बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते
| Rainbow News - Jul 27 2018 4:16PM

उत्तर प्रदेश में चुनावी मानसून आ गया है। वैसे भी अटकलें है कि लोकसभा के चुनाव अगले वर्ष की बजाय कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में होने वाले। विधानसभा चुनाव के साथ ही करा लिए जायेगें। मायावती और अखिलेश इस संभावना को लेकर अपने कार्यकर्ताओं को अभी से मुस्तैद हो जाने के लिए आगाह कर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मिर्जापुर, आजमगढ़ और शाहजहांपुर में ताबड़तोड़ सभाएं भी की हैं। इनमें विकास कार्यों की सौगात प्रदेशवासियों को बांटी जा रही हैं। वैसे तो भाजपा सभी जगह मुख्य रूप से कांग्रेस को निशाने पर रखती है लेकिन उत्तर प्रदेश में वह सपा और बसपा पर भी गोले दागने में कसर नही छोड़ रही। मोदी ने आजमगढ़ में कहा कि उनका और योगी का कोई परिवार नही है। यहां के लोग ही उनका परिवार हैं। इस बहाने उन्होंने मुलायम सिंह के उक्त संसदीय क्षेत्र में उनके परिवार प्रेम की बखिया उधेड़ने की कोशिश की है। क्योंकि परिवारवाद सपा की सबसे कमजोर नस है।

खास बात यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के अपने हालिया कार्यक्रमों में इन अटकलों को निर्मूल कर दिया है कि उप चुनावों में योगी की क्षमता संदिग्ध साबित हो जाने से लोकसभा के आम चुनाव के पहले उन्हें बदलकर उत्तर प्रदेश में नये मुख्यमंत्री की तैनाती कर दी जायेगी। इस तरह के कयासों को पूर्ण विराम देने के लिए मोदी और अमित शाह ने सार्वजनिक तौर पर योगी की जमकर तारीफ की। तांकि यह एहसास दिलाया जा सके कि उप चुनाव के नतीजे चाहे जो रहे हों लेकिन योगी पर अभी भी पार्टी को पूरा भरोसा है। इससे योगी का आत्मविश्वास भी बढ़ गया है और वे आक्रामकता के साथ सभायें संबोधित करने में धुआंधार तरीके से जुट गये हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का नाम तय करना शाह और मोदी के हाथ में नही है। संघ ने उत्तर प्रदेश को सीधे अपने नियंत्रण में ले रखा है। यानी उत्तर प्रदेश आरएसएस की व्यवस्था में केंद्र शासित प्रदेश है। वर्तमान विधानसभा के चुनाव जब हुए थे उस समय भी कहा गया था कि मोदी और शाह योगी की बजाय उत्तर प्रदेश की बागडोर अपने विश्वसनीय किसी खाटी राजनीतिज्ञ को सौंपने के पक्ष में हैं।

यह चर्चाएं गलत भी नही थीं। लेकिन संघ का निश्चय देखने के बाद उन्हें खामोश हो जाना पड़ा। संघ की एक मात्र वरीयता उत्तर प्रदेश के लिए योगी आदित्य नाथ थे सो हर आपत्ति दरकिनार कर उन्हें शपथ दिला दी गई। हालांकि योगी के लिए भी संघ ने फरमान जारी कर रखा था कि वे राष्ट्रीय नेतृत्व से बेहतर तालमेल मिलाकर काम करेगें। योगी भी इस मामले में आज्ञाकारिता दिखाने मेें पीछे नही रहे। शुरूआत में उनकी धाक कुछ अलग ही बनी थी। उन्हें मीडिया में मोदी से भी ज्यादा बेहतर नेतृत्व कर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था और भविष्यवाणी की जाने लगी थी कि संघ ने निकट भविष्य में मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में उनको सामने लाने के लिए ही उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया है। यह दूसरी बात है कि इन प्रशस्तियों से बौराने की बजाय योगी ने व्यवहारिक सच्चाई को बराबर ध्यान में रखा और वे सार्वजनिक रूप से यह प्रदशित करते रहे कि जो भी कार्य कर रहे हैं या करेगें वह मोदी और शाह के मार्गदर्शन के मुताबिक होगा। योगी के इस रवैये की वजह से अगर मोदी और शाह के मन में उनको लेकर कोई संशय उपजा तो वह भी स्थगित हो गया। अपने सौजन्य से उन्होंने समय बीतने के साथ-साथ मोदी और शाह का पूरा विश्वास प्राप्त कर लिया है।

रामजन्म भूमि मसले पर भी योगी का अपना अलग महत्व है। विनय कटियार एंड कंपनी और कुछ अन्य असंतुष्ट साधु संतो को हाल में जिस तरह तत्काल विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण शुरू कराने के लिए उकसाने में लगे थे। उससे स्थिति बेहद संवेदनशील हो गई थी। इसके बाद योगी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने साधु-संतों से धैर्य बनाये रखने का आग्रह किया और उसका प्रभाव भी हुआ। योगी एक बार फिर राममंदिर निर्माण के मुददे को नैपथ्य में पहुंचाकर बेहतर विकास और कानून व्यवस्था को जनचेतना के केंद्र में लाने में सफल हो गये हैं। लगातार जारी सभाओं में अपने ताबड़-तोड़ भाषणों से हवा का रुख पूरी तरह पलट डालने का एहसास दिलाने में उन्होंने कामयाबी हासिल की है। हालांकि उत्तर प्रदेश में अंडर करंट में सबसे बड़ा मुददा भ्रष्टाचार का बन गया है। इस पर नियंत्रण नही हो पा रहा है। जिसकी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ रही है। चुनावी बेला में उसका ग्राफ नीचे जा रहा है। अगर अभिसूचना एजेंसियों से जनमानस की सोच के बारे में सरकार द्वारा फीड बैक लिया जा रहा होगा तो उसे भी इसका अनुभव बखूबी हो चुका होगा। भाजपा के समर्थक और कार्यकर्ता तक भ्रष्टचार की इंतहा से ऊब चुके हैं।

अधिकारी और कर्मचारी तो बिना पैसे के काम न करने की कसम खाकर बैठे ही हैं, भाजपा के कार्यकर्ता अपने माननीयों के लिए भी क्या कहें जो अकाल के भूखों की तरह पैसे के लिए टूटे पड़ रहे हैं। माननीय और उनके पिटठू पैसे के लिए गंदे से गंदा काम कराने के लिए तैयार हैं। दूसरी ओर तकलीफ जदा कार्यकर्ता और आम आदमी के लिए उनके पास समय नही है। कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री लखनऊ के प्रतिष्ठित लोगों से उनके घर जाकर मिलने के अभियान पर निकले थे तांकि वे अपने सहयोगी मंत्रियों, सांसद और विधायकों को इसी रीतिनीति को अपनाने की प्रेरणा दे सकें। लेकिन लगता है कि उनकी व्यस्ततायें इतनी गहरी और गहन है कि मुख्यमंत्री की अघोषित नसीहत के अनुपालन के लिए बेचारे कुछ करने की सोच तक नही सके। माननीयों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच तक आज जितनी संवादहीनता है उतनी किसी सरकार के समय नही रही। माननीयों में अब डर भी नही रह गया कि उनकी करतूतों की  खबर ऊपर तक पहुंच भी जायेगी तो कोई आसमान फट जायेगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा को असली सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला माननीयों के खिलाफ लोगों में गहरी वितृष्णा के कारण करना पड़ रहा है। जिसे लेकर उसे सचेत हो जाना चाहिए।

भाजपा के सामने सचमुच इस वजह से परेशान करने वाले हालात हैं। प्रधानमंत्री की मुग्ध करने वाली भाषण कला के बावजूद इन हालातों में पार्टी की नैया पार लगने का भरोसा खुद भाजपा के लोग नही कर पा रहे। सच्चाई तो यह है कि यह स्थिति इसलिए है कि न तो पार्टी में कोई गवर्नेंस दिख रही है और न सरकार में। लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुंह तक खोलना बंद कर दिया है। न्याय का एक समय सीमा से ज्यादा विलंबित होना न्याय न मिलने के बराबर होता है। शिकायतों की जांच की कछुआ चाल कुछ एसी ही धारणा पैदा कर रही है। इसलिए मुख्यमंत्री को स्थिति संभालने के लिए नौकरशाही पर गुस्सा दिखाना पड़ रहा है। हाल में उन्होंने एक ही दिन में अपराध नियंत्रण में लापरवाही बरतने वाले दो जिला प्रमुख निलंबित कर दिये। मायावती ऐसे ही काम करती थीं। जिसस लोग खुश हो जाते थे। शायद इसीलिए योगी को उनके जैसे टोटके अजमाने की सूझ रही है। फरुखाबाद में उन्होंने अधिकारियों को लताड़ते हुए कहा कि अब बहुत हो गया आप लोगों की करतूत की खबर लेने के लिए वे अब कभी भी कहीं भी छापा मरेगें। लेकिन इस मामले में जरूरत कैजुअल रवैये की नही है, एक सिस्टम को बनाने की है। कई बार सुझाव दिये जाने के बावजूद सतर्कता, भ्रष्टचार नियंत्रण इकाई व आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन की कार्रवाइयों को समन्वित करके किसी स्थाई आपरेशन को चलाने की रूपरेखा मुख्यमंत्री नही बना पा रहे हैं। बहरहाल जो करना है मुख्यमंत्री उसकी शुरूआत अबिलंब करें वरना यह न हो जाये कि लोगों को कहना पड़े कि बड़ी देर कर दी आपने मेहरबां आते-आते।



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