मोबाइल/ स्मार्ट फोन ने घरों में कैद किया बचपन
| -Dushyant Kumar - Sep 26 2018 4:59PM

"एक हाथी एक राजा एक रानी के बगैर, नींद बच्चों को नहीं आती कहानी के बगैर।" मखसूद वस्तवी की यह लाईनें जहां बचपन में पहले सच हुआ करती थी अब महज किताबों में सिमट कर रह गई हैं। पहले जहां गांव की गलियां बच्चों के शोरगुल से गूंज उठी थी अब वहां वह आज सन्नाटा ही देखने को मिलता है आधुनिकता के इस युग में अब बचपन मोबाइल फोन में बीत रहा है यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में गांव गलियां खेलकूद की कहानी हम अपने पूर्वजों से सुनेंगे। मौजूदा समय में पढ़ाई की व्यस्तता और फिर लैपटाप व मोबाइल के चलन से बच्चों की मासूमियत खत्म होती जा रही है।

बच्चे जिस तरह पहले स्कूल से घर आनें के बाद और छुट्टियों में परंपरागत खेलो से जुड़े रहते थे अब वह देखने को नहीं मिलता क्योंकि अब वक्त बदल गया है। अब 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे परंपरागत खेलों के बजाय टीवी, इंटरनेट,ऑनलाइन या ऑफलाइन गेम्स पर समय बिताते हैं। पहले गली-मोहल्ले में खेल के मैदान पर गजब का नजारा हुआ करता था जहां सुबह-शाम बच्चों को खेलते हुए देखा जा सकता था। अब खेल मैदान भी खत्म हो गए हैं और बचपन एक कमरे तक सिमट कर रह गया है। उनके खेल व मनोरंजन के तरीके बदल गए हैं। बच्चे पहले लुका-छिपी, गिल्ली- डंडा, रस्सी कूद, क्रिकेट, फुटबॉल, पतंग उड़ानें जैसे पारंपरिक खेलों से अपना मन बहलाते थे, वहीं अब बच्चे इन खेलों से दूर हो गए हैं।

बच्चे मोबाइल गेम से लेकर इंडोर गेम में ही अपना अधिकांश समय बिता रहे है, इससे उनका मानसिक विकास जरूर हो रहा है,लेकिन शारीरिक विकास ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। शारीरिक व्यायाम, एकाग्रता, वाले इन सब खेलों की जगह अब पूरी तरह से मोबाइल गेम ने ले ली है।छोटे से बच्चे के हाथ में मोबाइल आ गया है,जिनसे बच्चे हर जगह हर समय उलझे देखे जा सकते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक खेलों की ओर बच्चों का झुकाव कम हो गया है।आजकल बच्चों ने सामूहिक खेलों के बजाय अकेले खेले जाने वाले मोबाइल गेम आदि को अपनी पसंद बना लिया है। इससे सामूहिकता में रहने की परंपरा खत्म हो रही है। बच्चों को अकेले ही रहना ज्यादा पसंद आने लगा है। एेसे बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास भी उतना नहीं हो पाता है जितना बाहर खेलने वाले बच्चों का होता है। बताया जाता है कि अभिभावक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

बच्चों के परंपरागत खेल छूटने की वजह आधुनिकता की अंधी दौड़ है।आजकल माता-पिता ही बच्चों को एेसे खेल से दूर रखते हैं।वे भी उन्हें घरों से दूर नहीं जाने देते उन्हें डर रहता है कि कहीं बच्चा बाहर खेलेगा तो चोट लग जाएगी या बिगड़ जाएगा।इसी सोच के कारण बच्चों को घरों से बाहर जाने से रोकते हैं।स्कूलों में जो प्रतियोगिताएं होती है उनमें भी भाग लेने के लिए बच्चों को अभिभावक प्रेरित नहीं करते हैं।डा0उदयचंद्र यादव का कहना है कि बच्चे टीवी के सामने बैठे-बैठे फास्टफूूड व अन्य सामग्री खाते रहते हैं। इससे बच्चों में मोटापे की समस्या बढ़ रही है। शारीरिक श्रम नहीं करने से ये बच्चे कमजोर भी ज्यादा हो रहे हैं। लगातार टीवी व मोबाइल के सामने रहने से इनकी आंखे भी कमजोर होती है। यही वजह है कि आजकल छोटे बच्चों के जल्दी चश्में लग रहे हैं।



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