तिल उत्पादन की उन्नत तकनीक : डा.रवि
| Rainbow News - Jul 3 2018 11:19AM

तिल का उपयोग रेवडी, लडड् बनान के साथ-साथ अन्य विभिन्न रूप मे बिशेष रूप से किया जाता है। इसके तेल का उपयोग पूजा पाठ, शरीर मे लगाने के काम आता है। अम्बेडकर नगर जनपद  में तिल का क्षेत्रफल 5 हेक्टेयर से भी कम और उत्पादकता 2कुन्टल से अधिक नही है। प्रदेश की औसत उपज केवल 3.03 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ही है। तिल की खेती अनउपजाऊ भुमि पर किसानो द्वारा की जाती है। हल्की रेतीली, दोमट मिट्टी तिल उत्पादन के लिए उपयुक्त होती है।भूमि की दो-तीन जुताईयाँ कल्टीवेटर या देशी हल से कर एक पाटा लगाना आवश्यक है, जिससे भूमि बुवाई के लिए तैयार हो जाती है।

नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौधोगिक विश्व विधालय कुमारगंज फैजाबाद द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र पाँती अम्बेडकर नगर के कार्यक्रम समन्वयक डा.रवि प्रकाश मौर्य ने खरीफ मे तिलहन के रूप मे तिल की खेती करने की सलाह दी। उन्होने बताया कि इसकी खेती अकेले या सहफसली के रूप अरहर, मक्का एवं ज्वार के साथ  की जा सकती है। तिल की बुवाई कतारों में करनी चाहिए जिससे खेत में खरपतवार एवं अन्य कृषण क्रिया में आसानी हो सके। इसलिए तिल की बुवाई 30 -45से.मी. कतार से कतार एवं 15 से.मी. पौध से पौध की दूरी एवं बीज की गहराई 2से.मी. रखी जाती है।मानसून आने पर जुलाई के द्वितीय पखवारे में तिल की बुआई अवश्य कर देनीचाहिए। एक किलोग्राम स्वच्छ एवं स्वस्थ बीज /बीघा की दर से प्रयोग करे।बीज का आकार छोटा होने के कारण बीज को रेत,राख या सूखी हल्की बलुई मिट्टी मे मिला कर बोये।

तिल की उन्नतशील प्रजातियाँ टा-78,शेखर,प्रगति, तरूण आदि की फलियाँ एकल ए्वं सन्मुखी तथा आर.टी. 351 प्रजाति की फलियाँ बहुफलीय एवं सन्मुखी होती है। पकने की अवधि 80-85दिन एवं उपज क्षमता  2.0-2.50कुन्टल प्रति बीघा  है। थीरम  3 ग्राम एवं ग्रा. 1.ग्रा. कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके ही बीज को बोना चाहिए। मृदा परीक्षण के आधार पर उर्बरक का प्रयोग करे। तिल की बोआई के समय प्रति बीघा 8 कि.ग्रा. यूरिया, 31कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट एवं 5 कि.ग्रा. गंधक या 50किग्रा जिप्सम की आवश्यकता होती है। 8किग्रा. यूरिया की मात्रा बुवाई के 30 दिन पर देना चाहिए।प्रथम निराई गुडाई ,बुवाई के 15से 20 दिन बाद, दूसरी निराई 30-35 दिन बाद  कर सकते है। निराई गुडाई करते समय विरलीकरण कर पौधो की आपसी दूरी 10-15 सेमी कर ले। रोग कीट का भी ध्यान रखना चाहिये।

जीवाणु अंगमारी रोग मे पत्तियों पर जल कण जेसे छोटे बिखरे हुए धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर भूरे हो जाते है यह बीमारी चार से छः पत्तियों की अवस्था में देखने को मिलती हें बीमारी नजर आते ही स्ट्रेप्टोसाक्लिन 4ग्राम को 150लीटर पानी मे घोल कर पत्तियों पर छिडकाव करें इस प्रकार 15 दिन के अन्तर पर दो बार छिडकाव करें।तना और जड़ सड.न रोग का प्रकोप होने पर पोधे सूखने लगते है तथा तना उपर से नीचे की ओर सड़ने लगता है, इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार जरूरी है। चूर्णी फफूंद रोग जब फसल 45 से 50 दिन की हो जाती है तो पत्तियों पर सफेद चकते पड़ जाते है, इससे पतियाँ गिरने लगती है इस रोग के नियंत्रण के लिए पत्तियों पर घुलनशील सल्फर 1/2 किग्रा. को 150लीटर पानी मे घोल कर छिड़काव फूल आने और फली बनने के समय करें।तिल का पत्ती मोड़क और फली छेदक कीट, प्रारम्भिक अवस्था में कोमल पत्तियों को खाता है तथा बाद में फूल, फली एवं दाने को खाता है। इसके नियंत्रण के लिए फुल आने की अवस्था में 15 दिन के अन्तराल से मोनोक्रोटोफ़ॉस 36 एस.एल. 185मि.ली. प्रति 185 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा की दर से तीन बार छिडकाव करें।

तिल हाक मॉथ की सुंडी पत्तियों को खाकर उन्हें खराब कर देती है इसलिए कीट का प्रकोप नजर आते ही 5% कार्बोरिल 5कि..ग्रा. प्रति बीघा की दर से भुरकाव करें। बिहार रोमिल केटरपिलर प्रारम्भिक अवस्था में इस कीट के लार्वा कुछ पोधो पर इकट्ठा होकर पत्तियों को खाते है बाद में बढ़े होकर पोधों को नष्ट कर देते है इस कीट के नियंत्रण के लिए क्वीनाल्फोस 25 ई.सी. 250मि ली. को150 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करे। पोधों की पत्तियां जब पिली पड़ने लगे तब फसल की कटाई करना अत्यंत आवश्यक है, नही तो फलियों से दाने चटक कर जमीन पर गिर जाते है। कटाई करने के उपरांत कुछ दिन के लिए एक जगह रख कर सुख लिया जाना चाहिए इसके उपरांत गहाई करके स्वच्छ एवं साफ बोरो में भंडारित करना चाहिए।



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