साहब हमहूँ सस्पेंड होईबे
| Dr. Avinash Kumar Jha - Jul 11 2018 12:19PM

निलंबित होना ऐसी दुर्घटना है जो प्राय सतर प्रतिशत कर्मचारियों के लिए सुकुन देनेवाला है। साहब ! काम काज तो हम वैसे ही नही करते पर ई जो सबदिन आफिस आने का जुलुम जो हम ढाह रहे हो ,अच्छा नही है। हमारी बद्दुआ देगी, कीड़े पड़ेंगे यदि अब जो अबसेंट लगाया! उपर से ई जो अंगुठा चेंपने वाला मशीन लगाकर तो हाइट कर दिए। अब कैसे सब दिन समय से आकर बायोमेट्रिक करेंगे। इससे आसान है सस्पेंड हो जाना। तो हो लिए ! कौन सा कठिन बात है और कौन काम पर फर्क पड़नेवाला है! " बने रहो पगला, काम करेगा अगला!" ऐसे सौभाग्यशाली सरकारी विभागों मे पाये जाते हैं जो "निलंबन" का उपयोग भी मौज के लिए कर लेते हैं।

सरकारी सिस्टम मे कहा जाता है कि "सस्पेंशन इज नाट अ पनिशमेंट"! और यह होता भी नही है बल्कि यह इसलिए किया जाता है की पद पर रहते हुए वो कर्मचारी अपने विरुद्ध चल रहे जांच को प्रभावित न कर सके। यदि जांच पूरी हो जाने के बाद वह दोषी नही पाया जाता तो सवेतन और समस्त सुविधाओं सहित बहाल हो जाता है ।बस यहीं पर मौज है। सूरज भाई जी को अपना घर बनवाना था, अब इतने लंबे समय तक छुट्टी तो मिल नही पाती तो उन्होंने अपनी एक जानबूझकर दबी दबायी फाइल को धूल झाड़कर उपर करवा दिया।  सरकारी विभागों मे फाइलों के नीचे दबने और उपर उठने के लिए बस एक ही नियम है जो न्यूटन के नियम द्वितीय नियम के समान है।

एक अधिकारी कहते हैं" निलंबित न करो, यदि दोषी है तो बर्खास्त करो!" हालांकि यह कुछ ज्यादा बड़ा दंड हो जाएगा। बचपन मे एक मुहावरा प्रचलित था".पीठ ओढ़ना!" यानि कि सब लाज शर्म छोड़कर पीठ सामने कर देना, जितना चाहो, उतना मारो! ऐसे लोगों के लिए निलंबन एक हथियार है अपने सारे शौक पूरा करने का समय निकालने के लिए। झिनकु प्रसाद जी कुल मिलाकर किस्तों मे अपने सर्विस पीरियड की एक तिहाई अवधि मे निलंबित रहे, अर्थात काम कुछ भी नही किया, उल्टे अपने घर पर खेती बाड़ी करते रहे और बीच बीच मे बहाल होकर पूरा वेतन लेते रहे।

मजे की बात तो यह है कि उसे सहानुभूति भी चाहिए। यदि किसी ने कुछ कह दिया तो" चच्..च ! कैसा जालिम अधिकारी है! एक तो बेचारा सस्पेंड चल रहा है ,उपर से ऐसी बात! अपने सस्पेंड हो तो दरद पता चले!"लाल फीताशाही ऐसी की यदि कोई बहाल न कराना चाहे तो अपने मन से विभाग तो बहाल करने से रहा! भले ही वह पांच साल तक पड़ा रहे। वो तो भला हो उस निलंबित भलामानुष का कि कुछ महीनों के बाद उसमे कर्तव्यपरायणता जाग जाती है और वह जी जान फाइल को दौड़ाने मे जुट जाता है।

निलंबन से बस सामाजिक प्रतिष्ठा पर धक्का पहुंचता है। आप भले वेवजह बस नाम के लिए सस्पेंड कर दिए गये हों गांव समाज और विभाग मे यही इंप्रेशन जाता है कि कोई लंबा घोटाला किया है, तगड़ा हाथ मारा है, कुछ गड़बड़ी तो जरूर किया है। अब आप किस किसको सफाई देते फिरेंगे। तो जो " पीठ ओढ़ने" वाले जीव नही है या जिनको अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा का ख्याल होता है, इससे बचना चाहते हैं। कुछ दिन तो यह कहकर टाल जाते हैं कि छुट्टी लिया है पर ज्यादा दिन होने पर शक होने लगता है! ऐसी स्थिति मे यदि पैसा पास मे है तो घूमने चल दो! सब काम काज निबटा के आओ तब बहाली बाबू के पास मिठाई लेके।  " कर जोरि विनमऊं, विमल तरंगे!"

कुल मिलाकर मालदार विभागों के कर्मियों के लिए निलंबन अवधि ".राजयोग " है जिसे सरकार ने उन्हें प्रदान किया है कि कमाये गये माल को ठिकाने लगायें और पुन: तैयारी के साथ काम जूट जायें। यदि समय उपयुक्त नही होता है त़ तत्काल बहाली के लिए माननीय न्यायालय का द्वार हमेशा खुला है!



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