तकनीक, संस्कार और प्रतिभाओं का सुरक्षा से हो सरोकार
| -Rituparna Dave - Sep 29 2018 12:06PM

चिंता यह नहीं कि पाक की नापाक हरकतें जब-तब हमें झकझोर कर रख देती हैं या चीन की बदनीयती काफी देर से पता चलती हैं बल्कि यह भी कि खुफिया एजेंसियां कैसे इन सबसे अंजान रहती हैं, नाकाम होती हैं? सांप निकल जाने के बाद लकड़ी पीटते हुए बेबस, लाचार और हंसी का पात्र बन जाते हैं। निश्चित रूप से घर को भी देखना होगा, ठीक करना होगा। अमेरिका में स्पेशल विपंस एण्ड टैक्टिस यानी ‘स्वाट’ है जिसका गठन 1968 में लॉस एंजेलिस पुलिस विभाग में किया गया। इसका काम आतंकवादी विरोधी अभियान, बंधक मुक्ति, वारंटियों की खोज, संदिग्धों के खिलाफ मोर्चाबंदी, भारी हथियारों से लैस अपराधियों को पकड़ना होता है। टीम के पास विशेष हथियार होते हैं जिनमें राइफल, टॉमी बंदूक, शॉटगन, कार्बाइन, बेहोश करने वाले हथगोले, घात लगाकर निशाना साधने वाली उच्च क्षमता की बंदूकें, विशेष उपकरण जिसमें भारी कवच, कवचधारी वाहन, रात में देख पाने योग्य कैमरे, छिपे हुए आतंकियों या बंधकों की स्थिति को समझने वाले डिटेक्टर्स होते हैं।

इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गोल्डन सीरिज के यूएवी(बिना चालक विमान) और कैमरे दुनिया के चुनिंदा देशों में उपोयग किए जाते हैं। इनसे 360 डिग्री तक आसपास के इलाकों को दिन में बखूबी सर्चिंग की जा सकती है। यहां हर समय आतंकी हमले से निपटने को तैयार एक सेफ सिटी कांसेप्ट काम करता है जिसका मकसद लोगों को भयमुक्त रखना है। तेल अवीब शहर आतंवादी हमलों दर हमलों के बाद भी छावनी में नहीं बदला, कैसे? पुलिस शहर में दिखती तक नहीं, न बैरीकेड, न पूछताछ, न छानबीन फिर भी अमन-चैन! सारा कमाल है कमाण्ड और कंट्रोल सेन्टर का जो म्युनिस्पल के एक कमरे में चलता है। तरीका बहुत आसान हर गली, मुहल्ला कैमरे की निगाहों में है जो इतना ताकतवर कि गाड़ियों के नंबर प्लेट भी पढ़ ले। इसे वॉच करने तैनात है मुस्तैद टीम। हजारों कैमरे पर नजर का तरीका भी वैज्ञानिक जिसमें वीडियो कंटेंट ऐनालिसिस सिस्टम जिसके जरिए वो तस्वीरें खुद-ब-खुद स्क्रीन पर डिस्प्ले होने लगती हैं जिन्हें पहचानने की कमाण्ड उन्नत कंप्यूटरों को दी गई है।

तेज रफ्तार गाड़ी, गलत तरीका से चलता, भिड़ता या भागता ऑब्जेक्ट, सड़क पार करने में हुई हड़बड़ी या गड़बड़ी, यहां तक कि अगर कहीं आग लग जाए या दुर्घटना हो जाए तो सीधी तस्वीरें खुद कंट्रोल सेन्टर में अपने आप डिस्प्ले होने लग जाती हैं। सेना, पुलिस और प्रशासन हर वक्त  आपस में जुड़े होते हैं, तुरंत फैसला लेकर कार्रवाई करते हैं। आतंकवादी हमले वहां भी शहर, कस्बे और गांवों में होते हैं। लेकिन व्यवस्था हर कहीं इतनी चुस्त दुरुस्त कि धुंए का छोटा सा गुबार भी कैमरा पकड़ लेता है। भारतीय युवा उत्कृष्ट गुप्ता ने बीते महीने यूएसए में आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस में पीएचडी पूरी कर की है और जबरदस्त तहलका मचाया है। काश भारत उत्कर्ष को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल पाता! ऐसी कितनी प्रतिभाएं हैं जो पलायन कर गईं। उन्हें भी पहचानना और रोकना होगा। उत्कर्ष भविष्य में 3डी प्रोजेक्टिव डिस्प्ले के लिए एल्गोरिदम डिजाइन करने पर भी काम कर रहे हैं। इस इस अनुसंधान में लेजर प्रणाली के इस्तेमाल से दीवार के पीछे मौजूद किसी भी वस्तु का 3-डी इमेज से पता लगाने की तकनीक है। इससे भूकंप या आग लगने पर, सैनिक अभियान, बचाव अभियान और छिपे आतंकवादियों की तलाश कर उनको दबोचने में काफी मदद मिलेगी। निश्चित रूप से आतंकवाद से निपटने के लिए यह बेहद कामियाब तकनीक होगी।

यह तो चंद मॉडल हैं आतंकवाद से निपटने खातिर। भारत में भी कुछ ऐसी व्यवस्थाओं को अंजाम देना होगा। लेकिन सवाल फिर वही कि देश में ही प्रतिभाओं की भरमार है, तकनीकी महारत में दुनिया में नामचीनों की लंबी फेहरिस्त है, तब भी हमारे बार्डर और संवेदनशील इलाके असुरक्षित! अब जरूरत इस बात की कि सुरक्षा के लिए असलाह, बारूद तो हों लेकिन वो आधुनिक तकनीक और मानवीय तरकीब भी हों जिनसे पलक झपकते किसी भी नापाक इरादे की सूचना खुद-ब-खुद मिले और दुश्मनों के मंसूबे नाकाम हों जाएं। लेकिन इन सबसे इतर बहुधर्मी या धर्मनिरपेक्ष भारत में सुरक्षा के लिए संस्कारों को सरोकारों से जोड़कर भी आतंकवाद और दूसरी ऐसी समस्याओं पर धीरे-धीरे ही सही स्थाई लगाम लगाना होगा। इसके लिए पहल बहुत पहले होनी थी। लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। आने वाली पीढ़ी को बचपन से ही आतंकवाद के खिलाफ और इंसानियत के निहितार्थ तैयार करना होगा। हमारा संविधान सभी धर्मों को अपने प्रचार, प्रसार की स्वतंत्रता देता है लेकिन बड़ी सच्चाई भी है कि इसी आड़ में बच्चों में बचपन से ही अलगाववाद की भावना भरी जाती है।

कश्मीर की  पत्थरबाजी हो या मध्य से लेकर दूर दक्षिण भारत तक फैला नक्सलवाद जो 1976 में एक मामूली विद्रोह से पनपा। जिसमें किसानो ने जमींदारों खिलाफ अपने अधिकारों के लिए हथियार उठाए, उसे न्याय तथा तर्क संगत बनाने के लिए दुनिया भर की विचारधाराओ का अध्ययन किया तथा चीन के माओ जेडोंग की विचारधारा से जुड़े जो विकृत होते-होते विकराल नक्सलवाद और माओवाद के का नासूर बन खड़ा हुआ। हाँ, मुस्लिम मदरसे हों या सिख स्कूल, इसाई मिशनरीज हों या हिन्दू पाठशाला सभी में पाठ्यक्रम ऐसा हो जिससे सभी धर्मों की जानकारी एक-दूसरे को मिले ताकि भावी पीढ़ी का कोमल मस्तिष्क इस तरह से परिपक्व किया जाए जिसमें हर धर्म को समझने, जानने व आदर देने का भाव हो। चाहे आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, भटकाव हो या धार्मिक उन्माद का जहरीला वातावरण, उसे रोकने और देश के प्रति समर्पण के लिए यह बड़ी पहल होगी। देश की सुरक्षा और मजबूती के लिए जितनी उन्नत तकनीक जरूरी है उतनी ही जरूरत है भावी कोमल तरुणाई को भटकने से रोकने और राष्ट्रहित के संस्कारों से जोड़ने खातिर ईमानदार राजनैतिक और सामाजिक पहल की।



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