त नही रख पाईं। यहां तक कि कांग्रेस को परिवारवाद के नाम से चिढ़ाने और नीचा दिखाने वाले मोदी भाजपा में ऐसी आचार संहिता लागू नही कर पाये जिससे उनकी पार्टी में लोग परिवारवाद से कतराने के लिए मजबूर हो जाते। मोदी युग में भाजपा नेताओं के परिवार के सदस्यों को छुटटा टिकट बटे हैं। जिससे राहुल गांधी का अमेरिका में जाकर यह ब्यान सही साबित हुआ है कि वंशवाद और परिवारवाद भारतीय समाज की अनन्य विशेषता है।

कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया था क्योंकि उनका कांशीराम के परिवार से दूर-दूर तक कोई नाता नही था। कांशीराम की दूसरी प्रतिज्ञा थी कि वे पार्टी की मजबूती के लिए हर तरह से पैसे उगाहने में विश्वास करते थे। लेकिन पार्टी कोष से स्वयं की सुख-सुविधा के लिए फिजूलखर्ची करने का उनका कोई विश्वास नही था। इसलिए उन्होंने अपना जीवन बहुत सादगी से गुजारा और खुद कोई जायदाद भी नही बनाई। दावा तो मायावती का भी इसी रास्ते पर चलने का था लेकिन उन्होंने इन हदों को अमल में बिल्कुल नही माना। उन्होंने अपने परिवार को भी राजनीति में स्थापित करने की चेष्टा की और पार्टी चलाने के नाम पर इकटठा किये गये फंड से अपने जीवन को ऐश्वर्यपूर्ण बनाने में भी कोई कसर नही छोड़ी। इसके लिए उनकी भत्र्सना हुई लेकिन लोकलाज की परवाह उन्हें डिगा नही सकी। क्योंकि उन्हें मालूम था कि उनके समर्थकों का मोहभंग उनसे नही होगा चाहे वे जो करें।

ऐसा नही कि यह विश्वास उन्हें अपने किसी इंद्रजाल की वजह से हो जिसके जादू में उन्होंने अपने समर्थकों को बांध रखा हो। उन्होंने अपने समर्थकों के स्वाभिमान की रक्षा और उत्थान के लिए निश्चित रूप से इतना ठोस योगदान दिया है जिससे वे अपने समर्थकों की ईश्वरीय किस्म की आस्था की केंद्र बन गई हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की विरादरी को उनके चार बार के शासनकाल की वजह से जिस सम्मान और प्रभाव की प्राप्ति हुई है उस पर जोर किसी दूसरे राज्य में नही है। सही बात यह है कि नैतिक व्यवस्था के अनुभव विरोधाभासों के साथ बहुआयामी है। एक आयाम यह है कि यह नैतिक व्यवस्था संयम, सादगी, अपरिग्रह जैसे मूल्यों की शाश्वत प्रासंगिकता को मान्य करने के लिए बाध्य करती हैं। जिससे भौतिक विकास के नाम पर इनसे समझौता करने की छूट नही दी जा सकती। दूसरा आयाम तब अनुभव होता है जब वर्गीय समाज में नैतिक मूल्यों का इस्तेमाल साजिश के उपकरण के बतौर किया जाने लगता है।

रूसो कहता था कि हर धन संचय के पीछे कोई अपराध होता है। वैभव के संसाधनों के अत्याधिक केंद्रीयकरण के बाद जब कुलीन वर्ग उक्त अपराध को भुलाकर यथा स्थिति के लिए ईमानदारी जैसे मूल्यों की दुहाई देने लगता है ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी वर्ग के लिए साधनों की पवित्रता तक सीमित रहने का कोई औचित्य नही रह जाता। हमारी आजादी की लड़ाई में गर्मपंथी देशभक्तों ने हथियार खरीदने के लिए पैसे की व्यवस्था हेतु डकैतियां तक डालने का रास्ता तक अपनाया। इसी तर्ज पर दबा-कुचला वर्ग अन्याय की व्यवस्था बदलने का दम भरते हुए राजनीति पर कब्जा करने के लिए आतुर अपने मसीहाओं के इरादे में नैतिकता को रुकावट नही बनाना चाहता जिसका प्रकटन मायावती से लेकर लालू प्रसाद यादव के संदर्भ में देखा जा सकता है।

महाभारत जैसे हमारे प्राचीन गं्रथों तक में इस तरह की विरोधाभासी प्रवृत्तियों का वर्णन है। कौरवों की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए धर्मयुद्ध यानी नैतिकता की दुहाई को कृष्ण ने अनसुना किया जबकि वे भगवान थे। कर्ण वध और दुर्योधन वध में उन्होंने युद्ध की मर्यादा के नाम पर जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे पांडवों को पीछे नही हटने दिया था। जहां तक कि थोथी नैतिकता का मजाक उड़ाने के लिए उन्होंने युद्ध में स्वयं हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा को सांकेतिक तौर पर दरकिनार करने के लिए रथ का पहिया समर भूमि में उठा लिया था। जो भी हो मायावती किसी लक्ष्मण रेखा से बंधी रहने में विश्वास नही करतीं लेकिन भाई के मामले में नैतिक लक्ष्मण रेखा का हवाला उन्होंने क्यों दे डाला इस असलियत की परतें खुलने के लिए अभी कुछ और समय का इंतजार करना पड़ेगा।



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