गुनाहों को मिटा देती है माफ़ी
| -Ali Askari Naqvi - Jun 11 2018 2:30PM

अम्बेडकरनगर। मौलाना सैयद नूरुल हसन रिज़वी (मछलीगांव) माह-ए-रमज़ान में क़ुरआन पढ़ने के असीमित पूण्य बताते हैं। उन्होंने धार्मिक पुस्तक बहारुल अनवार, जिल्द 92 में दर्ज रसूल-ए-अकरम के उस कथन का उल्लेख किया, जिसमें सरकार-ए-दोआलम ने फ़र्माया- मोमिन जब क़ुरआन की तिलावत करता है तो उसके लिए रहमत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और उसके मुंह से निकलने वाले हर एक हर्फ़ के बदले में ख़ुदा एक फ़रिश्ता ख़ल्क फ़र्माता है जो क़यामत तक उसके लिए इस्तेगफ़ार, तौबा करता रहता है।

बेशक इल्म हासिल करने के बाद ख़ुदा के नज़दीक किरअत-ए-क़ुरआन से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है। मौलाना नूरुल हसन ने मौला अली के हवाले से कहा, तुम्हारे ऊपर लाज़िम है कि माह-ए-रमज़ान मुबारक में क़सरत से इस्तेगफ़ार और दुआ करो। क्यों कि दुआ तुम पर से बलाओं को दूर कर देती है तथा इस्तेगफ़ार तुम्हारे गुनाहों को मिटा देती है। रोज़ेरखो मुसलमानों के अंदर बहुत सी ग़लत फ़हमियां हैं, जिन्हें दूर करना लाज़िमी है। आमतौर से लोग सोचते हैं किसी का हक़ मार दें, घटतौली, मिलावटख़ोरी, धोखाधड़ी, फरेबकारी, वादाख़िलाफ़ी, झूठ व मक्कारी को खेल बनाएं और फिर हज-उमराह पर चले जाएं, सब माफ़ हो जाएगा।

इसी तरह अक्सर रोज़ादारों को बताया जाता है, अगर आप रमज़ान मुबारक में अच्छी तरह से रोज़ा रख लें, नमाज अदा कर लें और तिलावत-ए-कुरआन कर लें दानपुण्य कर दें तो सारे के सारे गुनाह धुल जाएंगे। तकरीरों में यह भी कहा जाता है कि अगर लैलतुल क़द्र में रात जाग कर बिताई जाए तो सभी गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। यह भ्रम निकालना होगा कि नमाज़, रोज़ा, हज इत्यादि जैसे गुनाह अल्लाह तआला से मुताल्लिक़ हैं, जिन्हें बेशक वह माफ़ कर सकता है। क्योंकि अल्लाह बड़ा रहम और करम करने वाला है। दूसरी ओर एक वास्तविकता यह भी है कि जो पाप बंदों से संबंधित हैं, उसे अल्लाह हरगिज़ नहीं माफ़ करेगा जब तक बंदा ख़ुद न माफ़ कर दे।

लिहाज़ा इस बात को गांठ बांध लें कि जब भी किसी से कोई मामला हुआ हो, ज़्यादती किया हो, हकतलफी हो गई हो, जानमाल, इज़्ज़त-आबरू अथवा मन को ठेस पहुंचाई हो तो उसके लिए सच्चे मन से छमा याचना कर लें इसी में भलाई है। एक बात और याद रखने की है ख़ुदा रहमान और रहीम ही नहीं है वह क़हर एवं गज़ब ढाने वाला भी है।  अतः आवश्यक है कि क़त्ल, ग़ारत, झगड़े-फ़साद, अत्याचार, अनाचार आदि से दूर रहकर मज़हब-ए-इस्लाम के वास्तिक व बुनियादी उसूलों को आत्मसात करें।



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