उपचुनाव का झटका क्या सत्ता के मद में चूर भाजपा नेतृत्व की आंखें खोलेगा
| Rainbow News - Jun 1 2018 12:20PM

-के.पी. सिंह/ उत्तर प्रदेश में उपचुनावों में संयुक्त विपक्ष भाजपा को तगड़ी मारने में सफल रहा। 2019 के लोक सभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अश्वमेघ यज्ञ में यह परिणाम घोर विघ्नबाधा के सूतक हैं। इसके बाद भी भाजपा अपनी गिरेबान में झाकेगी या नही या सत्ता के मद में चूर रहकर अपनी कमियों को देखने से इंकार ही करती रहेगी। उत्तर प्रदेश के साथ-साथ कई अन्य राज्यों में भी उपचुनाव हुए थे। इनमें चार लोकसभा के उपचुनाव थे जिनमें से तीन सीटें 2014 के आम चुनाव में भाजपा के कब्जे में रहीं थी। लेकिन उपचुनावों में अपनी इन तीन सीटों में दो उसने गवां दी हैं। बिहार के एक विधानसभा चुनाव में ‘कलंकी’ लालू यादव की पार्टी 42 हजार से अधिक मतों से, पुण्यवान भाजपा के साथ कदम ताल करने वाली सुशासन बाबू की पार्टी के उम्मीदवार को हराने में सफल रही है।

उत्तर प्रदेश में जहां भाजपा एक वर्ष में ही सत्ता विरोधी लपट के थपेड़े खाने के लिए अभिशप्त हो गई है। वहीं पंजाब में कांग्रेस सत्ता में आने के बाद हर उपचुनाव में मीर साबित हो रही है। मतलब साफ है कि सरकार को क्या करना चाहिए इस मामले में पंजाब की अमरिंदर सिंह की सरकार ने उसकी भावनाओं के साथ न्याय किया है जिससे भाजपा का जादू वहां धरा रह गया है। कर्नाटक में कांग्रेस एक और सीट सरकार के गठन के हुए मतदान में झटकने में सफल रही है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि कर्नाटक के लोगों ने राज्य में भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस के त्याग को पसंद किया है। बहरहाल भाजपा के लिए आसार अच्छे नही हैं। अगले लोकसभा आम चुनाव के ठीक पूर्व हो रहे उपचुनाव लोगों के जिस मिजाज की झलक दिखा रहे हैं उससे भाजपा की गाड़ी हिचकोले खाती नजर आने लगी है। राजनीतिक वातावरण जिस प्रकार का बन गया है उसमें मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों राज्य भाजपा के हाथ से निकल जाने के आसार और पुख्ता होते जा रहे हैं। जिसका अर्थ होगा लोक सभा चुनाव तक उसके संदर्भ में बेहद नकारात्मक वातावरण का निर्माण।

अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के समय करन थापर ने बीबीसी टेलीविजन पर लाल कृष्ण आडवाणी का एक इंटरव्यू लिया था। जिसके लाइव प्रसारण में उन्होंनें लालकृष्ण आडवाणी से पूंछा था कि क्या आपने अनुच्छेद 356 समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और समान नागरिक संहिता को लागू करने जैसे अपने मौलिक मुददे राजग के जरिए सरकार बनाने के लिए एक किनारे कर दिये तो फिर आपके गुड गवर्नेंस के दावे का सार क्या रह गया। एक अच्छे अधिकारी की बेहतर ब्यूरोक्रेटिव एक्सरसाइज से भी व्यवस्था काफी हद तक सुधर जाती है लेकिन राजनीतिक तंत्र यहीं तक सीमित नही रह सकता। उसकी कुछ प्रतिबद्धताएं होनी चाहिए जिससे गवर्नेंस की दिशा निर्धारित हो सके और उसके दूरगामी परिणाम आ सकें। इस इंटरव्यू का संदर्भ यह बताने के लिए है कि आलोचक पत्रकार तक मानते थे कि अटल सरकार अस्तित्व की खातिर अपने राजनीतिक उददेश्यों से भले ही मुकरने को मजबूर रही हो लेकिन उसकी गवर्नेंस संतुष्ट करने वाली नही थी जिसका अभाव आज दिखाई दे रहा है।

अटल सरकार के समय से आज के दौर तक दिल्ली में यमुना नदी में काफी पानी बह चुका है। तकनीकी विस्तार ने प्रगति को बहुत ही तेज घटनाक्रम वाली फिल्म बना दिया है। जिसके साथ दौड़ते रहने पर परंपरागत, सामाजिक, नैतिक और इतिहास के मुददे अपने आप निस्तारित होते जाते हैं। ऐसा नही है कि मोदी सरकार इस एहसास से अछूती हो। लेकिन उसने सरकार के गठन के पहले जिन जिन्नों को बोतलों से बाहर किया था उन पर उस पर कोई काबू नही रह गया। दूसरी ओर विकास के नाम पर उसकी उपलब्धि सिफर बटा सिफर है। नोटबंदी व जीएसटी लागू करने के उसके फैसलों ने इसमें रोड़े अटकाने की भूमिका अदा की। जो लोग मोदी सरकार के आस्था की हद तक समर्थक हैं वे आने वाले वर्षों में सब कुछ बदल देने के करिश्मे की उम्मीद इस सरकार से कर रहे हैं और इस संदर्भ में उनमें अव्यक्त किस्म का थोथा आशावाद नजर आता है, इसका ठोस आधार नही होता। लेकिन एक बड़े तबके के सामने मोदी सरकार की खोखली हकीकत बढ़ती बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार और विकास के मामले में जमीनी स्तर पर ठहराव जैसे हालात के चलते उजागर हो चुकी है जो मोह भंग के कारण नकारात्मक रुख के रूप में उफना रही है।

इस प्रश्न के दायरे में भी उसे घेरा जा रहा है कि माना कि दीर्घकालीन वांछनीय बदलावों की नीव रखने का काम मोदी सरकार ने किया है। जिनके परिणाम आगे चलकर जब सामने आयेगें तो लोग गदगद हो जायेगें। लेकिन सरकार को दीर्घकालिक प्रयासों के अलावा तात्कालिक तौर पर परिणामकारी प्रयासों में भी कुशल होना चाहिए इस पहलू की उपेक्षा मोदी सरकार में कैसे हो रही है। लोगों की आने वाले दिनों के सुहाने सपने में लीन हो जाने की एक हद है। तात्कालिक यातनाओं के असहनीय हो जाने पर इस तरह की फंतासी छिन्न-भिन्न हो जाती है और अब यही हो रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जो राजनैतिक स्थितियां हैं उनका सामाजिक कारकों से कारण और कार्य का संबंध है। दोनों राज्य जनता दल के मजबूत गढ़ और सामाजिक न्याय की गहन प्रयोगशाला रहे हैं। यहां सर्व समावेशी व्यवस्था की नवोदित जड़ों को उखाड़ने की कोशिश में भाजपा के पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने का काम किया है।

जबसे भाजपा की सरकार आई है तब से व्हाटसएप पर जब हिंदुस्तानी चलता है, धरती हिलती है, हिन्दुस्तान की मेधा और ज्ञान के सामने सारा विश्व नतमस्तक होता है जैसे संदेशों की गर्वोक्तियों की जगह अमुख जाति के जन्मना सर्वोपरि लोग जब चलते हैं तब धरती हिलती है जैसे संदेशों की बाढ़ आ रही है। जबकि भाजपा घोषित तौर पर अपने को जाति श्रेष्ठता की बजाय राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में प्रदर्शित करती है। उसकी असल अहमियत क्या है व्हाटसएप संदेशों में छलकने वाले गुरूर के कोण यह जता देते हैं। इन्ही हरकतों से जब लालू के खिलाफ कार्रवाई हुई तो लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के कड़े इरादे की बजाय इसे वर्ण व्यवस्था विरोधी संघर्ष को भौतरा करने के उपक्रम के बतौर संज्ञान में लिया और लालू हिकारत की जगह हमदर्दी के पात्र बन गये। लालू सामाजिक न्याय के मामले में शुरू से बेहद मुखर रहे हैं। इसके चलते वे प्रतीक बन गये हैं जिसको धराशाई करके सामाजिक न्याय की सेना का मनोबल गिराने की कल्पना की जाती है। वरना लालू ने जो किया उस मामले में मुलायम सिंह एण्ड फैमली जो उनसे कई गुना आगे रही लेकिन भाजपा उनका मानमर्दन भाजपा क्यों नही होने दे रही।

यह साफ है कि सामाजिक यथास्थिति को पलटने के संदर्भ में मुलायम सिंह हमेशा ढुलमुल रहे हैं और लालू दृढ़ और अडिग। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है भाजपा के अपने लोगों का आचरण कौन कम है। व्यवस्था साफ-सुथरी नजर आये इसकी जरूरत गई तेल लेने सत्ता में अवसर मिलते ही भाजपाई जिस तरह लाभ उठाने के लिए जहां मौका मिले टूटे नजर आ रहे हैं उससे राम नाम की लूट का मुहावरा याद आ जाता है। तो बिहार में भ्रष्ट-भ्रष्ट कहकर राजद को लोगों की नजर से गिराना मुमकिन नही है। पिछड़ों और दलितों को उनकी आबादी के मुताबिक व्यवस्था में भागीदारी के लिए साफ नीयत दिखाने पर ही भाजपा को लालू का मुकाबला करने की शक्ति संभव है जो कंजरवेटिवों के हावी रहते आसान नही लगता।

बहरहाल बिहार में तो भाजपा का अप्रत्यक्ष शासन है लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रत्यक्ष शासन में उसकी हालत और बुरी है। अगर लगातार चार उपचुनाव हारने के बाद भाजपा नेतृत्व की बुद्धि कुछ चेती हो तो उसे तत्काल अहंकार छोड़ देना चाहिए तांकि पतंग के गर्त में ले जाती वास्तविकता की अनदेखी उससे न हो सके। इसके खिलाफ लोगों के आर्तनांद को हमदर्दी के साथ सुनने और उस पर कार्रवाई करने की हालत हुकुमरानों को प्रदर्शित करनी होगी। इस मामले में न केवल भाषण दिये जाये बल्कि ऐसा हो रहा है इसको दिखाने की चेष्टा ईमानदारी के साथ करनी पड़ेगी। जन शिकायतों की गंभीर अवहेलना बंद करनी पड़ेगी और विकास के पहियों को तेजी से घुमाने पर भी ध्यान देना होगा। जिन्ना की तस्वीर जैसे मुददों में राजनीतिक रोटियों को गर्माने की ताकत धीरे-धीरे चुक चुकी है और धार्मिक अनुष्ठानों की आड़ में विकास के लिए अकर्मण्य स्वभाव पर पर्दा भी अब संभव नही रह गया है। कुछ और न करों तो बेहतर ब्यूरोक्रेटिव एक्सरसाइज ही दिखाने की चेष्टा करने लग जाओ जिससे बहुत हद तक गुड गवर्नेंस की तलब पूरी होने का एहसास जनमानस में पैदा हो सकता है।



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