जनसंघ की जडों को जमाने वाले कैलास को संघ ने भुलाया
| -Dr. Brijesh Sati - Jul 31 2018 4:37PM

मिशनरी पत्रकारिता के रोल माडल थे, पत्रकार कैलास जुगरान

कैलास जुगरान, यह नाम जेहन में आते ही मस्तिष्क में एक ऐसा बिंब उभरता है, जो जिंदगी की आखिरी संास तक समाज के लिये जूझता रहा। सादगी,सरल व साधारण से दिखने वाले इस की सख्श के जीवन चक्र को हम दो कालखंडों में समझ सकते हैं। पूवार्द्ध में वो जनसंघ की जडों को जमाने व जनआंदोलनों के लिये समर्पित रहे, तो उत्तरार्द्ध में उन्होंने मिशनरी पत्रकारिता की नजीर पेश की। अपने जीवन के अंतिम समय तक सिंद्धांतों से बंधे रहे। गढ़वाल विश्वविद्यालय  आंदोलन, हिन्दी आंदोलन व उत्तराखंड आंदोलन में जेल यात्रा भी की। सामाजिक मूल्यों के पोशक, कैलास जुगरान के पास चल अचल संपति के नाम पर अगर कुछ था, तो एक पाक्षिक समाचार पत्र मातृ पद।

वर्तमान दौर पेशेवर पत्रकारिता का है। मिशनरी पत्रकारिता गौण हो चुकी है। सभी प्रमुख मीडिया संस्थान औद्योगिक घरानों के नियंत्रण में हैं। आजादी के बाद से ही जनसंचार माध्यमों पर उद्योगपतियों का कब्जा था, लेकिन उस समय मिशनरी पत्रकारिता जिंदा थी। पत्रकार पत्रकारिता के मूल्यों से बंधे थे। लोक कल्याण उनकी पत्रकारिता में निहित था। इसलिये सीमित संसाधन व आर्थिक कमजोरी भी पत्रकारों के राह में रोढा नहीं बनी। इसी पृष्ठभूमि से निकलकर आये थे, कैलास जुगरान। राष्टीªय दैनिक हिन्दुस्तान से पत्रकारिता की शुरूआत करने के बाद उन्होंने आवाम की आवाज को धार देने के लिये स्वंय के संसाधन से मातृपद का प्रकाशन शुरू किया। जो मृत्यु पर्यंत जन पक्षीय पत्रकारिता को समर्पित रहा।  पत्रकारिता व जनता से जुडे मसलों को लेकर उनका जुनुन देखते ही बनता था। पत्रकारिता में उन्होंने सबकुछ लुटा दिया। आलम यह रहा कि अखबार प्रकाशित करने के लिये जब उनके पास धन की कमी रहने लगी, तो उन्होंने राष्टीªय राजमार्ग पर स्थित एक पीसीओ बूथ पर काम करते हुये आर्थिक संसाधन जुटाये। हालांकि उनके कई मित्रों व शुभ चिंतकों ने उन्हें अखबार के लिये आर्थिक सहयोग देने को कहा, लेकिन उन्होंने स्वंय के वित से ही मातृ पद को जिंदा रखा।

मातृपद का प्रकाशन सन् 1972 से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में हुआ। पहाड में समाचार पत्रों का प्रकाशन पहाड जैसी ही समस्या है। सीमित पाठक वर्ग होने के साथ ही इस पर लगने वाली लगात को पूरा करना चुनौतिपूर्ण है। हालांकि वर्तमान में सरकारी व प्राईबेट विज्ञापनों से कुछ हद तक आर्थिक तंगी को दूर किया जा सकता है। परन्तु उस समय प्रकाशकों व संपादकों के पास ऐसा विकल्प नहीं था। विपरीत हालातों में भी पत्रकार कैलास जुगरान ने मातृपद को आवाम की आवाज बनाये रखा। कारिन्दों और नुमाइंदों की परवाह किये बिना अपनी धारदार लेखनी से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मर्यादा बनाये रखी।

अखबारी खर्चे बढने व आय के सिकुढते साधनों के बीच कैलासजी को एक कठोर निर्णय लेना पडा। मातृपद को साप्ताहिक से पाक्षिक करना पडा, लेकिन समाचार पत्र का प्रकाशन व समाचारों की धार कम नहीं हुई। उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में भी स्थितियों में बदलाव नहीं आया। विज्ञापनों की सेटिंग व सरकार के पक्ष में लिखने वाले अखबार खूब फूले फले। जनपक्षीय पत्र व पत्रकार हासिये में चले गये। जनसरोकारों के लिये लडते वाला पत्रकार कैलास जुगरान अचानक सिर में चोट लगने से गंभीर रूप से घायल हो गया। इस दौरान ईलाज पर लाखों का खर्च आया। उनके छोटे भाई ने अपनी बिटिया की शादी के लिये जो चार लाख की फिक्स डिपोजिट कराई थी, उसे टोडकर उपचार पर लगाना पडा। मौत के सामने कैलासजी हार गये। कैलासजी के पास जमा पूंजी के नाम पर कुछ नहीं था, शिवाय एक पाक्षिक समाचार पत्र मातृपद के। 

जनसंघ की जडे जमाने में निभाई अहम भूमिका

पत्रकारिता से पहले कैलास जुगरान जनसंघ से लम्बे समय तक जुडे रहे। 60 के उत्तरार्द्ध में जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ता बन गये। उस दौर में कांग्रेस के बाद विपक्षी दल के रूप में जनसंघ ही था, वो भी केवल उपस्थिति दर्ज करने लायक। जनसंघ के कार्यकर्ताओं को अंगुली में गिना जा सकता था। एक समर्पित कार्यकर्ता के तौर पर उन्होंने पार्टी को मजबूती देने में कोई कसर नहीं छोडी। केवल पहाड में ही नहीं बल्कि देश के अन्य प्रातों में भी पार्टी कार्यक्रमों व चुनाव में सक्रिय रहे।

उन दिनों पूरे देशभर में काग्रेस के अलावा अन्य पार्टियां नाम मात्र की थी। दलों के कार्यकर्ता भी सीमित संख्या में थे, लेकिन कैलास व उनके गिने चुने जनसंघी सहयोगी पूरी शिद्दत के साथ पार्टी संगठन के लिये समर्पित थे। उनकी पार्टी के प्रति निष्ठा को समझने के लिये 70 के दशक के उस दौर में जाना होगा, जब केन्द्र के निर्णय के बाद उत्तर प्रदेश में हिमालय पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह पूरे पहाड वसियों के लिये गर्व की बात थी। इसके बाद कांग्रेस से जुडने के लिये लोगों की होड लग गई। कैलास जुगरान को भी कांग्रेस से जुडने के लिये दबाव पडा। उल्लेखनीय है कि कैलासजी व बहुगुणा जी में पारिवारिक संबध भी थे। इसलिये भी चारों ओर से वो दबाव में थे, लेकिन सिद्धांतों से बंधे कैलास की निष्ठा जनसंघ से बनी रही। आज नैतिकता व सिद्धांत हासिये पर है। पदलोलुपता व सत्ता पाने की होड मची है। ऐसे में कैलास जुगरान को याद करना प्रासंगिक है।

जब पडित दीन दयाल उपाध्याय ने दिया अपना भोजन      

वाक्या सन 1968 का है। जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जनसंघ का राष्टीªय अध्यक्ष बनाया गया। उनके सम्मान में लखनऊ में राष्टीªय कार्यकर्ता सम्मलेन आयोजित किया गया। इसमें शिरकत करने के लिये देशभर के कार्यकता लखनऊ में जुटे। गढवाल मंडल से भी दो कार्यकर्ता इसमें शामिल हुये। इसमें पौडी गढवाल से कैलास जुगरान व क्वीली, टिहरी गढवाल से देवेन्द्र भटट।
पूरे दिनभर कार्यकर्ता सम्मेलन में व्यस्थ रहे। शाम को जनसभा के बाद देशभर से आये कार्यकर्ता अपने गंतव्यों की ओर जाने लगे। तो कैलासजी व देवेन्द्रजी चार बाग स्टेशन आ गये। ट्रैन आने में अभी कुछ समय बाकी था। दोनों स्टेशन में बैंच पर बैठ गये। तभी दीनदयाल उपाध्याय सैंकडों पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंच गये। कार्यकर्ता बाहर ही खडे रहे और वो अंदर कंपार्टमेंट में चले गये। तभी एक आवाज आई। कैलास, कैलास। चारों ओर देखने के बाद भी आवाज देने वाले का चेहरा दिखाई नहीं दिया। विस्मय की स्थिति में दोनों एक दूसरे को देखने लगे। फिर आवाज आई। इधर आओ। सामने देखा, तो खिडकी पर दीनदयाल जी खडे थे। उन्हें अपनी ओर आने का इशारा कर रहे थे। दोनों को उन्होंने अंदर आने को कहा। अपनी जेब में हाथ डालकर दस रूपया, देवेन्द्र भटट की ओर बढाते हुये कहा, जाओ, बच्चों के लिये इसकी रेबडी ले आओ। यहां से जब तुम घर लाओगे तो बच्चे पूछेगें, हमारे लिये आप क्या लेके आये। इसी बीच स्थानीय कार्यकर्ता दीनदयाल जी के लिये भोजन लेकर पहुंच गये।

दीनदयालजी ने बैग में रखी पुरानी धोती को निकाला और उसको फाडकर उनके लिये लाया गया भोजन कैलासजी के हाथों में दे दिया। वे बोले, मेरे लिये अगले स्टेशन में कार्यकर्ता भोजन ले आयेंगे, तुम्हें कौन पूछेगा। रास्ते में इसे खा लेना। दोनों भावुक होकर रोने लगे। निश्संदेह ऐसा दीनदयालजी जैसा व्यक्ति ही कर सकता था। पार्टी का सर्वेसर्वा, अपने छोटे से कार्यकर्ताओं के प्रति इतना संवेदनशील हो सकता है। वर्तमान में किसी भी राजनेता से इस तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती है। दीनदयालजी के नाम का राग खूब अलापा जा रहा है। उनके नाम पर केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा कई योजनायें संचालित की जा रही हैं। कई सडक व भवन दीनदयाल जी के नाम से पहचाने जाते हैं। काश! उनके नाम पर अपनी सियासत चमकाने वाले दीनदयाल जी के आर्दश व स्थापित मूल्यों को अपने जीवन में उतार पाते। 

जब अटल जी ने कहा, कैलास जी कहां छुपे हो आप

यह वाक्या जनसंघ के समय का है। लोकसभा चुनाव का समय था। पार्टी के नेता राष्टीªय अटल बिहारी वाजपेयी गढवाल भ्रमण थे। गढवाल के केन्द्र स्थान श्रीनगर में अटलजी की एक चुनावी सभा का आयोजन किया जाना था। आज भाजपा देश की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है,लेकिन उस समय पार्टी को कार्यकर्ता ढूढे नहीं मिलते थे। पार्टी की संगठनात्मक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि इस सभा के लिये अटलजी के साथ मंच पर बैठने के लिये कोई कद काठी का व्यक्ति नही मिल रहा था। सभा संयोजक कैलास जुगरानजी के सामने बडी समस्या यह थी कि यदि वो अटलजी के साथ मंच साझा करते तो फिर सभा संचालन का जिम्मा कौन संभालता।

अटलजी को रात्रि विश्राम के लिये पीडब्लयूडी के निरीक्षण भवन में ठहराया गया। रात्रि भोजन के बाद अटलजी को गाय के दूध पीने की आदत थी। उन्होंने कैलासजी से कहा कि मेरे लिये दूध की व्यवस्था करो। मैं,बिना दूध पीये नहीं सोता हूं। पहाड में रात दस बजे गाय का दूध, आसमान से तारा तोडने के समान था। चूंकि अटलजी का आदेश था। दूध की खोज में तीन चार कार्यकर्ता श्रीनगर की गली मोहल्ले में घूमने व घर घर पूछने लगे। बाद में चमोलीजी के घर में गाय का दूध उपलब्ध हो पाया। उनके घर में एक छोटा बच्चा था, उसके लिये ही दूध रखा गया था। उनसे निवेदन करने के बाद एक गिलास दूध मिल गया। 

सन् 1989 में लोकसभा चुनाव से पूर्व अटलजी, कल्याण सिंह व कलराज मिश्र के साथ कुमाऊं का दौरा करने के बाद श्रीनगर में जनसभा को संबोधित कर रहे थे, तो उन्होंने अपने भाषण के बीच में कहा कैलास जी आप कहां छुपे हो। दरअसल कैलासजी भीड के बीच में बैठकर भाषण सुन रहे थे। सन् 1989 में नानाजी देशमुख एक कार्यक्रम के सिलसिले में श्रीनगर आये थे। जीएनटीआई मैदान में उनकी कैलासजी से मुलाकात हुयी। नानाजी देशमुख ने कहा, कैलासजी आपने हमको क्यों छोड दिया। उन्होंने विनम्रता से कहा, मैंने कहां छोडा। मैं,तो आपसे मिलने आया हूं।

गढवाल विश्वविद्यालय आंदोलन में रहे सक्रिय

गढवाल विश्वविद्यालय नाम से आज उच्च शिक्षा का केन्द्र खडा है। 45 सालों के इस सफर में इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल हो गया है। यह सब संभव हो पाया, लम्बे संघर्ष व आंदोलन के बाद। इसके लिये यहां के युवाओं ने कई दिनो तक सडकों पर संघर्ष किया। आंदालनकारियों को जेल भी जाना पडा। देश की आजादी से पहले ही पहाड में उच्च शिक्षा केन्द्रों की कमी थी। स्वतंत्रता के बाद भी हालात में सुधार नहीं हुआ। सरकारों का ध्यान इस ओर नहीं गया। जो साधन संपन्न लोग थे, वो बडे शहरों में जाकर उच्च शिक्षित हो जाते थे। आर्थिक रूप से कमजोर लोग अपने पाल्यों को नहीं पढा पाते थे। इसको लेकर कैलास जुगरानजी के मन में पीडा थी।

जुलाई 1971 में विश्वविद्यालय विधेयक सदन में पारित होना था। इसी बीच शिवानंद नौटियालजी का टेलीग्राम हुकुम सिंहजी को आया। इसमें बताया गया कि पर्वतीय विश्वविद्यालय विधेयक 19 जुलाई को संदन में पेश होना है, इसमें गढवाल के हितों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई। 7 जुलाई की रात आनन फानन में एक आवश्यक बैठक बुलाई गई। 8 जुलाई से क्रमिक धरना प्रदर्शन का निर्णय लिया गया। पहले दिन कैलास जुगरान व बैजनाथ तोमर अनशन में बैठे। सन् 1971 में इस आंदोलन से स्वामी मनमंथन को जोडने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उल्लेखनीय है कि स्वामी मनमंथन उन दिनों बलि प्रथा के विरोध में आंदोलन चला रहे थे। कैलासजी ने उन्हें समझाया कि यह शिक्षित न होने का परिणाम है। अगर यहां उच्च शिक्षा केन्द्र खुल जाय तो यह कुप्रथा स्वयं समाप्त हो जायेगी। स्वामी मान गये और आंदोलन का हिस्सा बन गये।

विश्वविद्यालय की मांग को लेकर, 56 लोगों के साथ जेल यात्रा की। हेमतवी नदंन बहुगुणा से इस शर्त पर जुडे कि पहले पहाड में विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाय। लम्बे जन आंदोलन के बाद सन् 1973 में गढवाल विश्वविद्यालय की स्थापना हुयी। प्रो जेपी भटट ने बताया कि वो उस समय बीएससी के छात्र थे। कैलासजी पूरे जुनुन के साथ अपनी एक सूत्रीय मांग के लिये अडे रहे। कैलासजी ने उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई। अलग पहाडी राज्य के हमेशा से ही हिमायती रहे। सन् 1994 में पूरा पहाड अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलनरत था, तो कैलास भी इसका हिस्सा बने। जब गढवाल मंडल के कुछ इलाकों में कफर््यू लगाया गया तो, इसके बिरोध में श्रीनगर में सबसे पहले कैलास जुगरान व सुंदर लाल बहुगुणा आगे आये। धारा 144 का उल्लघंन करने के आरोप में दोनों को हिरासत में लिया गया। जन अंादोलनों के प्रतीक को इस तरह भुलाया जाना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस लेख के माध्यम से कैलासजी के व्यक्तित्व व कृतित्व को समाज के सामने लाने का प्रयास है। जब अपने ने ही भुला दिया हो तो फिर दूसरों से क्या उम्मीद कर सकते हैं। प्रो. जेपी भटट, के.एन. मैठाणी, ओम अग्रवालजी, व देवेन्द्र गौड ने जानकारियंा उपलब्ध कराई।



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