लाखों ईमानदार स्वयं सेवकों वाले संघ की संतान सरकारें दागी क्यों
| -K.P. Singh - Jul 17 2018 5:47PM

केंद्र के साथ-साथ देश के अधिकांश राज्यों में भी भाजपा की सरकारें गठित हो चुकी हैं जो कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दिशा निर्देशन में काम करती हैं। कई राज्यों में तो जो मुख्यमंत्री बने हैं वे संघ के पूर्ण कालिक प्रचारक रह चुके हैं। यहां तक स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रचारक रह चुके हैं। संघ के लिए यह एक तरह से स्वर्ण युग है। लेकिन यह उसके लिए जंग लगे लोहे से भी बदतर समय क्यों साबित हो रहा है यह सोचनीय है। संघ का रुतबा इस दिग्विजय से भौतिक विस्तार में कितना भी बड़ा हो लेकिन उसके सामने चुनौती यह है कि 57 हजार से अधिक शाखाओं के संचालन 1 करोड़ के लगभग प्रशिक्षित स्वयं सेवक होने के बावजूद शुचिता और मर्यादा की जीवन शैली की व्यवहारिक स्तर पर साख के मामले में वह इस दौर में इतना फिसडडी क्यों साबित हुआ। संघ के सत्ताधारियों पर जो आरोप लग रहे हैं वे अन्य पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं से ज्यादा गंभीर हैं। संघ की समन्वय बैठकों में उसके अपने लोग तक सत्ता में बैठे हुए लोगों के निर्लज्ज प्रदर्शन पर न केवल निराशा बल्कि आक्रोश प्रकट किये बिना नही रहते फिर भी संघ का शीर्ष नेतृत्व मूक दर्शक से अधिक की भूमिका नही निभा पा रहा।
    केंद्र सरकार के प्रतिनिधि बार-बार मंचों से दोहराते हैं कि उन पर कांग्रेस की सरकार की तरह चार साल से अधिक समय में भ्रष्टाचार के आरोप नही लगे जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। पहले लोग जोर-जोर से भाजपा नेताओं के हुंकार भरने की भाषण शैली से गहराई तक प्रभावित हो जाते थे। लेकिन अब खुद प्रधानमंत्री तक भाषणों के माध्यम से स्वयं सत्यापन के मामले में पूरी तरह असर खो चुके हैं। उनके बारे में यह धारणा बन चुकी है कि वे अपनी बात को किसी आशु कवि की तरह जमा ले जाने भर की कला जानते हैं। लेकिन उनकी बातों में प्रमाणिकता का पुट अनुभव करना स्वयं को मुगालते में रखने जैसा है। स्मार्ट सिटी से लेकर बुलेट ट्रेन तक सिर्फ नये-नये स्लोगन गढ़ने में उनको महारथ हासिल है। लेकिन सच्चाई यह है कि उनके किसी काम या नीति में निष्ठा और वास्तविक लगन की कमी की वजह से निरंतरता नही होती। केंद्र सरकार का वर्तमान कार्यकाल पूर्ण होने में अब केवल महीनों का समय शेष रह गया है। लेकिन यथार्थ में इस समय में उनके पास बताने के लिए कोई ठोस काम नही है। ज्यादातर उन कामों का उदघाटन प्रधानमंत्री ने किया है जो पिछली सरकारों में शुरू हुए थे। हर गांव में अपने कार्यकाल में बिजली पहुंचा देने का उनका दम भरना इसकी बानगी कहा जा सकता है। क्योंकि जब उन्होंने कार्यभार संभाला था तब मुटठी भर गांव ही बचे रह गये थे जहां बिजली पहुंचाई जानी थी। लेकिन श्रेय ले रहे हैं वे आजादी से आज तक। गांवों के विद्युतीकरण के पूरे सिलसिले का। जैसे हर घर में शौचालय बनवाने का दम वे ऐसे भरते है जैसे यह उनकी मौलिक सूझ हो लेकिन सभी को याद है कि 1989 में जब मुलायम सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब वे अपनी हर सभा में शौंच के लिए महिलाओं के बाहर जाने से उनकों होने वाली तकलीफों का जिक्र करते हुए हर घर में शौचालय के निर्माण पर बल देना नही भूलते थे। इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर विभाग से सूची मांगी है कि उनके यहां कौन से ऐसे कार्य हैं जो लगभग पूर्ण हो चुके हैं और जिनके उदघाटन के पत्थर का अनावरण किया जा सकता है। एक एक्सप्रेस-वे का उदघाटन उन्होंने इस कड़ी में इतनी जल्दबाजी में कर दिया कि अभी वह 10 किलोमीटर भी पूरा नही हो पाया है।
    उनके भाषणों का आलम यह है कि वे इंदिरा गांधी व बेनजीर भुटटो के बीच शिमला समझौता करा चुके हैं। तक्षशिला को भारत में बता चुके हैं। भगत सिंह के कालापानी में बंद रहने के दौरान उन्हें मिली यातनाओं पर बहुत मार्मिकता जता चुके हैं। जो जनरल करिअप्पा चीन से युद्ध छिड़ने से 9 साल पहले रिटायर हो चुके थे उन्हें चीन के युद्ध के समय नेहरू द्वारा अपमानित किये जाने का ज्ञान बघार चुके हैं। 1948 में कश्मीर में हुए कबाइली आक्रमण को विफल करने वाले जनरल थिमैया से नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन की बदतमीजी के कारण इस्तीफा दिलवा चुके हैं। जबकि हकीकत यह है कि जनरल थिमैया ने न केवल इस्तीफा नही दिया था बल्कि नेहरू ने उन्हें 1957 में थल सेनाध्यक्ष तक बनाया था और 1948 के कबाइली आक्रमण के समय कृष्णा मेनन नही बल्कि बलदेव सिंह रक्षा मंत्री थे। विदेशी धरती पर वे अपने को गत चुनाव में भारत के 65 अरब मतदाताओं के समर्थन मिलने का अभूतपूर्व दावा कर चुके हैं। उनका मैनेजमेंट अच्छा है इसलिए इतनी गल्तियों के बावजूद उनका राहुल की तरह मखौल नही उड़ रहा है। लेकिन इसके बावजूद उनकी बौद्धिक क्षमताएं जनमानस के बीच कहीं न कहीं तो संदिग्ध हो ही चुकी हैं। पहले उनके लिए फेंकूराम का संबोधन विपक्ष की कुंठा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। भले ही आज भी उनका इतना लिहाज है कि आम जनता के मुंह से उनके लिए फेंकू का तंज नही निकल पाता। लेकिन अव्यक्त तौर पर लोग उन्हें फेंकू ही मान बैठे हैं। इसलिए पहले की तरह उनके दांवों पर आंख मूंदकर यकीन करने की बजाय लोग दूसरे श्रोतों से जानकारी हासिल करते हैं तांकि यह पता लगा सकें कि प्रधानमंत्री ने जो कहा है उसमें मैनूपुलेशन कितना है।
    इसलिए यह दावा कि चार साल में केंद्र सरकार पर किसी बड़े घोटाले का आरोप नही लगा तो उन्हें हरिश्चंद्र का अवतार कह दिया जाये। यह बात लोगों के गले नही उतर रही है। सवाल यह है कि उनके पास घोटाले के नाम पर कुछ छुपाने को नही है। तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार खाने के बावजूद उन्हें लोकपाल की नियुक्ति करना मंजूर क्यों नही हो रहा। सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी भले ही अपने लिए नही लेकिन अपनी ब्रांडिंग पर होने वाले बेतहाशा खर्च के लिए सरकार को कुछ कंपनियों के हाथों में गिरवी रख चुके हैं। हाल में जिन विश्वविद्यालयों को उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय रेकिंग में उत्कृष्टता की दृष्टि से संवारने के लिए अपनाया है उनमें अंबानी के अजन्मे विश्वविद्यालय का नाम होने से यह कलई और खुल गई है। अंबानी ग्रुप वह है जो जोंक की तरह चिपककर सरकारों का खून पीने के लिए जाना जाता है। पहले यह कांग्रेस की सरकार पर्दे के पीछे से चलाता था। ईमानदार नेता इस ग्रुप को किसी कीमत पर बर्दाश्त नही कर सकता। इसीलिए जब वीपी सिंह वित्त मंत्री थे तो उन्होंने फेयर फैक्स नाम की दुनियां की वित्तीय अभिसूचना के मामले में दुनियां की सबसे एक्सपर्ट एजेंसी से सर्वे कराकर देश में सबसे ज्यादा काला धन रखने वालों में अंबानी का नाम सर्वोपरि आने पर इनका टेटुआ पकड़ लिया था। जिसके चलते वीपी सिंह को बाद में सरकार से बाहर हो जाना पड़ा था। चूंकि इस देश में दीन-दुखियों को उनका अधिकार दिलाना सबसे बड़ा पाप है इसलिए मंडल रिपोर्ट लागू होने के बाद उन्हें लगातार गालियां दी गईं। लेकिन गाली देने वाले भी वीपी सिंह आर्थिक रूप से बेइमान थे यह आरोप कभी नही लगा सके। जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गये थे तो अंबानी ग्रुप के अंडे सटक गये थे और उनकी सरकार गिरवाने के लिए उन्होंने अपनी थैली के मुंह खोल दिये थे। जिसके बाद जब उनकी कृपापात्र चंद्रशेखर सरकार बन गई तब कहीं जाकर अंबानी को चैन में चैन आया था। आज बच्चा-बच्चा जानता है कि अडानी और अंबानी मोदी सरकार के खैरख्वाह हैं। फिर यह सरकार अपने को दूध को धुल साबित कैसे कर सकती है। हालांकि यह बात सही है कि मोदी बेइमानी करके अपनी या अपने परिवार की जायदाद नही बना रहे पर दूसरे मंत्रियों का क्या हाल है। अकेले सुषमा स्वराज को छोड़कर किसी मंत्री के बारे में यह दावा नही किया जा सकता कि वह पैसा नही बना रहा है। दिल्ली में हर मंत्री के दलालों के नाम बताने वाले जगह-जगह मिल जायेगें। जिनसे सौदे की बात कर लो संबंधित मंत्री के मंत्रालय का कोई भी काम तपाक से हो जायेगा।
    सही बात तो यह है कि चाहे केंद्र में हो या राज्यों में भाजपा के लोग अकाल के भूखों की तरह सत्ता मिलते ही खाने के लिए टूट पड़े हैं। फिर संघ अपनी पाठशाला में इन्हें जो संस्कार दे रहा था उन पर कैसे और किस शैतान की छाया बैठ गई। क्यों यह सवाल पूंछा नही जाना चाहिए। यहां तक कि संघ के कोटे से चाहे वे संगठन मंत्री हो या अन्य, सरकार में उन्होंने बेइमानी की पराकाष्ठा कर दी है। क्या इनकी उगाही से संघ परिचित नही है। उन पर लगाम क्यों नही लगाई जा रही है। उत्तर प्रदेश में संघ ने हाल में ऐसे ही आरोपों के कारण अपने कई क्षेत्रीय संगठन मंत्रियों की छुटटी कर दी ै। और कहा है कि भविष्य में वे लोग संगठन मंत्री नही बनाये जायेंगे जिनके परिवार है। क्या संघ अब प्रायश्चित की मुदा्र मे है।
संघ वामपंथियों के खिलाफ विषवमन करता रहता है क्योंकि वामपंथी धर्म को अफीम मानते हैं और संघ जैसे संगठनों की निगाह में धर्म को न मानने का मतलब पतित होना है। क्या सचमुच धर्म को मानने से लोग लोभ-लालच और अन्य तृप्ताओं से परे हो जाते हैं। अगर यह धारणा सही है तो धर्म को सबसे ज्यादा बदनाम संघ जैसे संगठनों के कारण होना पड़ रहा है जो धर्म की दुहाई देकर भी लोगों को संयम की परिधि में नही बांध पा रहा। इंद्रजीत गुप्ता संयुक्त मोर्चे की सरकार में कम्युनिष्ट पार्टी के कोटे से गृहमंत्री थे लेकिन उन्होेंने वीतराग होने की मिसाल कायम की। वे आक्सफोर्ड में पढ़े थे उनके पास हजारों एकड़ जमीन थी जो पूरी सरकार को दे चुके थे। लेकिन भारत सरकार के केंद्रीय गृह मंत्री होते हुए भी उन्होंने कोई तामझाम स्वीकार नही किया। गृह मंत्री बनने के बाद भी वे बंगले में जाने की बजाय फ्लेट में ही रहते रहे। उन्होंने कोई अतरिक्त सुरक्षा नही ली। केरल में कई बार मुख्यमंत्री रहे ईएमएस नम्बूदरीपाद का जीवन भी इसी तरह का उदाहरण रहा। त्रिपुरा में हाल में मुख्यमंत्री पद से हटे माणिक सरकार के त्याग और सादगी का क्या कोई संघ निष्ठ भाजपाई मंत्री/मुख्यमंत्री मुकाबला कर पायेगा। मैक्सिको में कम्युनिष्ट पार्टी का सत्ता मिली है। वहां के प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वे सिर्फ आधा वेतन लेगें। ऐसे ही कोई घोषणा भाजपा के सत्ताधारी क्यों नही कर पा रहे। देश में ही भाजपा के सहयोगी होते हुए भी बिहार के धर्मनिरपेक्ष मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने शराब बंदी की घोषणा कर दी। पर यूपी में सन्यासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद देशज तौर तरीकों को असभ्य साबित करने की भावना भरने वाले कांवेंट स्कूलों के खिलाफ उदगार व्यक्त करके भी योगी आदित्यनाथ उन्हें पोसने को क्यो मजबूर हो गये। भाजपा की सरकार में भारतीय संस्कृति के विरोधी रीति-रिवाजों का जिस तेजी से अनुकरण हो रहा है क्या उसके बाद भी इसे भारतीय गौरव की दुहाई देने का अधिकार है। उदाहरण के तौर पर कितने भाजपाई हैं जिन्होंने सरकार बनने के बाद कन्याओं को वेटर बनाने वाले मांगलिक समारोह में इसलिए प्रदर्शन किया हो क्योंकि भारतीय संस्कृति किसी कन्या से ऐसा काम कराना अधर्म समझती है और इसी भावना के तहत यहां कन्याओं को पूजकर उनके भोज आयोजित करने जैसे अनुष्ठान प्रचलित हैं।
    संघ को यह सब इसलिए सोचना पड़ेगा कि इस संगठन के 90 प्रतिशत स्वयं सेवक वास्तव में ईमानदार हैं जिन्हें रोल मोडल बनाने की बजाय डंक विहीन करके सुसुप्तावस्था में पड़ें रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। संघ की पहचान वे लोग बन गये हैं जिन्हें संघ जिम्मेदारियां दिला रहा है। क्या इस तरह संघ उन पर लगाम न लगाकर अपने संगठन की पहचान को दागी बनाने का आत्मघात नही कर रहा।
    धर्म इंद्रिय निग्रह का नाम है, संयम से प्रेरित जीवन शैली है जो व्यक्तित्व को अनुशासित बनाती है। कुछ लोगों ने धर्म को उसकी अध्यात्मिक तात्विकता से हटाकर उसमें भी विलास की गुंजाइश ढूंढ़ी। भगवान का अदभुत श्रंगार, छप्पन भोग का अर्पण यह सारे चोंचले लोगों की धार्मिक चेतना को उददीप्त करते हैं या इनसे विकृत और बेलगाम मानसिकता का उददीपन होता है यहा सोचने का प्रश्न है। धर्म के इसी आडंबरी स्वरूप को आरएसएस राज में बढ़ावा दिया जा रहा है।
    संघ हो या कम्युनिष्ट पार्टियां दोनों में व्यक्तिवाद की कोई गुंजाइश नही होती। उदाहरण के तौर पर माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने नही चाहा तो ज्योति बसु जैसे कददावर नेता को प्रधानमंत्री की कुर्सी से मन मारकर पीछे हट जाना पड़ा। लेकिन आज संघ में तो उल्टा हो रहा है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर अब प्रवीण तोगड़िया तक एक व्यक्ति ने नही चाहा तो किनारे लग जाना पड़ा। नीतिगत विचलन पर भारतीय मजदूर संघ ने उंगली उठाई तो संघ हाईकमान ने ही उस पर वीटो लगा दिया। लगता है संघ ने संघ शक्ति पर विश्वास खो दिया है और व्यक्ति महिमा के जाल में उलझ गया है। शायद उसके इरादों के अपने ही सत्ता में पतन की बड़ी वजह यह भी है।



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