समाजवाद की बंगलिया अस्मिता
| -K.P. Singh - May 30 2018 12:11PM

सरकारी महल छिनने की छटपटाहट ने मुलायम परिवार को बदहवास कर दिया है। मायावती की हालत भी उनसे कुछ इतर नही है। सुप्रीम कोर्ट ने ही उनके बंगले खाली कराने का आदेश जारी किया था और वे सुप्रीम कोर्ट में ही दो वर्ष की मोहलत और बंगले में रहने के लिए देने की गुहार करने पहुंच गये हैं। दूसरी ओर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने बिना किसी हीलाहवाली के सरकारी बंगलों से अपना सामान उठवाना शुरू कर दिया है। गो कि यह समाजवाद की बंगलिया अस्मिता का युद्ध है जो सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम परिवार पर थोप दिया है।

विक्रमादित्य मार्ग और कालीदास मार्ग राजपथ के सूचक हैं। जिनके बंगले गौरवशाली धरोहर के रूप में पहचाने जाते थे। लोकतंत्र में राजसी ललक के लिए एक सीमा से अधिक गुंजाइश नही है। लेकिन मुलायम सिंह परिवार की बात ही अलग है। मुलायम सिंह ने अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल से ही लखनऊ के राजपथ से सरकारी दफ्तर दरबदर कर इन बंगलों को हथियाना शुरू कर दिया था। उनकी पार्टी का कार्यालय बनाने के लिए कई बंगले हड़प लिए गये। इसके बाद उन्होंने कई बंगले मिलाकर अपना राजप्रसाद तैयार करवाया। समाजवादी राजनीति की पहचान मानी जाने वाली परंपराएं मुलायम सिंह के राज में चूं-चूं बोलने लगी और सरकारी बंगले हथियाओ जैसी उनके द्वारा प्रतिपादित कुरीतियां परंपरा के रूप में तब्दील हो गई जिसका अनुसरण बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी किया। अपने को समाजवादी कहने वाले मुलायम सिंह ने कई ऐसी परंपराओं की नीव रखी जो शाही हुकूमत की विशेषताओं को भी मात करती है।

अपने गांव सैफई को सारे जग से न्यारा बनाने के लिए भी मुलायम सिंह ने सत्ता का दुरुपयोग करके सरकारी खजाने को उस पर बुरी तरह लुटाया जिसका स्मरण बंगला प्रकरण में किया जाना नितांत प्रासंगिक है। सैफई में उन्होंने बिना किसी औचित्य के हवाई पटटी से लेकर सब कुछ तैयार करवा दिया। जिन दिनों प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक में इतने सुइट का वातानकूलित गेस्ट हाउस दुर्लभ था उन दिनों उन्होंने सैफई में एक दर्जन सुइट का एयर कंडीशंड गेस्ट हाउस बनवाया। जिसमें उनके सत्ता में न रहने के बाद इन पंक्तियों के लेखकों ने चरवाहों को पैर पसार कर आराम करते देखा। सैफई में विशाल स्टेडियम से लेकर एम्स तक उन्होंने बनवा दिया। रंगीलें सुल्तानों की कतार में सबसे आगे अपना नाम लिखाने के लिए उन्होंने सैफई महोत्सव की परंपरा शुरू की। जिसमें सुरक्षा से लेकर अन्य व्यवस्थाओं तक में जब उनकी पार्टी सरकार में रही उसने करोड़ों रुपये खर्च किये भले ही आरोप लगने पर उन्होंने और उनके परिवार के लोगों ने हमेशा इस पर लीपापोती की है।

मुलायम सिंह ने यह स्थापित किया कि समाजवादी विचारधारा का जाप अलंकार के लिए तो ठीक है लेकिन सत्ता में आने के बाद नंगे-भूखों के इस विश्वास को ओढ़े रहना मूर्खता है। जनता में विश्वास और आस्था किसी पार्टी के लिए उसके तामझाम के आधार पर तय होती है। इसलिए समाजवादी पार्टी को उन्होंने सत्ता की दौड़ में सबसे आगे रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा तामझाम जुटाने की कोशिश की। उन्होंने समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा वैभवशाली और ग्लैमरस पार्टी बनाया। भले ही इसके लिए उन्हें सरकारी खजाने में कितना भी चूना क्यो न लगाना पड़ा हो। बतर्ज हम हैं तो जमाना है, या जान है तो जहान है। मतलब कि खुद के वजूद की चिंता पहले प्रदेश का कल्याण तो होता ही रहेगा।

अखिलेश सरकार ने अपने पिता की शैली से कई मामलों में अलग हटकर शैली अपनाई लेकिन कोई अपने मूल से अलग कैसे हो सकता है। इसलिए पिता की सरकारी बंगला मोह जैसी कई आदतें उनमें बनी रहीं। उन्होंने अपनी सरकार के समय विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए जीवन भर की सरकारी बंगले की व्यवस्था का कानून पारित करा लिया था। जिसे अब उच्चतम न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी की याचिका पर असंवैधानिक घोषित कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मुख्यमंत्री के लिए तो बंगले का प्रावधान है लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री के लिए अलग से कोई प्रावधान नही है। वह कानून की नजर में सामान्य नागरिक है जिस तरह सामान्य नागरिक को कोई सरकारी आवास की सुविधा नही दी जाती वैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री को भी नही दी जा सकती। वरना यह कानून के सामने समानता के सिद्धांत की अवहेलना होगी। जिन पूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी बंगले इस आदेश की चपेट में आये हैं उनमें राजनाथ सिंह का बंगला कालीदास मार्ग का 4 नंबर है, एनडी तिवारी का बंगला माल एवेन्यू पर नंबर 1ए है, कल्याण सिंह का बंगला माल एवेन्यू में ही नंबर 2 है, मायावती का बंगला माल एवेन्यू पर 13ए नंबर का है, मुलायम सिंह यादव की कोठी पांच विक्रमादित्य मार्ग और अखिलेश यादव की चार विक्रमादित्य मार्ग के नाम से पहचानी जाती रही है। इन बंगलों के लिए नेताजी नाम मात्र का किराया देते हैं। जबकि इनमें उन्होंने अपने हिसाब से निर्माण कराया और अन्य खर्च करवाते हैं।

उच्चतम न्यायालय के फैसले से पूर्व मुख्यमंत्रियों में स्तब्ध रह जाने जैसी प्रतिक्रिया हुई। मुलायम सिंह ने सबसे पहले बंगले पर कब्जा बनाये रखने की पहल की जब वे आनन-फानन मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से मिलने पहुंच गये। उन्होंने मुख्यमंत्री को वे विकल्प सुझाये जिनसे पूर्व मुख्यमंत्रियों को राहत दी जानी संभव हो सकती थी। मुख्यमंत्री ने उनकी सलाह पर गंभीरता दिखाई लेकिन वे कुछ अनर्थ करते इसके पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह खबर फैलाकर पासा फेंक दिया कि वे उच्चतम न्यायालय के आदेश को ध्यान में रखकर बंगला खाली करने में जुट गये हैं। उनके पीछे कल्याण सिंह भी आ गये और उनके बंगले का सामान भी ढोया जाने लगा। इसके बाद अगर कोई अन्य विकल्प अपनाया जाता तो योगी आदित्यनाथ की जग हंसाई होती। इसलिए वे जहां के तहां थम गये।

इस तरह मुख्यमंत्री से काम न बनता देख मुलायम सिंह और अखिलेश यादव ने अपने को सबसे परेशान आदमी के रूप में दिखाते हुए उच्चतम न्यायालय में मोहलत मांगने की जबाबी याचिका दायर करा दी। दूसरी ओर मायावती भी बंगला छोड़ने की बजाय सरकार और उच्चतम न्यायालय को छकाने की मुद्रा साध बैठी हैं। उन्होंने अपने बंगले को कांशीराम स्मारक के बतौर राज्य कैबिनेट द्वारा आवंटित करने का हवाला देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इसे खाली करने का प्रश्न नही है। नारायण दत्त तिवारी संज्ञाशून्य हालत में रोग शैय्या पर हैं। लेकिन उनके परिवार के इरादे सामने आ चुके हैं। उनका परिवार भी मोहलत मांगने के लिए मुलायम और अखिलेश के नक्शे कदम पर उच्चतम न्यायालय पहुंचेगा।

बंगलों को लेकर उठापटक से एक बार फिर मुलायम सिंह की ढाई घर राजनीति की कई चीजें साफ हुई हैं। यह कि भाजपा से उनकी नूरा कुश्ती के कारण किसी को भ्रमित होने की जरूरत नही है क्योंकि वास्तविकता में उनके तार भाजपा से बहुत पुख्ता तरीके से अंदर ही अंदर जुड़े हुए हैं। मुलायम सिंह ने राजनीति के ऊंचे सोपान चढ़ने के लिए हर व्यवस्था में सांठगांठ को सिद्ध मंत्र के रूप मे अपनाया। जिनका व्यवस्था परिवर्तन की उनकी थोथी हांकाहूंकी से कोई संबंध नही रहा। शायद उन जैसो को सिरमोर रखने की वजह से ही व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष करने वाली शक्तियों का बुरा हश्र हुआ।

यहां तक कहा जा सकता है कि भाजपा के तेजी से आगे बढ़ने में वे सबसे बड़े निमित्त साबित हुए। यह संयोग नही है कि जब उनकी पार्टी की सरकार के समय चुनाव हुए तभी भाजपा को सबसे बड़ी कामयाबी मिली फिर बात चाहे 1991 की हो या 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव की। नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान इसलिए रेखांकित किया जा सकता है कि अखिलेश राज उत्तर प्रदेश में न होता तो सूबे में भाजपा को इतनी सीटे न मिलती और न ही स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर मोदी प्रधानमंत्री बन पाते। मुलायम सिंह की इसी मदद की वजह से राम भक्तों पर गोली चलवाने के उनके पाप को भाजपा दिल पर लिए बिना उनसे मधुर संबंध बनाये रखने को सर्वोच्च महत्व देती है। यह तो तभी झलक गया था जब उनके पौत्र की शादी में स्वयं को ब्रहमांड का सबसे कर्मठ और व्यस्त प्रधानमंत्री साबित करने वाले नरेंद्र मोदी ने सैफई में चुहल के लिए लंबा समय बिताना मंजूर किया था। योगी ने भी मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके द्वारा गैर कानूनी तरीके से इस्तेमाल की जा रही सरकारी मर्सिडीज को वापस मंगाने की अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत फाइल बैरंग लौटा दी थी। इसी दोस्ताने के चलते मुलायम सिंह समूचे विपक्ष से कांग्रेस को अलग-थलग करने की भाजपा की मंशा सफल करने में कोई कसर नही छोड़ रहे।

बहरहाल राजनीतिज्ञ देश के लोकतंत्र में नई प्रजाति का रूप अख्तियार कर चुके हैं। जिन्हें एक बार चुनाव जीत लेने पर आजीवन सुविधाओं की दरकार रहती है। आम आदमी इसमें ठगा जा रहा है। जिसके उत्थान के नाम पर लोकतंत्र का कलेवर रचा गया है। जब नेताओं के खर्चे से ही व्यवस्था नही उबर पायेगी तो आम आदमी की जरूरते पूरा करने का दम उसमें कैसे रह पायेगा। नेताओं का इस मामले में प्रदर्शन जनता के लिए एक सबक है। अगर नेता लोकलाज से डरना बंद कर चुके हैं तो यह अघोषित तौर पर लोकतंत्र की तालाबंदी का एलान है। नाम लोकतंत्र होने से कोई व्यवस्था लोकतांत्रिक नही हो जाती। ऐसी परंपराएं लोकतंत्र की जीवंतता के लिए होना जरूरी है जो नेताओं को त्यागशील, सादगी, वचन बद्धता जैसे मूल्यों को अपनाने के लिए बाध्य कर सकें।



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