पत्रकारिता धर्म या लोकल नख़रा
| Dr. Anil Upadhyay 'Mela' - Aug 9 2018 11:59AM

मानव जीवन के विकास क्रम के साथ आपराधिक मानसिकता का विकास होता गया. सूखी रोटी को मालपुए में बदलने की चाहत ने नैतिकता का गला घोट दिया. लाभ मिल जाए- की चाहत में अब तो दुश्मन भी गले लग जाते हैं. "मिलकर बॉट खा लेंगे" की दोगली चाह के चलते चुनाव के दौरान पानी पी-पीकर एक दूसरे को गा़ली देने वाले लोग.... एक प्रतिष्ठित सामाजिक मंच पर अपना हित साधने के लिए दोस्त की तरह बैठ लेते हैं.

ऐसे बिगड़े माहौल में पुण्य प्रसून जोशी जैसे लोग पत्रकारिता जगत के चमकीले सितारे के रूप में दिखने लगते हैं. भले ही पूरी की पूरी सरकार साजिश और विरोध पर उतर आए.* ABP जैसे चैनल का कुशल हाथों में पड़ना ही कहीं ना कहीं इस नायाब हीरे की लगन मेहनत और ईमानदारी का नतीजा है. गोली खाकर भी गौरी लंकेश जैसी दिलेर पत्रकार आज पत्रकारिता जगत में शहीदाना दर्ज़ा पा लीं. कहीं ना कहीं गर्व की बात है. शर्म तो तब आती है जब पत्रकारिता की चादर ओढ़े अपराधी तबीयत का कलमकार किसी विभाग विशेष की दुखती रग थामकर संबंधित अधिकारी का ब्लैकमेलर बन जाता है.

अपने गाड़ी और बंगले का प्रबंध इस तरह की काली कमाई के जरिए से प्राप्त करने की कोशिश करता है. जिसके चलते वह एक हमलावर की तरह अपनी नुकीली कलम या कैमरा लगाकर किसी शक्ति विशेष के व्यक्ति को डरा धमका कर अपने आप को पद और गरिमा के लायक बनवा लेता है. इसके बावजूद भी भले ही वह सरकारी नौकर हो जाए...... और पत्रकारिता का दामन भी थाम रखे. परंतु वह जुआड़बाज़ तथाकथित पत्रकार किसी एक भी घाट पर वफा़दार होने का नमूना नहीं पेश कर पाता. ना तो पत्रकारिता के साथ और ना ही अपने दूसरे सरकारी व्यवसाय के साथ. छोटी सी छोटी लालच के चलते पेड खबरों का चलन किसी से छुपा नहीं है. मीडिया की शक्ति और चाटुकारिता का ही रंग है कि बड़े से बड़े ठेके और संविदा की नौकरियां अपने चाहने वालों को ए पहलवान ब्रांड कलमकार आसानी से करा लेते हैं.

आज़ फर्जी संवाददाताओं के प्रबल भीड़ के चलते पत्रकारिता जगत अपराधियों और दलालों से अगर कराह ना रहा होता तो सोशल मीडिया का जन्म ही ना होता. अपने को बड़ा साबित करने की होड़ में नीचता की सारी हदें पार कर जाना जनता और सरकार की नजरों से छुपा नहीं है. ......! पत्रकार -पत्रकार- पत्रकार शब्द गाड़ियों पर लिखवाना और पत्रकारिता का नखरा दिखाना एक आम बात हो गई है.लेकिन स्वस्थ पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करने में उम्र कम पड़ जाएगी. वह दिन दूर नहीं यदि मीडिया अपना निजी चरित्र नहीं सुधरती तो इसका उदाहरण किसी भी गंदी शै से दे दिया जाना बड़ी बात नहीं होगी.



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