सियासत के मोहल्ले में दलितों का ‘अमृत मन्दिर’
| Ram Prakash Varama - Jun 13 2018 4:44PM

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी अश्वमेघ में दौड़ते महारथियों ने लगातार कई चुनावों में हार के बाद हाल-फिलहाल दलितों की गन्दी बदबूदार बस्तियों से बाहर निकल कर हाथ-पैर धोने के बाद ताजादम होकर अपने भगवा हाथों में ‘संपर्क फॉर समर्थन’ का नया परचम थामकर वीआइपी गलियारों, मन्दिरों-मठों, अपने रूठे संगी-साथियों-कार्यकर्ताओं और परम्परागत वोटरों के दरवाजे माथा टेकने की मैराथन शुरू कर दी है| हालांकि कैराना में जब राष्ट्रीय लोकदल के युवा चेहरे जयंत चौधरी ने गांव-गांव आशीर्वाद अभियान चलाया तो योगी आदित्यनाथ ने उन्हें भीख मांगने वाला बताया था| जबकि गौर से देखें तो दलितों की देवी मायावती ने बेहद चालाकी से लखनऊ में सरकारी बंगला खाली करते समय खुले आम दलित वोटों के साथ अति पिछड़ों को साधने की चाल ही नहीं चल दी बल्कि विपक्षी गठबंधन को और अधिक मजबूत करने की धार भी दी|    

यहां याद दिलाते चलें कि उच्चतम न्यायालय के आदेश, पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी बंगले खाली कराने का पालन करने को बेहद उतावली योगी सरकार ने और भाजपा के बयानबाजों ने मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती के बंगलों के समाचारों को अपने बयानों की गरम हवा से जनमानस में उन्हें लोभी साबित करने की तमाम कोशिशें कीं | योगी ने विपक्ष के गठबंधन को आतंकवाद का संगठन तक कह डाला | अखबारों में इसके मुखालिफ चीखते-चिंघाड़ते समाचार, लेख छपवाए गये | समूचे मीडिया ने इसे अपनी टीआरपी बढाने का मसाला बनाया | मुलायम, अखिलेश के खाली होते बंगलों का जीवंत (लाइव) प्रसारण किया या कराया गया ! वहीं मायावती ने अपना बंगला 13 माल एवेन्यू खाली करते वक्त खुद मीडिया को बुलाया और बंगले का कोना-कोना दिखाया ही नहीं वरन उसका सीधा प्रसारण भी करवाया | जिस जगह  कैमरे ने जाने से जरा भी हिचक दिखाई वहां बड़े ही आग्रहपूर्वक मायावती खुद कैमरामैनों को ले गईं | मीडिया से लेकर भाजपा के दफ्तरों तक खुशियां लोट-पोट हो रहीं थीं | उन्हें मायावती नसमझ नजर आ रही थीं, जबकि वे पूर्व में ही बता चुकीं थीं कि 13,माल एवेन्यू ‘काशीराम विश्राम स्थल’ है और वो उसके एक छोटे से हिस्से में उसकी देखभाल के लिए रहती हैं |

उनके इस तर्क को योगी सरकार के चापलूस अफसरों ने नहीं माना | बस यहीं बसपा के चाणक्य ने उन्हें आख़िरी दिन बंगला खाली करने व मीडिया के जरिये बंगले का ‘जनता दर्शन’ कराने की सलाह दे डाली | उन्होंने वही किया और सारे देशवासियों ने उस किले जैसे बंगले के भीतरी हिस्सों को और उन्हीं के साथ उनके दलित वोटरों ने भी अपने देवी-देवता के मन्दिर के दर्शन टेलीविजन के परदे पर  पूरी श्रृद्धा के साथ किये | बंगले से बाहर निकलने के बाद मायावती ने साफ़-साफ़ कहा कि अब ‘काशीराम विश्राम स्थल’ की देखभाल का जिम्मा सरकार का है | यहीं साफ़ हो गया कि 13 माल एवेन्यू दलितों का ‘ अमृत मन्दिर’ हो गया | यहां बताते चलें कि दलितों का मानना है कि काशीराम ने ही उन्हें सम्मान से जीने का अमृत दिया |  इतना ही नहीं योगी सरकार ने भी उसकी देखभाल के लिए चौकीदारों की तैनाती करके उस पर मुहर लगा दी और भविष्य में भी इससे छेड़-छाड़ करने से परहेज ही बरतेगी | वह दलितों को नाराज करने जोखिम नहीं उठा सकती है क्योंकि पहले ही काफी नुकसान भाजपा को हो चूका है |

मायावती की रणनीति का यह पहला कदम है और उनका लक्ष्य है प्रधानमंत्री की कुर्सी जिसमें अंदरखाने समूचा विपक्ष लगभग राजी है | यहां याद दिलाना लाजिमी होगा कि भाजपा की बुजुर्ग पीढ़ी 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने को लेकर बेहद बेचैन थी और उन्हें विदेशी से लेकर बहुत सारी संज्ञाओं से नवाजा गया था | उस समय सोनिया गांधी ने प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर खुद न बैठकर सरदार मनमोहन सिंह को बिठा दिया , तब भी भाजपा के बडबोले महारथियों ने उन्हें ‘मौनी बाबा, कठपुतली’ सहित तमाम मखौल उड़ाने वाले तमगे दिए थे | और तो और नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनावों के दौरान उन पर पाकिस्तान को अपने खिलाफ सुपारी देने तक का आरोप लगा डाला , यह अलग बात है कि आज तक उसे साबित नहीं किया | वही सोनिया गांधी आज भी यूपीए की अध्यक्ष हैं और राहुल गांधी की मां भी , उन्हें तब भी राहुल की उतनी ही चिंता थी जितनी आज है | उन्होंने 10 साल की यूपीए सरकार में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री तो दूर की बात मंत्री तक नहीं बनने दिया, तो अब भी वे प्रधानमंत्री की कुर्सी से राहुल गांधी को दो  कदम पीछे हटाने में कतई नहीं हिचकेंगी और देश की पहली दलित महिला प्रधानमन्त्री देने का सियासी सम्मान हासिल करेंगी | यहां एक सच और उजागर करना जरूरी होगा कि देश को पहला दलित राष्ट्रपति के.आर.नारायण (पूरा नाम-कोचेरिल रमण नारायण) कांग्रेस के सहयोग से इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्वकाल में सर्वसम्मति से मिला था | हालांकि नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा गलत बयानी कर चुकी है कि देश को पहला दलित राष्ट्रपति  रामनाथ कोविंद दिया है | इससे पहले कांग्रेस ने ही देश को एक अति पिछड़े(बढ़ई) ज्ञानी जैल सिंह और तीन मुसलमान डॉ. जाकिर हुसैन, मो. हिदायतउल्ला, फखरुद्दीन अली अहमद जैसे राष्ट्रपति दिये हैं |

बताते चलें जातिगत राजनीति को भुनाने के चलते ही भाजपा के दिग्गज नेता दलितों के घरों में खाना खाने का अभियान चलाए थे जिसकी असलियत या यूं कहें पाखंड सबके सामने आ गया | हालांकि राहुल गांधी यूपीए सरकार के दौरान दलितों के घर खा,नहा,सो चुके हैं , तब भाजपा नेताओं ने इसे ‘पिकनिक’ कहकर मजाक ही नहीं उड़ाया था बल्कि ‘महाराष्ट्र की कलावती’ की गूंज मीडिया से संसद के भीतर तक सुनाई दी थी | उससे भी आगे मोदीजी के लखनऊ में अम्बेडकर महासभा में माथा टेकने और उसके अध्यक्ष निर्मल को राज्यमंत्री का दर्जा देने को भी दलितों को तरजीह दिए जाने के खाते में ही जोड़ा गया लेकिन नतीजा गोरखपुर वाया कर्नाटक, कैराना तक      

सिफर ही हासिल हुआ |  2019 की चुनावी जंग में बेशक 10 महीने हैं , भाजपा इस बीच दसियों नये नारों के साथ अपने अश्वमेघ के  महारथियों को दौडाती रहेगी लेकिन चुनाव के आख़िरी मोर्चे पर विपक्षी महागठबंधन यदि मायावती को प्रधानमंत्री घोषित करके चुनाव मैदान में उतरता है तो उसके खाते में दलित,मुसलमान,अति पिछड़े वर्ग व पिछडों के एक बड़े हिस्से के साथ गठबंधन में शामिल सभी दलों के चाणक्यों द्वारा अर्जित वोट बैंक की भी बड़ी भागीदारी भी होगी | यदि मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं भी किया जाता है तो भी  बसपा का अपना कैडर झोपड़ी दर झोपड़ी ‘हाथी’ बाँध देगा और उसपर मोहर लगाने से पहले लखनऊ में उसके नये ‘अमृत  मन्दिर’ के दर्शन कराने का हर प्रयास करेगा| इसे यूं भी कहा जा सकता है कि बसपा के दोनों हाथों में लड्डू हैं| बाकी के साझेदार एक झंडे के नीचे सोनिया गांधी की रणनीति के पीछे- पीछे होंगे क्योंकि हर किसी को नोटबंदी,जीएसटी के साथ अपने अपमान की कसक भी साल रही है| उससे भी बड़ी बात तुर्की ब तुर्की भाजपा मुक्त भारत की मंशा सभी दलों की है, रह गई सारे दल एक हो ही नहीं सकते का मुगालता पालने वालों के लिए कर्नाटक, कैराना की सनद काफी है|

-राम प्रकाश वरमा, सम्पादक- प्रियंका न्यूज



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