प्रिपरेशन
| Dr. Avinash Kumar Jha - Jul 30 2018 2:38PM

बिहारी कक्का आज पूरे फार्म मे थे। जैसे लाठी सोंटा लेकर सरकारे पर पिल पड़े हों। "ऐसे ही हाल रहा तो कोई सरकारी नौकरी का नाम नही लेगा। अरे! काहे को इसके पीछे बिहारी, बंगाली और पुरबिया लोग पागल रहते हैं? जाब सिक्योरिटी? काहे को सिक्योरिटी, पचास साल के बाद खोज खोज कर स्क्रीनिंग कर रहे हैं और जबरदस्ती रिटायरमेंट! अब तो ऊ कांसेप्ट ही तेल लेने चला गया कि केतनो बिगाड़े तो ज्यादा से ज्यादा क्या करोगे.. सस्पेंड? ऊ  से क्या होता है? घूम फिरकर आयेंगे और बहाल हो जायेंगे, लेकिन  ले लाठी! ई तो टर्मिनेट होने लगा! जबर्दस्ती रिटायरमेंट देने के लिए स्क्रीनिंग कर रहे हैं!"

"काहे एतना फायर हो रहे हैं? सरकार तो चाह रही है कि ई जो सरकारी लालफीताशाही है ऊ समाप्त हो और सबमे एक्टिवनेस आ जाय! आखिरकार निजी कंपनियों से लोहा जो लेना है। कैसे वहां टारगेट ओरियंटेड काम लिया है, उसी तरह यहां हो। ऐसे मे अक्षम लोगो की स्क्रीनिंग जरूरी है न!" "तुम हमेशा बुड़बक ही रहोगे! सरकार नौकरियों मे लोगों को आने से हतोत्साहित कर रही है। अब देखो न! इतना ही नही, अब तो इहां भी काम करना पड़ता है! सुबह नौ बजे बायोमेट्रिक हाजिर है, अंगूठा ठोको, वरना अबसेंट! आधा दिन का वेतन गया! ई- आफिस तो वज्रपात है भाई! अब सब आनलाइन रहेगा तो फाइल सिस्टम ही चौपट हो गया न! फाइल का मतलब समझते हैं न! फाइल कैसे चलती थी, दौड़ती थी, रुकती थी, गुम हो जाती थी ,फिर मिल जाती थी, फाईलों पर वजन रखा जाता था। अब तो सब गुड़ गोबर!"

कक्का को आज समझाना मुश्किल था। शायद सबेरे सबेरे भांग का गोला गलोठ लिए थे। जब भोले बाबा की बूटी चढ जाती तो वो किसी को नही छोड़ते थे चाहे ऊ सरकार ही क्यों न हो! आज वैसे भी सावन का पहला दिन है और बाबाधाम जाने की तैयारी कर रहे थे। "कक्का! यही जो सरकारी भ्रष्टाचार है न! उसी को रोकने के लिए तो ये सब हो रहा है। सरकार जनता के प्रति जिम्मेदार है और उसे समय से सारा काम करवाना चाहिए!" मैने भी बहस की डोर नही छोड़ी थी।

"अब जब सब टाइमली काम ही करना है तो प्राइवेट नौकरी ही बेहतर है न! कम से कम सैलरी तो बढिया मिलता है न! ऊ तो इहां कभी निकालने की जरुरत नही पड़ती थी ,वरना केतना दिन चलती। वेतन बढाने के नाम पर सबकी नानी मर जाती है और काम करायेंगे प्राइवेट की तरह! उस दिन वो पी डब्ल्यू डी के बड़ा बाबू  कह रहे थे" बहुत काम बढ गया है, ई कंप्यूटर और मोबाइल आने से सूचनाएं बहुत मांगी जा रही है और तत्काल मांगी ज रही है।

पहले कोई लेटर आता था डाक से या पत्रवाहक द्वारा तब आराम से बनाया जाता था, पर अब तो मेल किया और पीछे से फोन आ गया कि दो घंटे मे भेजिए  जैसे इसी के इंतजार मे हम बैठे हों। नयी भर्ती हो नही रही है, पुराने रिटायर हो रहे हैं, काम का बोझ दुगना तिगुना बढ गया है. प्रेशर इतना है कि बिमारियाँ बढ रही है।" लेकिन वेतन नही बढेगा, कहेंगे सरकार आम जनता पर इतना बड़ा बोझ नही डाल सकती है, सही है। " लेकिन कक्का सरकारी नौकरी "जाब" नही सेवा है। जब ये कहीं "व्यवसाय" का कालम भरते हैं तो अंग्रेजी मे " सर्विस" लिखते हैं। " मैने कहा।

"बिहारी कक्का बरस पड़े" फिर काहे का वेतन और सुविधा।? सेवाभाव रखिए और यही खाईये एवं बच्चों को खिलाईये। बेचारे कर्मचारी युनियन वाले जब अधिकारियों से वेतन बढाने की बात करते है तो जबाव मिलता है" हमको नही पता है कि ये तुमलोगों का लैस - लिफाफा कैसे चल रहा है? ये जो गाड़ियों मे सफर करते हो उसका डीजल कहां से आता है!" एवमस्तु! तब तो भ्रष्टाचार को वैधानिक बना दो भाई! सभी उसी से अपना खर्चा चलाये! आफिस मे स्टेशनरी नही, यहां जाओ वहां जाओ लेकिन बजट नही। फिर भी सारा काम हो रहा है, इसका क्या मतलब? या तो सारा रिपोर्ट आफिस मे बैठकर बना दिया जा रहा है या फील्ड मे जाते होंगे तो इतने राजा हरिश्चंद्र के औलाद नही है कि अपने वेतन से तेल का पैसा भरेंगे। स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं से जुगाड़ करेगा।"

"आप चाहते क्या है? क्या सरकार करे? तनाव सब जगह है। काम का बोझ और उतरदायित्व सब जगह बढ रहा है। जनता को जबाव भी देना होता है। सरकार को कोष भी देखना होता है!" मै अब हथियार डालने के मूड मे था। कक्का समझ गये। बोले" परेशान मत हो बबुआ!  जैसा चल रहा है ,चलता रहेगा ।ई तो भंग का रंग था, जो बरस रहा था,बाकी जो है सो हईये है। जा घर से एक लोटा पानी लेते आब! हम यह सोचते हुए उठे कि कक्का भी कुछ गलत तो नहिए कह रहे हैं! तो सरकारी नौकरी के प्रिपरेशन करते रहे कि छोड़ दें? पानी लेके आते हैं तो पूछते हैं।



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