आत्मा की शुद्धि के लिए रखा जाता है रोज़
| Rainbow News - Jun 8 2018 12:34PM

अंबेडकरनगर। नूरी मस्जिद गदायां के पेशइमाम हाफिज अली अहमद के मुताबिक इस्लाम का मूलमंत्र है- 'ला ईलाहा इल्लला मोहम्मदन-रसूलल्लाह' जो कलमा कहलाता हैं। इसका अर्थ है- 'अल्लाह सिर्फ एक है, दूसरा कोई नहीं। मोहम्मद साहब उसके सच्चे रसूल हैं।' इस्लाम धर्म के कुछ प्रमुख आधार हैं, जो इस प्रकार हैं- खुदा को मानना, उसको सजदा करना, तहारत यानी पवित्रता- इसी पर सभी उसूलों का आधार है। इसमें शरीर की पवित्रता, कपड़ों की पवित्रता आदि से लेकर मन की पवित्रता तक शामिल है।

नमाज- फजर, जोहर, असर, मगरिब और ईशा के वक्त पर पाँच बार नमाज यानी खुदा की इबादत करना। अपनी इंद्रियों को काबू में रखना। गलत काम से दूर रहना। हज- यानी वह तीर्थयात्रा जिसमें दुनिया के सभी मुसलमान बिना भेदभाव के भाग लेते हैं। जकात- उन सभी व्यक्तियों पर वाजिब है जो धर्मदान कर सकते हैं। यह दान गरीबों, बेसहारों आदि के लिए व्यय किया जाता है। यह 2.50 पैसे प्रति सैकड़ा प्रतिवर्ष के हिसाब से देना होता है। रोजा- अर्थात् व्रत- यह आत्मा की शुद्धि के लिए रखा जाता है। रमजान महीने में 30 दिन तक रोजे रखे जाते हैं। पूरा माह अल्लाह की इबादत में लगाना होता है। हजरत मोहम्मद साहब को लोगों को इस्लाम धर्म समझाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

दुश्मनों के जुल्मो-सितम को सहन करना पड़ा। वे जरूरतमंदों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। वे दीन-दुखियों के सच्चे सेवक थे। उनके जन्म के समय अरब में महिलाओं की बड़ी दुर्दशा थी। उन्हें बाजार की पूँजी समझा जाता था। लोग उन्हें खरीदते-बेचते थे और भोग-विलास का साधन मानते थे। लड़की का जन्म अशुभ माना जाता था और लड़की पैदा होते ही उसका गला दबाकर मार दिया जाता था। इस महापुरुष ने जब यह बात देखी तो उन्होंने औरतों की कद्र करना लोगों को समझाया। उन्हें समानता का दर्जा देने को कहा। साम्यवाद की बात भी सर्वप्रथम हजरत मोहम्मद साहब ने लोगों के सामने रखी थी।



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