संघ के भेजे पदाधिकारी, भाजपा की छवि पर पड़ रहे भारी
| -K.P. Singh - Jun 13 2018 4:39PM

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पहचान अतीत में सादगी और निस्वार्थ सेवा की भावना से ओत-प्रोत स्वयं सेवकों के जरिये होती रही है। इस मामले में संघ की विचारधारा के आलोचक भी स्वयं सेवकों की साफ सुथरी जिदंगी के कायल रहते थे। लेकिन सत्ता की कर्मनाशा में नहाने के बाद लगता है कि संघ के इन पुण्यों का क्षय हो चला है। हालांकि संघ का शीर्ष नेतृत्व अभी भी काफी हद तक सात्विक है। लेकिन भाजपा में संगठन कार्य के लिए भेजे गये संघ के जो लोग सत्ता और पार्टी संचालन में कुंजी रोल निभा रहे हैं उनके हालचाल संघ की पहचान को मटमैली करने वाले हैं।

संघ भाजपा में अपने प्रचारकों को संगठन मंत्री के रूप में तैनात करता है तांकि वह अपनी इस मानस संतान को नियंत्रित और निर्देशित करता रह सके। संघ में समय-समय पर शिक्षा वर्ग आयोजित होते हैं। जिनमें शुद्ध आचरण और संस्कारों की घुटटी स्वयं सेवकों को पिलाई जाती है। कुछ साल पहले तक यह सार्थक लगता था क्योंकि संघ के स्वयं सेवक कुल मिलाकर आचरण के मामले में आदर्श थे। लेकिन लगता है कि ईमानदारी तभी तक है जब तक कि आदमी को बेईमानी का मौका न मिले। यह कहावत संघ पर चरितार्थ साबित हो रही है। सत्ता की काजल कोठरी में घुसने के बाद नीयत डावांडोल होने का उदाहरण सबसे विकराल रूप में संघ मूल के भाजपा पदाधिकारियों में उजागर हो रहा है।

पहले संघ से संगठन में जो लोग आते थे वे स्वयं को राजनैतिक महत्वाकांक्षा से परे रखते थे। इसलिए त्याग, तपस्या के जीवन से डिगने की बात उनके बारे में सोची भी नही जा सकती थी। लेकिन संघ के प्रचारक से गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के नरेंद्र मोदी के सफर से इस संस्था में जो प्रतिमान स्थापित हुए उसके कारण लगता है कि इसकी नीति-रीति बदल गई। नरेंद्र मोदी ने तो बाद में मार्स लीडर बनने की योग्यता भी दिखाई लेकिन दूसरे लोगों में यह बूता नही पाया जा रहा। पर वे नरेंद्र मोदी की देखा-देखी भाजपा और उसकी सरकारों में सबसे ताकतवर परासंवैधानिक केंद्र बनने को आतुर हैं। अजीब संयोग है कि मोदी के नक्शे कदम पर चलने वाली जमात से सबसे पहला साबका नरेंद्र मोदी का ही पड़ा। जब गुजरात में संजय जोशी और उनके बीच छत्तीस के आंकड़े को लेकर किवदंतियों का बाजार गर्म था। लेकिन नरेंद्र मोदी से टकराना संजय जोशी को बहुत भारी पड़ गया। जिस तरह अटल बिहारी बाजपेयी की नाराजगी से संघ में सबसे प्रतिभाशाली होने के बावजूद गोविंदाचार्य को गुमनामी में धकेलने से रोकने के लिए संघ कुछ नही कर सका वैसे ही मोदी के कोप के कारण संजय जोशी को निर्वासन में धकेले जाने के मामले में भी संघ असहाय हो गया।

संजय जोशी के सबक के बावजूद संघ के महत्वाकांक्षी प्रचारकों में जो खून लग गया था उनकी जुबान से वह उतर नही सका है। बस इतना है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा में तैनात संघ के अधिकारी ऐसी भूमिका का निर्वाह अमित शाह के कृपा पात्र बनकर कर रहे हैं। भाजपा के ही कुछ लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में स्थितियां इसलिए बिगड़ रही हैं क्योंकि योगी असहाय हैं। यह बात पूरी तरह गलत नही है। संघ के लोग पहले से अपने उददेश्यों के लिए समाज का सहयोग लेते रहे हैं। इसे चंदा या अंशदान कहते हैं जो उन आम लोगों से लिया जाता था जो अपनी कमाई का एक अंश समाज पर उसका अधिकार मानकर संघ को देते थे। उनकी चंदा इकटठा करने की इस प्रवीणता के नाते भाजपा की फंड मैनेजरी का काम उन्हें सौंपा जाना खतरनाक साबित हो रहा है। गरज यह है कि ये लोग अब चंदा इकटठा नही करते, उगाही करते हैं। इनके भयादोहन से प्रदेश की व्यवस्था त्रस्त हो रही है। मंत्री बनने से लेकर अधिकारियों की महत्वपूर्ण जगह में तैनाती तक के लिए फंड मैनेजर बने भाजपा में संघ मूल के पदाधिकारियों द्वारा खुली वसूली की जा रही है। जिसका एक हिस्सा वे अपने पास रखकर रातों-रात सड़कछाप से कुबेरपति बन चुके हैं।

मंत्रियों और अधिकारियों से माहवार नजराना अलग वसूल होता है। यहां तक हो रहा है कि कई ऐसे अधिकारी जो दूसरी पार्टी की सरकारों में भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं का दमन अपनी सरकारी डयूटी की तरह करते रहे उन्हें भी मुंह मांगी कीमत चुकाने पर मलाईदार जगह मिल गई जिससे संघ और भाजपा के लिए जीवन होम देने वाले तमाम लोग अपने को ठगा महसूस करने को मजबूर हो गये हैं। बताते हैं कि सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश में हर जिले के उन भाजपाइयों को निगमों व अन्य संस्थाओं में मनोनीत करने की रूपरेखा तैयार की गई थी जिनका पूरा जीवन पार्टी के लिए संघर्ष करते हुए गुजर गया। लेकिन किसी कारण से अच्छे दिनों में पार्टी द्वारा उनको टिकट नही दिया जा सका था कहते है कि इसके लिए सूची तैयार थी पर फंड मैनेजर ने करोड़ों में इसकी कीमत मांग ली। अधिकांश तपे-तपाये भाजपाई यह कीमत देने की स्थिति में नही थे तो यह सूची ठंडे बस्ते में डाल दी गई। अब तो यह तक कहा जा रहा है कि पैसे के अलावा भी फंड मैनेजरों की कुछ और घिनौनी फरमाइशें होने लगी हैं जो पार्टी में कुछ हासिल करने के लिए पूरी करना जरूरी हो गया है। सोशल मीडिया पर खुलेआम नाम लेकर इस कारगुजारी में संलिप्त लोग उजागर किये जा रहे हैं पर भाजपा में किसी भी स्तर पर इस बदनामी को संज्ञान में नही लिया जा रहा है।

पार्टी नेतृत्व तक यह बातें सीधी भी बखूबी पहुंच रही है लेकिन कह दिया जाता है कि चुनाव बिना भले पूरे फंड के नही लड़ा जा सकता इसलिए जो पार्टी के लिए बड़ा फंड इकटठा कर सके उसे सिर पर बिठाना ही होगा। गो कि दुधारू गाय की लातें भी सहनी पड़ती हैं। जाहिर है कि भाजपा में अंदरखाने यह माना जा रहा है कि पार्टी अपनी विचारधारा की वजह से नही प्रचार के मंहगे चोचलों की वजह से जीत पा रही है। इस धारणा के कारण जो फंड मैनेजर खुद चुनाव नही जीत सकते, अच्छा भाषण नही कर सकते, जनाधार वाले नेताओं को जिन्हें पार्टी से जोड़ने में कोई रुचि नही है। अपनी तमाम हीनताओं के बावजूद पार्टी के नियामक बनकर इतने अहंकारी हो गये हैं कि जमीनी नेताओं से ऐसे पेश आते है जैसे कोई अफसरशाह चपरासियों से। जिस तरह से बसपा में कोर्डिनेटर राज चलना उसके डूबने का कारण बना। वैसे ही भाजपा में संघ के द्वारा भेजे गये संगठन मंत्री साबित होने वाले।

संघ को इस मामल में गौर करना होगा क्योंकि उददेश्य दीर्घकालिक है। इसलिए वह अपनी साख की दूरगामी क्षति की अवहेलना नही कर सकता। उसे संगठन मंत्रियों की स्क्रीनिंग करानी चाहिए और उन संगठन मंत्रियों को वापस बुला लेना चाहिए जो बदनामी करा रहे हैं। उसके प्रचारक भाजपा में पहुंचकर फंड मैनेजरी के गर्हित दायित्व में जुटें यह उसकी गरिमा के अनुकूल नही है। इसलिए उसे संगठन मंत्रियों पर ऐसे किसी दायित्व से दूर रहने का प्रतिबंध लगाना पड़ेगा। संघ को इस बात की भी समीक्षा करनी चाहिए कि उसकी काडर कक्षाओं में जब संयम और सादगी के इतने पाठ पढ़ाये जाते हैं तो व्यवहारिक कसौटी की पहली पायदान पर ही उसके स्वयं सेवक स्सखलित क्यों हो जा रहे हैं।

पहले के समय जब भाजपा को सत्ता में भागीदारी मिली तो मंत्री बने संघ के स्वयं सेवकों ने रहन-सहन से लेकर हर मामले में सादगी के झंडे गाड़े लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि वे विलासिता में दूसरी पार्टी के लोगों को कई कोस पीछे छोड़ देना चाहते हैं। संघ स्वयं कहता है कि बदलाव के लिए सिर्फ सरकार पर निर्भर नही रहा जाना चाहिए यानि तमाम कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक आंदोलन होते रहना चाहिए। पर अब जबकि केंद्र सत्ता में होने से वह समाज के केंद्र में हैं तो उसकी ओर से कोई ऐसी पहल क्यों नही हो पा रही जैसी बिहार में नीतिश कुमार ने शराब बंदी के माध्यम से की। शादियों और आत्म शांति के कार्यक्रमों में हजारों लोगों को दावत खिलाने की फिजूलखर्ची जैसी कई कुरीतियां हैं जिसके लिए भाजपा में शामिल और बड़ी जिम्मेदारियां निभा रहे स्वयं सेवक भूमिका निभा सकते हैं। अगर वे सरकार के रुटीन से अलग हटकर कुछ नही सोच पा रहे तो साफ है कि संघ में कथनी और करनी में अंतर आ चुका है जिसे पाटने की जरूरत है।

-के.पी. सिंह



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