अर्थशास्त्री भैंस और कुत्तों की जमात!
| -Prabhunath Shukla - Oct 5 2018 2:18PM

कुत्ते भी अपनी कारस्तानी से सुर्ख़ियों में रहते हैं। कभी वफाई तो कभी बेवफाई को लेकर। स्वामीभक्ति का तमगा इनकी बपौती है। लेकिन मौसम देख बन्दे मिजाज बदलने में उस्ताद होते हैं। कुत्तों के भाग पर लिखी महान कवि की वह कविता हमें आज़ भी चुभती है। स्वानो को मिलता दूध-भाँत भूखे बच्चे चिल्लाते हैं। खैर छोड़िए! काग़ के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सों ले गौ, माखन रोटी, क्या करिएगा यह दुनिया है। कुत्तों का भला क्या दोष, भौंकना तो इनकी आदत है, लेकिन कभी-कभी इनका जीन मुलुक के नेताओं में भी घूस जाता है। उस दौरान तो सुनामी आ जाती है, दौर चुनावी हो तो क्या कहने यानी सोने पर सुहागा। चुनावी मौसम में कुत्तों और राजनीति का डीएनए पार्टनरशिप हासिल कर लेता है।

अब कुत्तों को क्या कहें जनाब इनसे तो पूरी दुनिया परेशान है। अपना पड़ोसी भी परेशान है। अपने मियां के गले की फांस बन गए हैं मुये। सरकार बन गई तब भी वजीरे आजम के मुलुक में कुत्ते साया नहीँ छोड़ रहे। नामर्दों को अपनी बेशर्म बहादुरी दिखाने की दूसरी जगह भी नहीँ मिली। इण्टरनेशनल ऐयरपोर्ट पर गुस्सा उतारने लगे। अरे भाई कुछ तो जनाब और उनके ओहदे का ख़याल रखते। जुम्मा- जुम्मा चार दिन भी अवाम की ताजपोशी के नहीँ हुए। लेकिन तुम काले कुत्ते ज़मात और जात का जरा सा ख़याल किए बिन औकात पर उतर आए। कम से कम मियां की सोची होती। विरोधियों के हाथ में आणविक हथियार थमा दिया।

जनाब दुनिया में मुलुक की माली हालत सुधारने के लिए बिन जूती दस्तक दे रहे हैं । इधर एयरपोर्ट पर कुत्तों की आवारारगी ने उन्हें सांसत में डाल दिया। कलमुंहे! चैलन वालों को भी क्या कहें, उन्हें तो नेक काम नज़र नहीँ आता।  बस कुत्तों की ब्रेकिंग,  जैसे मुल्क में दूसरी समस्या है ही नहीँ। उफ़! अब जनाब के विरोधी भला पीछे क्यों रहते। बोल रहे हैं कि  कुत्ते नहीँ सम्भल रहे तो देश क्या सम्भलेगा। शर्म नहीँ आती, कितने बेशर्म हैं उनकी शराफत की पोलटिक्स। लगता है मियां की क्रिकेट की लाइफ से विपक्ष ने कोई अनुभव नहीँ लिया। आपने तो केवल भौंकना सीखा, अपनी गू नहीँ दिखती। जनाब को तो शराफत वालों ने मार डाला। उनकी काबिलियत पर शेर पढ़ने वालों जरा शर्म करो। आपकी वजह से उन्हें भैंसे नीलाम करनी पड़ रही।

आपने तो मुल्क से भी बड़े अक्ल की भैंसों की फौज तैयार कर रखा था। आपकी सेहत की शराफत ने तो सारा दूध निगल मुलुक की नजाकत बिगाड़डाली है। पूरी ऊर्जा तो अपने पड़ोसी मुल्क को तबाह करने में लूटा दिया। आधा तो दहशत का आका हाफिज पी गया, बाकि आपको खुद मालूम है। फ़िर मुलुक कमजोर नहीँ होगा तो क्या होगा। अब बेचारे वजीरे आजम का क्या दोष। अब तुम्हारी भैंसों और कारों को नीलाम कर मुलुक को पानी और पेट्रोल पिला रहे हैं। फ़िर एयरपोर्ट से आवारा कुत्ते और चमगादड़ कहाँ से भगाएं।

बेचारे मियां क्या करें। वह बेदबी से पल रहे आवारा कुत्ते हाफिज को सम्भाले मुलुक को। किस-किस और कितनों की आवारगी से निपटेंगे। मुलुक की सेहत सुधारें की मरियमों की, बेचारे अजीब उलझन में हैं। ढलती उमर में कई बीवियां और उससे भी बड़ी मुलुक की जिमेदारी। कुछ समझ में नहीँ आ रहा बुरे फँस गए। सरकार, सत्ता, वजीरे आजम का सर्कस तो आ बैल मुझे मार की स्थिति में खड़ा कर दिया।  दूसरी तरफ़ पड़ोस में आतंक की फसल भी उगानी है। यूएन में झूठ की पोथी भी वाचनी है। जुबान से एटम बम भी गिराना है। हाय राम ! बड़ी कठिन है डगर पनघट की। अभी तक तो क्रिकेट और बीवियों को लेकर सुर्ख़ियों में थे , अब तो शराफत की चालों में उलझ नाकामियों की वजह बदनाम होंगे।

लगता है क्रिकेट की तरह पालटिक्स से भी सन्यास लेना पड़ सकता है।  लेकिन मुये !  शराफतिए मियां को बख्श दो। बेचारे को थोड़ी रुख्तसत तो दो। अभी बच्चा स्कूल में दाखिला लिया नहीँ तभी फेल का सर्टिफिकेट बाँटने लगे।  हम तो अपने मियां के लिए दुवा करते हैं। मुये कुत्तों, चमगादडों और टीवी के एंकरो थोड़ी शराफत बरतो।  अपने मुलुक और मियां के लिए, उन्हें मौका तो दो। तूने तो कटोरा थमा दिया। सल्तनद चलाए की तुम्हारा विरोध सम्भाले। तुमने आखिर छोड़ा ही क्या, उन्हें भैंस बेचनी पड़ी। मुलुक की अर्थव्यवस्था सम्भालने के लिए मियां का भैंस अर्थशास्त्र कितना कामयाब होता है उसके लिए समय तो दो। अभी भैंस पानी में नहीँ गई फ़िर जुबानी जंग शुरु कर दिया। हाफिज से बोल अभी मियां से खुदा हाफिज कर लें। अभी मुलुक को पानी और पेट्रोल की ज़रूरत है, तुम्हारी नहीँ। फ़िर मिलते हैं।



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