राहुल से मुख्य प्रतिद्वंदता समझने की मोदी की भूल
| -K.P. Singh - Jul 20 2018 2:06PM

तो क्या भाजपा गंभीरता पूर्वक यह मानती है कि अगर विपक्ष के भाग्य से सत्ता का छीका टूट गया तो प्रधानमंत्री की दौड़ में राहुल गांधी सबसे आगे होगें। दूसरी ओर भाजपा का आंकलन भले ही कुछ भी हो निष्पक्ष प्रेक्षक इससे इत्तेफाक नही रखते। इस समय भाजपा जबर्दस्त एंटी इन्काबेन्सी फैक्टर से जूझ रही है फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने भाषणों से उनकी तमाम गलतिया और बचकानापन लगातार उजागर होने के बावजूद लोगों को चकाचैध कर लेने की जो महारथ हासिल है उसे देखते हुए चुनाव के निर्णायक दौर में उनसे पासा पलटने की पूरी उम्मीद उनकी पार्टी रखती है। फिर भी अगर सत्ता विरोध लहर की वजह से भाजपा में ने स्पष्ट बहुमत हासिल करने का बहुमत खो भी दिया तब भी उसका ग्राफ नीचे जाने की एक सीमा है। कुल मिलाकर जो तस्वीर बन रही है वह हंग पार्लियामेंट की है। ऐसे में विपक्षी दलों में कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी पार्टी हो लेकिन उसके सहयोगी प्रधानमंत्री का ताज थाली में सजाकर राहुल को परोसना आसानी से स्वीकार नही कर सकते। जाहिर है कि राहुल को व्यक्तिगत रूप से इसलिए टारगेट करने में भाजपा द्वारा ऊर्जा खर्च करने का कोई औचित्य नही है कि अगर विपक्षी सेनापति को ही उन्होंने घेर लिया तो विपक्षी सेना में दमखम कहां बचेगा।
    हाल में ममता बनर्जी, शरद पवांर आदि के बयान आये हैं। सभी का सार यह है कि वे कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी महागठबंधन के लिए तैयार हैं लेकिन राहुल को अपना नेता स्वीकार करना उन्हें हजम नही हो सकता। अलबत्ता अगर सोनिया गांधी खुद अगुवाई करें तो उन्हें कोई आपत्ति नही होगी। पर यह नही भूला जाना चाहिए कि सोनिया गांधी तो शुरू में ही अपने विदेशी मूल के विवाद से विचलित होकर स्वयं को प्रधानमंत्री पद की होड़ से अलग कर चुकी हैं। ऐसे में उनके नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की भी जाये तो उसका कोई अर्थ नही है। लेकिन भाजपा का एक सूत्रीय कार्यक्रम चल रहा है किसी तरह कांग्रेस और सोनिया राहुल का झंडा गिराना। हाल में पश्चिम बंगाल के अपने दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी के खिलाफ बहुत ही तल्ख भाषण दिया लेकिन सभी जानते हैं कि यह सिर्फ मंचीय प्रदर्शन है। ममता बनर्जी को वे अपना गंभीर और कटटर प्रतिद्वंदी नही मानते। रही बात शरद पवांर, सपा और बसपा की उनसे तो भविष्य में मौका पड़ जाने पर वे सहयोग तक की उम्मीद रखते हैं।
    कांग्रेस के प्रति भाजपा की अतिशय कुंठा का नतीजा है कि वर्तमान लोक सभा के गठन के पहले दिन से ही यह पार्टी अमेठी और रायबरेली को भेदने की तिकड़म में लगी है। स्मृति ईरानी अमेठी से चुनाव हार जाने के बावजूद इसी कारण से यहां अपनी आक्रामक सक्रियता बरकरार रखे हुए हैं। जबकि यह कोई उनका गृह क्षेत्र नही है। उन्होंने इस बीच अमेठी में कांग्रेस के कई गढ़ तोड़कर राहुल गांधी को प्रतिरक्षात्मक रुख अपनाने के लिए मजबूर करने में भी कोई कसर नही छोड़ी। सच्चाई तो यह है कि अमेठी में भाजपा द्वारा राहुल गांधी की इस कदर घेराबंदी की गई है कि वे इस क्षेत्र को अपनी बहन प्रियंका के ग्लैमरस सहयोग के बावजूद संभाल नही पा रहे।
    इसी कड़ी में अमेठी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की लगातार किलेबंदी भी दृष्टव्य है। 2014 के लोक सभा चुनाव में स्मृति ईरानी के अभियान की बागडोर भाजपा-संघ के समन्वयक डा. कृष्णगोपाल ने संभाली थी। जिससे 23 दिन के प्रचार अभियान में ही स्मृति ईरानी 3 लाख से अधिक रिकार्ड वोट बटोरने में सफल हो गई थीं। चुनाव हार जाने के बाद भी संघ ने अमेठी में अपनी पकड़ ढीली नही की। इस संसदीय क्षेत्र में संघ द्वारा अपने 300 से अधिक शाखाएं संचालित की जा रही हैं। अमेठी में सशक्त व्यूह रचना के लिए इस समूचे संसदीय क्षेत्र को संघ ने तीन जिलों और तीन सौ से अधिक मंडलों में बांट रखा है। इसे अमेठी, रायबरेली व जगदीशपुर जिलों में विभाजित किया गया है। खास बात यह है कि अमेठी संसदीय क्षेत्र का आधे से अधिक भाग काशी तो शेष आधा से कम भाग अवध क्षेत्र में आता है। अमेठी में संघ की सक्रियता का आलम अन्य क्षेत्रों से अलग है। सप्ताह में मंडली कार्यक्रम व महीने में मिलन कार्यक्रम के माध्यम से संघ की गतिविधियां सरगर्म रहती हैं। इसके अलावा हर साल अमेठी में प्राथमिक शिक्षा वर्ग का आयोजन कर नये लोगों को संघ से जोड़ा जाता है। दूसरी ओर कांग्रेस के नाम पर यहां चाटुकारों की और उन लोगों की टीम हावी है जो चाहते हैं कि कोई और राहुल, प्रियंका और सोनिया के नजदीक न फटक पाये। सत्ता के दलाल की तरह पार्टी में पहचाने जाने वाले इन लोगों की वजह से आम जनता में सोनिया और राहुल के प्रति पहले जो लगाव रहता था उसमें बहुत कमी आ गई है।
    उधर उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव अजीत सिंह को तो गठबंधन में शामिल करने के लिए तो तैयार हैं पर कांग्रेस को नहीं। उनका मानना है कि कांग्रेस समर्थकों की अपनी पार्टी के बाद पहली वरीयता भाजपा है। इसलिए कांग्रेस उन्हें अपना वोट बैंक ट्रांसफर नही करा सकती। उल्टे अगर कांग्रेस का उम्मीदवार उनके सामने मैदान में रहेगा तो भाजपा में सेंध लगाकर वह उनकी मदद करेगा। इस सोच के बावजूद दोनों पार्टियां अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस के सामने उम्मीदवार न खड़ा करने की हामी भर चुकी हैं। जिससे कांग्रेस की बहुत बड़ी मदद होने जा रही है। इसलिए कांग्रेस भाजपा की घेराबंदी के बावजूद निश्ंिचत है।
    दरअसल सपा और बसपा सोचती है कि अगर भाजपा का झंड़ा गिराना है तो कांग्रेस का मनोबल बना रहे। यह बहुत जरूरी है क्योंकि अधिकांश राज्यों में कांग्रेस ही भाजपा को टक्कर देने वाली पार्टी है। दूसरे कांग्रेस से उनको खतरा इसलिए नही है कि वह कितना भी जोर लगा ले फिलहाल अभी वह स्पष्ट बहुमत की दहलीज तक नही पहुंच पायेगी। इसलिए भाजपा को अर्श से फर्श पर धकेलने का पहला लक्ष्य पूरा हो जाये तो गठबंधन में सभी को अपने लिए संभावनाओं का द्वार नजर आ रहा है। राहुल गांधी की जो सोच है उसके मददेनजर उन्हें खुद खिचड़ी सरकार का मुखिया बनना रास नही आ सकता। कर्नाटक के मामले में वे जाहिर कर चुके हैं कि नेतृत्व के लिए बहुत अड़ना उनके मिजाज में नही है। भाजपा को सत्ता से बाहर कर दें इसी में उनकों पूरी संतुष्टि मिल जाती है।
    जहां तक भाजपा के कांग्रेस के प्रति दुराग्रह का सवाल है। इस मामले में उसकी सोच को ठीक नही कहा जा सकता। लोकतंत्र में सरकारें अदलती-बदलती रहती हैं। अटल-आडवाणी युग में विकसित देशों की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भारत में भी कमोवेश द्विदलीय प्रतिद्वंदिता की स्थिति उभर कर सामने आ चुकी थी। जिसे लेकर अटल-आडवाणी का रुख सकारात्मक था। पर मोदी की लाइन इसके विपरीत है। वे इस मुगालते में रहे कि कांग्रेस को खत्म करके वे ताजिंदगी अपना राज्य सुनिश्चित कर लेगें। लेकिन दूसरा कार्यकाल दोहराने में ही उन्हें जिस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा रहा है। उससे उनको वास्तविकता का भान होना चाहिए। अति कांग्रेस विरोध के कारण उन्होंने क्षेत्रीय दलों के लिए संजीवनी का फिर स्पेस पैदा कर दिया है। जिससे संयुक्त मोर्चा युग के राजनैतिक अराजकतावाद का जिन्न बोतल से निकलकर बाहर आता दिखाई देने लगा है।



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