पाक अवाम का चरमपंथियों को 'ठेंगा'
| -Tanveer Jafri - Jul 30 2018 2:35PM

                पाकिस्तान में गत् 25 जुलाई को हुए नेशनल असेंबली के चुनाव अपने-आप में बेहद महत्वपूर्ण रहे। इन चुनाव परिणामों ने जहां पाकिस्तानी अवाम के रुझान का संकेत दिया वहीं यह चुनाव भारत के लिए भी काफी महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के पनामा पेपर लीक्स मामले में जेल जाने के फौरन बाद हुए इस चुनाव में 272 सीटों की राष्ट्रीय असेंबली में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी तथा पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) जैसे पारंपरिक राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को सत्ता से काफी दूर रहना पड़ा वहीं प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी व पाक टीम के कप्तान रहे इमरान खान द्वारा गठित पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी पहली बार सबसे अधिक सीटें जीतकर उभरी। इस चुनाव में जहां नवाज़ शरीफ की पीएमएल को 64 व भुट्टो/ज़रदारी की पीपीपी को 43 सीटों पर ही सिमट कर रहना पड़ा वहीं इमरान खान की पीटीआई 114 सीटें जीतकर पहली बार पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली में सरकार बनाने का सबसे मज़बूूत दावा पेश करने वाली पार्टी बनी।
                पािकस्तान में होने वाला यह चुनाव इस बार इसलिए भी चर्चा में था क्योंकि जमाअत-उद-दावा जैसे चरमपंथी संगठन के मुखिया हा$िफज़ सईद ने भी पहली बार पाक की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप करने की उ मीदों के साथ चुनाव मैदान में अपनी त$कदीर आज़माई थी। हा$िफज़ सईद को इस बात की $गलत$फहमी थी कि चूंकि वह पूरे पाकिस्तान में सैकड़ों मदरसे,अस्पताल तथा यतीमखाने संचालित करता है तथा उसने प्राकृतिक विपदाओं के समय अपने संगठन के स्वयं सेवक समाज सेवा हेतु आगे कर पाकिस्तान की जनता के दिलों में जगह बनाई है। परंतु पाकिस्तान की अवाम निश्चित रूप से हा$िफज़ सईद के चेहरे पर चढ़े इस मुखौटे को पहचान गई और उसने हा$िफज़ सईद की पार्टी जिसका नाम उसने 'अल्लाह-हो- अकबर तहरीक' रखा था उसके झांसे में $कतई नहीं आई। यहां तक कि अपने राजनैतिक संगठन का नाम अल्लाह हो अकबर तहरीक रखने के पीछे आम मुसलमानों को आकर्षित करने जैसी जो छुपी मंशा थी उसमें भी उसे कोई कामयाबी नहीं मिल सकी। ज़ाहिर है इसकी वजह केवल यही है कि पाकिस्तान की गरीब अवाम भले ही उसके मदरसे,यतीमख़ाने व अस्पताल आदि से कुछ लाभ क्यों न उठाती हो परंतु वह हा$िफज़ सईद का इस समाज सेवा के पीछे छिपा चेहरा भी ब$खूबी जानती है। अन्यथा हा$िफज़ सईद को पाक अवाम कम से कम कुछ सीटों पर तो जीत ज़रूर दिलाती। परंतु यह पार्टी राष्ट्रीय असेंबली में खड़े किए गए अपने सभी 79 उ मीदवारों की पराजय देखने के लिए मजबूर रही। हद तो यह है कि हा$िफज़ सईद का पुत्र हा$िफज़ तल्हा सईद व एक ख़ालिद वलीद भी अपनी-अपनी सीटों पर चुनाव नहीं जीत सके।
                गौरतलब है कि इसके पूर्व भी हा$िफज़ सईद ने जमाअत-उद-दावा के राजनैतिक संगठन के रूप में पहले भी मुस्लिम लीग नामक राजनैतिक दल बनाने की घोषणा की थी। उसने मिली मुस्लिम लीग के नाम से पार्टी का पंजीकरण कराने हेतु पाकिस्तान चुनाव आयोग में आवेदन भी किया था। परंतु पाक चुनाव आयोग द्वारा मिली मुस्लिम लीग का पंजीकरण करने से इंकार कर दिया गया था। इसके पश्चात सईद ने अल्लाह हो अकबर तहरीक पार्टी का गठन किया और राष्ट्रीय असेंबली की 79 सीटों पर अपना भाग्य आज़माया। क्रिकेटर इमरान $खान द्वारा पाकिस्तान में चलाई गई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के समर्थन में जनता का खड़े होना इस बात को प्रदर्शित करता है कि पाकिस्तान अवाम भले ही समय-समय पर हा$िफज़ सईद जैसे आतंकी सरग़नाओं के नेतृत्व में धर्म के नाम पर चलने वाली भीड़ का हिस्सा क्यों न नज़र आती हो परंतु चुनाव नतीजे तो यही बताते हैं कि जनता ने हा$िफज़ सईद की रैली व जनसभाओं में एक तमाशबीन की हैसियत से खड़े होना तो ज़रूर गवारा किया परंतु जब देश पर शासन करने का समय आया तो पाक अवाम ने उसे न केवल ठेंगा दिखा दिया बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि धर्म और राजनीति का घालमेल देश पर राज करने के लिए कतई मुनासिब नहीं है। हालंाकि इसके पहले मौलाना $फज़लुर रहमान जैसे और भी कई धार्मिक नेता राष्ट्रीय असेंबली के सदस्य रह चुके हैं। परंतु इसके बावजूद हा$िफज़सईद की पार्टी के किसी भी उ मीदवार यहां तक कि उसके बेटे व दामाद को भी जनता ने विजयश्री दिलाने योग्य नहीं समझा। $गौरतलब है कि हा$िफज़ सईद पाकिस्तान में भारत के $िखला$फ ज़हर उगलने वाला व्यक्ति है और यही वह श$ स हो जो समय-समय पर सीमा पार से भारत में होने वाली घुसपैठ को प्रायोजित करता है । यह मुंबई में हुए 26/11 हमले का मु य आरोपी भी है। इस समय इसका नाम दुनिया के मोस्ट वांटेड अपराधियों की सूची में भी शामिल है।
                हा$िफज़ सईद जैसे आतंकी सरग़नाओं को पाकिस्तान में राजनैतिक मज़बूती न हासिल होने से भारत ने भी चैन की सांस ली है। यह वह श$ स है जो पाकिस्तान में सीमा पर बैठकर भारतीय सेना को चुनौती देता रहता है तथा इसी के संरक्षण में पाकिस्तान में सीमावर्ती इला$कों में अनेक आतंकी प्रशिक्षण शिविर भी चलाए जा रहे हैं। यही श$ स अशिक्षित $गरीब मुसलमानों को जेहाद के नमा पर उकसाता है। और इसी का संगठन पाकिस्तान में अल्पसं यकों पर अत्याचार करने वाले दूसरे संगठनों का भी संरक्षक है। हा$िफज़ सईद को सऊदी अरब के शाही $खानदान से आर्थिक सहायता प्राप्त होने के आरोप लगते रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि वह सऊदी अरब के शाही परिवार की वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का तंत्र संचालित कर रहा है। अमेरिका व उसके कई सहयोगी देशों को तो इस बात का भी खतरा था कि कहीं ऐसा न हो कि अफगानिस्तान में छिड़ी आतंकवाद विरोधी जंग के दौरान पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी तथा अ$फ$गानिस्तान से भाग कर पाकिस्तान में पनाह लेने वाले तालिबान मिलकर पाक स्थित परमाणु शस्त्र ठिकानों पर अपना नियंत्रण न हासिल कर लें। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से हा$िफज़ सईद के संगठन की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती।परंतु पाकिस्तान की अवाम ने हा$िफज़ सईद,उसके परिवार व उसके पूरे राजनैतिक संगठन को नकार कर यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान की जनता अब कट्टरपंथी ता$कतों से अपना पीछा छुड़ाना चाहती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की अवाम इमरान खान को जिता कर यह संदेश देने की इच्छुक है कि वह अब पारंपरिक भ्रष्टाचार, कश्मीर समस्या का बहाना, हिंसा, जातिवाद, सांप्रदायिकता, गरीबी व बेरोज़गारी जैसे मुद्दों से त्रस्त हो चुकी है और अब नए राजनैतिक चेहरे के साथ देश में नया प्रयोग देखना चाहती है।
                हा$िफज़ सईद वह श स है जो शरिया कानून का पैरोकार है, जो ईश निंदा कानून का पक्षधर है जो जेहाद के नाम पर बेगुनाह, मासूम युवाओं को लालच देकर उन्हें आत्मघाती बनने के लिए उकसाता है तथा अपने कट्टरपंथी सिद्धांतों को पाकिस्तान में लागू करना चाहता है। परंतु प्रशंसा के योग्य है पाकिस्तान की वह अवाम जिसने समय-समय पर चुनाव के मौके पर ऐसी कट्टरपंथी, आतंकवाद समर्थक व चरमपंथी सोच रखने वाले नेताओं के मुंह पर ऐसा ज़ोरदार तमाचा मारा है जिसने उन्हें आईना देखने के लिए तो मजबूर कर ही दिया साथ-साथ ऐसे फैसलों से पाकिस्तान के लोगों की सोच तथा उनके रुझान का भी आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।



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