गणपति बप्पा मोरया दस दिन ही क्यों?
| Rainbow News - Sep 15 2018 12:15PM

गणेश चतुर्थी की धूम पूरे देश में है। महाराष्ट्र सहित पूरे मुंबई में गणपति घर-घर में छोटे - बड़े तरह-तरह के गणपति विराज रहे हैं। वैसे इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से ही हुई। विध्नहर्ता के रूप में स्थापित गणपति बप्पा से लोग अपने दुख, क्लेश और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि अंग्रेजों के सत्तासीन होने के बाद हिंदुओं पर पाबंदियां लगने लगी और कुछ शासकों द्वारा गलत निर्णय लेने के कारण हिंदूओं में अपने ही धर्म के प्रति कड़वाहट पैदा होने लगी। तब उस समय के महान क्रांतिकारी और जननेता लोकमान्य तिलक ने विचार किया श्री गणेश ऐसे देवता हैं जो समाज के सभी जगहों पर पूजनीय हैं और लोगों को संगठित करने के उद्देश्य से 1893 में उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की।

आखिर 10 दिन ही क्यों गणपति रखे जाते हैं यह भी एक सवाल है और इसकी जानकारी ज्यादा लोगों को नहीं है। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की है। लेकिन लिखना उनके वश का नहीं था। अतः उन्होंने श्री गणेश जी की आराधना की और गणपति जी से महाभारत लिखने की प्रार्थना की।

गणपती जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन का कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी, लेकिन उन्हें पानी पीना भी वर्जित था और गणपति जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की। मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पर्थिव गणेश भी पड़ा। महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला। अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ।

वेदव्यास ने देखा कि,गणपति का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है,तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया। इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए। तभी से गणपती बैठाने की प्रथा चल पड़ी। इन दस दिनों में इसीलिए गणेश जी को उनकी पसंद के विभिन्न भोजन अर्पित किए जाते हैं।

एक जानकारी और आपके लिए और रोचक होगी, वह यह कि ‘मोरिया’ शब्द का इतिहास क्या है? मोरिया शब्द का रहस्य जुड़ा है गणपति बप्पा के एक भक्त से। कहते हैं कि चौदहवीं सदी में पुणे के समीप चिंचवड़ में मोरिया गोसावी नाम से सुविख्यात गणेश भक्त रहते थे। चिंचवड़ में इन्होंने गणेश भगवान की कठोर साधना की और चिंचवड आने के बाद भी मोरया गोसावी हर साल गणेश चतुर्थी पर मोरगांव स्थित मंदिर मयूरेश्वर के दर्शन के लिए जाते थे।

कथाओं के मुताबिक मोरया गोसावी गणेशजी की प्रेरणा से पास के ही नदी से एक मूर्ति ले आए और चिंचवड के आश्रम में स्थापित किया और बाद में उन्होंने यहीं पर जीवित समाधि ली। तभी से यहां का मंदिर देशभर में विख्यात हुआ और गणेश भक्तों ने गणपति के नाम के साथ मोरिया नाम का जयघोष भी शुरू कर दिया।



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