अच्छे दिनों के फीके नतीजे
| -Javed Anis - May 29 2018 12:47PM

(सन्दर्भ- मोदी सरकार के चार साल)

मोदी सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिये है इस दौरान वे लगातार अपने आपको मजबूत करते गये हैं, भाजपा ने एक के बाद एक राज्यों को जीतकर या गठबंधन में भागीदारी करके आज भारतीय राजनीति में वो मुकाम हासिल कर लिया है जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. पीछे चार साल का दौर भारतीय राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के लिये काफी उठा-पठक वाला दौर साबित हुआ है. आप इससे सहमत हों या ना हों लेकिन इन बदलाओं से इनकार नहीं किया जा सकता. आज चार साल बाद पूरा नेरेटिव बदल चुका है. नरेंद्र मोदी बदलाव के नारे के साथ सत्ता में आये थे. उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार की  नीतियों,आक्रमक पूँजीवाद से उपजी निराशाओं और गुस्से को भुनाते हुए अपने आप को एक विकल्प के रूप में पेश किया था, वोट देने वालों ने भी उन्हें एक विकल्प के रूप इस आशा के साथ चुना था कि आने वाले दिनों में नयी सरकार ऐसा कुछ काम करेगी जिससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव हो होंगें, उनकी परेशानियाँ कुछ कम होगी और पुरानी सरकार के बरअक्स ऐसा कुछ नया प्रस्तुत किया जाएगा. वायदे भी कम नहीं किये गये थे,पलक झपकते ही सुशासन, विकास, महंगाई कम करने, भ्रष्टाचार के खात्मे, काला धन वापस लाने, सबको साथ लेकर विकास करने, नवजवानों को रोजगार दिलाने जैसे भारी भरकम वायदे किये गये थे. लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है. इन चार वर्षों में मोदी सरकार कोई नयी लकीर खीचने में नाकाम रही है, मोटे तौर पर वह पिछली सरकार के नीतियों का ही अनुसरण करते हुए दिखाई पड़ रही है. हालांकि इसके साथ उनकी यह कोशिश भी है कि पुराने लकीर को पीटने में नयापन दिखाई दे.

अर्थव्यवस्था और रोजगार

हमारी अर्थव्यवस्था में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा. 2014-15 की पहली तिमाही में हमारी जीडीपी 7.5 फीसदी थी जोकि 2017-18 की पहली तिमाही में 5.7 फीसदी पर पहुँच गई है, निर्यात भी पिछले डेढ़ दशक के अपने  न्यूनतम स्तर पर है. बैंकों की हालत खस्ताहाल तो है ही, मोदी सरकार बैंकों की एनपीए की समस्या सुलझाने में पूरी तरह से नाकाम रही है. मार्च 2014 में बैंकों की एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) 4 % थी जो अब बढ़कर 9.5% तक पहुँच गयी है. उपरोक्त स्थितियां भारत जैसी उभरती हुयी अर्थव्यवस्था के लिये किसी भी हिसाब से सही नहीं कही जा सकती है. मोदी सरकार जीएसटी और नोटबंदी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों के तौर पर पेश करती रही है और इसको लेकर बार-बार यह दावा किया गया कि इससे अर्थव्यवस्था बिगर, क्लीनर और रियल हो जायेगी लेकिन इन दावों के हकीकत में बदलने का इंतजार पूरे देश को है.

रोजगार के मोर्चे पर भी मोदी सरकार अपने वादे को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रही है. मोदी सरकार ने हर साल 2.5 करोड़ नौकरियों के सृजन का वादा किया था, लेकिन यह वादा अभी भी हकीकत नहीं बन पाया है. 2004-05 से 2011-12 के बीच भारत में सालाना एक फीसदी की दर से नये रोजगार पैदा हो रहे थे लेकिन 2012-13 के बाद इसमें लगातार कमी आ रही है. भारत आबादी के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और देश की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा आबादी है जिनकी उम्र 35 से कम हैं. इतनी बड़ी युवा आबादी हमारी ताकत बन सकती थी लेकिन देश में पर्याप्त रोजगार का सृजन नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार हैं. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के अनुसार आज देश की करीब 30 प्रतिशत से अधिक युवा बेरोजगारी के गिरफ्त में हैं, इससे समाज में असंतोष की भावना उभर रही है.

कल्याणकारी योजनायें

पिछले चार सालों में  मोदी सरकार द्वारा सोशल सेक्टर में लगातार कटौती की गयी है, गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी को बोझ के तौर पर पेश किया गया , यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री मनरेगा जैसी योजनाओं का मजाक उड़ाते हुये नजर आये. इस दौरान बच्चों और महिलाओं से सम्बंधित योजनाओं के आवंटन में तो 50 प्रतिशत तक की कमी देखने को मिली है. पिछले चार सालों में कई परियोजनाओं का उद्घाटन मोदी जी द्वारा किया है जो यूपीए के कार्यकाल के दौरान तय की गई थी, लेकिन कई नयी परियोजना भी शुरू की गयीं हैं जैसे जन धन योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, कौशल विकास योजना. इनमें से कई योजनाओं का प्रभाव देखने को मिला है जैसे ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुँचाने का काम बहुत तेजी से हुआ है, तेज गति से सड़क निर्माण का काम हुआ है, ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए लकड़ी और उपले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के उपयोग में कमी लाने और एलपीजी के उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उज्ज्वला योजना के शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में गैस कनेक्शन बंटे हैं. लेकिन कुछ योजनायों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं खासकर डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं का अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही हैं .

समाज और सौहार्द

भारतीय समाज की सबसे बड़ी खासियत विविधतापूर्ण एकता है, सहनशीलता, एक दूसरे के धर्म का आदर करना और साथ रहना असली भारतीयता है और हम यह सदियों से करते आये हैं. आजादी और बंटवारे के जख्म के बाद इन विविधताओं को साधने के लिए सेकुलरिज्म को एक ऐसे जीवन शैली के रुप में स्वीकार किया गया जहाँ विभिन्न पंथों के लोग समानता, स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सहअस्तित्व जैसे मूल्यों के आधार पर एक साथ रह सकें. हमारे संविधान के अनुसार राज्य का कोई धर्म नहीं है, हम कम से कम राज्य व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता की जड़ें काफी हद तक जमाने में कामयाब तो हो गये थे लेकिन इसपर इन चार सालों के दौरान बहुत ही संगठित तरीके से बहु आयामी हमले हुये हैं. इस दौरान धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी है और उनके बीच असुरक्षा की भावना मजबूत हुई है. भारतीय संविधान के उस मूल भावना का लगातार उल्लंघन हुआ है जिसमें देश के सभी नागरिकों को सुरक्षा, गरिमा और पूरी आजादी के साथ अपने-अपने धर्मों का पालन करने की गारंटी दी गयी है. संघ परिवार के नेताओं से लेकर केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों तक हिन्दू राष्ट्रवाद का राग अलापते हुए भडकाऊ भाषण दिए जा रहे हैं, नफरत भरे बयानों की बाढ़ सी आ गयी है, इस स्थिति को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंतायें सामने आई है.

लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संस्थायें

पिछले चार सालों के दौरान हमारे न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया लोकतंत्र के स्तंभ कमजोर हुये हैं. भारत में न्यायपालिका की साख और इज्जत सबसे ज्यादा रही है. जहाँ चारों तरफ से नाउम्मीद होने के बाद लोग इस उम्मीद के साथ अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं कि भले ही समय लग जाए लेकिन न्याय मिलेगा जरूर, लेकिन पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट लगातार गलत वजहों से सुर्ख़ियों में है. जजों की नियुक्ति के तौर-तरीकों को लेकर मौजूदा सरकार और न्यायपालिका में खींचतान की स्थिति शुरू से ही रही है, लेकिन 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार सिटिंग जज न्यायपालिका की खामियों की शिकायत लेकर पहली बार मीडिया के सामने आए तो यह अभूतपूर्व घटना थी जिसने बता दिया कि न्यायपालिका का संकट कितना गहरा है और न्यायपालिका की निष्पक्षता व स्वतंत्रता दावं पर है. इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद से स्थिति जस की तस बनी हुई है और हालत सुधरते हुये दिखाई नहीं पड़ते हैं.

इस दौरान चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं. कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 की घोषणा के दौरान ऐसा पहली बार हुआ है कि चुनावों की तारीखों की घोषणा चुनाव आयोग से पहले किसी पार्टी द्वारा किया जाए. दरअसल चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी और मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव की तारीखों का ऐलान करने ही वाले थे लेकिन उनसे पहले ही भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट के जरिये इसकी घोषणा कर दी. इससे पहले गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीख़ तय करने में हुई देरी को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त की नीयत पर सवाल उठे थे. भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार की पहचान स्वतंत्र संस्था के तौर रही है जो देश की मौद्रिक नीति और बैंकिंग व्यवस्था का संचालन-नियंत्रण करता है लेकिन नोटबंदी के दौरान इसकी साख को काफी नुकसान पहुँचाया गया है और नोटबंदी के दौरान आरबीआई अपने अथॉरिटी को खोती हुयी नजर आयी है. मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी कहा जाता है आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. भारत की मीडिया अपने आप को दुनिया की सबसे घटिया मीडिया साबित कर चुकी है. इसने अपनी विश्वसनीयता खो दी है और इसका व्यवहार सरकारी भोंपू की तरह हो गया है. सत्ता और कॉरपोरेट की जी हजूरी में इसने सारे हदों को तोड़ दिया है.

आगे क्या?

दरअसल उम्मीदों के साथ दिक्कत ये है कि इसका उफान जितनी तेजी से ऊपर उठता है उतने ही तेजी से नीचे भी आ सकता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मोदी को एकमात्र ऐसे विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया था जो पलक झपकते ही सारी समस्याओं का हरण कर लेगा, यह एक अभूतपूर्व चुनाव प्रचार था जिसमें किसी पार्टी और उसके भावी कार्यक्रम से ज्यादा एक व्यक्ति को प्रस्तुत किया गया था, एक ऐसा व्यक्ति जो बहुत मजबूत है और जिसके पास हर मर्ज की दवा उपलब्ध है. आज चार साल बाद उम्मीदें टूटती हुयी नजर आ रहीं है लेकिन इसी के साथ ही इसके बरक्स दूसरा कोई विकल्प भी नजर नहीं आ रहा है. फिलहाल नरेंद्र मोदी और विपक्ष के पास एक साल का समय है जिसमें वे उम्मीदों को बनाये रखने या फिर खुद को नये विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने का काम कर सकते हैं.



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