यू.पी. डॉन मुन्ना बजरंगी के बारे में आप भी जानें...
| Agency - Jul 9 2018 12:48PM

उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में गोली मारकर हत्या कर दी गई। मुन्ना बजरंगी को कल रात ही झांसी जेल से बागपत जेल ट्रांसफर किया गया था। मुन्ना को उत्तराखंड के कुख्यात अपराधी सुनील राठी और विक्की सुंहेड़ा के साथ रखा गया था। पूर्वांचल में खौफ का पर्याय बन चुके मुन्ना बजरंगी के सिर 40 से ज्यादा हत्याओं का आरोप है। उत्तर प्रदेश में मुन्ना के नाम से ही लोग कांपते थे।

मुन्ना बजरंगी का असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह था। 1967 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में जन्में मुन्ना को उसके पिता बड़ा आदमी बनाना चाहते थे। उसके पिता का सपना था कि मुन्ना पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने, लेकिन मुन्ना के सिर पर कोई और ही भूत सवार था। मुन्ना तो फिल्मों की तरह बड़ा गैंगस्टर बनना चाहता था। इसलिए मुन्ना ने पांचवी के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और गैंगस्टर की दुनिया में जानें वाले शौक पाल लिए।

मुन्ना को फिल्मों की तरह बड़ा गैंगस्टर बनना था। उसे हथियार रखने का भी शौक चढ़ गया था। जुर्म की दुनिया में जाने के शौक के चलते 17 साल की उम्र में ही उसपर पहला मुकदमा दर्ज हो गया था। उसके खिलाफ जौनपुर के सुरेही थाना में मारपीट और अवैध हथियार रखने का केस दर्ज किया गया। अपने पहले मुकदमे के बाद मुन्ना इस अंधेरी दुनिया में धंसता ही चला गया। अपराध की दुनिया में अपना नाम बनाने के लिए मुन्ना जौनपुर के स्थानीय दबंग गजराज सिंह के साथ हो गया। उसके संरक्षण में मुन्ना जुर्म की दुनिया में आगे बढ़ने लगा।

उसने 1984 में पहली हत्या को अंजाम दिया। मुन्ना ने लूट के लिए एक व्यापारी की हत्या की थी। मुन्ना पर गजराज सिंह का असर बढ़ता गया और उसी के इशारे पर उसने भाजपा नेता रामचंद्र सिंह की हत्या कर दी थी। रामचंद्र सिंह की हत्या के बाद पूर्वांचल में मुन्ना का खौफ हो गया। इसके बाद से उसपर कई लोगों की हत्याएं के आरोप लगे। 90 के दशक में पूर्वांचल में अपनी दबंगई बढ़ाने के लिए वो माफिया डॉन से नेता बने मुख्तार अंसारी से जुड़ गया।

मुख्तार अंसारी का गैंग मऊ से चल रहा था लेकिन इसका खौफ पूरे पूर्वांचल में था। 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मऊ से विधायक बनने के बाद मुख्तार अंसारी के गैंग का दबदबा और बढ़ गया था। अंसारी के साथ मुन्ना ठेके और वसूली का काम करने लगा। इस दौरान अंसारी के कट्टर दुश्मन ब्रिजेश सिंह की संरक्षण में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय तेजी से उभरने लगे। कृष्णानंद राय का गैंग तेजी से बढ़ रहा था और अंसारी के लिए चुनौती साबित हो रहा था। राय को खत्म करने की जिम्मेदारी अंसारी ने मुन्ना को सौंप दी।

कृष्णानंद राय की मौत गैंगवॉर की सबसे निर्मम मौतों में से एक है। 29 नवंबर 2005 को अंसारी के आदेश पर मुन्ना ने राय की मौत की साजिश रची। कृष्णानंद राय लखनऊ हाईवे से गुजर रहे थे जब मुन्ना ने अपने साथियों के साथ उनकी दो गाड़ियों पर इतनी गोलियां बरसाईं की सभी का शरीर छलनी हो गया। मुन्ना और उसके गैंग ने दोनों गाड़ियों पर एके47 से करीब 400 गोलियां बरसाईं थीं। इस हत्याकांड में राय के साथ 6 अन्य लोग भी मारे गए थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हर किसी के शरीर से 40 से 100 गोलियां निकली थीं।

इस हत्याकांड के बाद से मुन्ना बजरंगी का खौफ हो गया। उत्तर प्रदेश में मुन्ना मोस्ट वॉन्टेड क्रिमिनल बन गया था। हत्या के अन्य मामलों में मुन्ना को उत्तर प्रदेश, एसटीएफ और सीबीआई ढूंढ रही थी। पुलिस से बचने के लिए मुन्ना अपने ठिकाने बदलने लगा। उत्तर प्रदेश और बिहार में मुन्ना को ढूंढने का ज्यादा दबाव था, इसलिए वो मुंबई भाग गया। मुंबई में मुन्ना के अंडरवर्ल्ड से भी कॉन्टैक्ट मजबूत हो गए और वो कई बार विदेश भी गया। मुंबई में मुन्ना लंबे अरसे तक रहा और वहां फोन से ही अपना नेटवर्क चलाया।

मुन्ना पर कई राज्यों में मामले दर्ज थे और पुलिस उसके हर जगह तलाश रही थी। आखिर 20 अक्टूबर 2009 को मुन्ना दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया। कहा जाता है कि मुन्ना को अपने एनकाउंटर का डर था, इसलिए उसने खुद अपनी गिरफ्तारी कराई थी। दिल्ली पुलिस ने मुंबई पुलिस के साथ मिलकर 29 अक्टूबर, 2009 में मलाड से मुन्ना को गिरफ्तार किया गया। दिल्ली पुलिस ने कहा था कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह की हत्या में मुन्ना के शामिल होने का शक है। कहा जाता है की 20 साल के अपने आपराधिक जीवन में मुन्ना पर 40 हत्याओं का आरोप हैं। इसके अलावा उसपर कई अन्य केस भी दर्ज हैं।



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