भारतीयों के और कितने विभाजन?
| -Nirmal Rani - Oct 10 2018 12:06PM

                1947 में भारत-पाक विभाजन के समय जिस प्रकार शरणार्थियों के अनियंत्रित आवागमन के दृश्य दिल्ली से लेकर लाहौर तक के रेलवे स्टेशन पर दिखाई दे रहे थे कमोबेश कुछ वैसा ही नज़ारा इन दिनों गुजरात राज्य में देखने को मिल रहा है। उत्तर भारतीय कामगारों पर गुजरात में हमले हो रहे हैं और स्थानीय लोगों द्वारा हिंसा फैलाकर गुजरात छोड़कर जाने के लिए उन्हें मजबूर किया जा रहा है। गुजरात के साबरकांठा जि़ले के हि मतनगर क्षेत्र में शुरु हुई उत्तर भारतीयों पर हमले की घटना धीरे-धीरे गुजरात के और कई जि़लों में फैल गई है। खबरों के अनुसार साबरकांठा के हि मतनगर क्षेत्र में गत् 28 सितंबर को एक स्थानीय 14 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार किए जाने के आरोप में एक बिहारी कामगार को गिरतार किया गया था। इसके बाद भड़की हिंसा ने क्षेत्रवाद का रूप धारण कर लिया। अब धीरे-धीरे यह विषय राज्य के बेरोज़गार लोगों के अधिकारों पर उत्तर भारतीयों द्वारा कब्ज़ा जमाए जाने जैसा राजनैतिक विषय बनता जा रहा है। लगभग सभी राजनैतिक दल इस घटना में अपने-अपने तरीके से राजनैतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। इस समय गुजरात में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध लगभग उसी प्रकार का माहौल बन गया है जैसाकि महाराष्ट्र में शिवसेना व मनसे द्वारा उत्तर भारतीयों के विरुद्ध चलाए जाने वाले आंदोलनों के समय दिखाई देता है।

                इस प्रकार की घटनाएं कई प्रकार के प्रश्रों को जन्म देती हैं। निश्चित रूप से किसी भी राज्य,धर्म अथवा जाति के किसी भी ऊंचे से ऊंचे पद पर बैठने वाले व्यक्ति को उसके किसी भी दुष्कर्म की सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए। परंतु किसी समुदाय,धर्म अथवा क्षेत्र के लोगों को किसी एक व्यक्ति के अपराध की सज़ा देना आ$िखर कितना मुनासिब है? इन्हीं परिस्थितियों ने 1984 में हिंदुओं-सिखों के मध्य ऐसी दरार पैदा की जो आज तक पूरी तरह से पाटी नहीं जा सकी। किसी दूसरे के जुर्म की सज़ा किसी और को देना समाज में विभाजन पैदा करने का संकेत हैं। क्या गुजरात में किसी बच्ची के साथ कभी किसी गुजराती व्यक्ति ने बलात्कार नहीं किया? और यदि किया तो क्या राज्य के लोगों ने उस गुजराती व्यक्ति को अपने शहर,जि़ले या राज्य से बाहर निकाल दिया? या हमारे देश में कोई ऐसा $कानून भी है जिसके तहत किसी एक व्यक्ति के अपराधों की सज़ा उसके धर्म अथवा समुदाय के लोगों को दी जाए? परंतु भाजपा शासित राज्य गुजरात में इन दिनों यही सब दिखाई दे रहा है। उत्तर भारत के लोग खासतौर पर उत्तर प्रदेश व बिहार के निवासी इस समय पूरे भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के अनेक देशों में अपने रोज़गार अथवा नौकरी के सिलसिले में रह रहे हैं। कृषि व उद्योग जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि यूपी व बिहार के कामगार व खेतीहर मज़दूर इन क्षेत्रों में काम करने से अपने हाथ पीछे खींच लें तो कृषि तथा औद्योगिक उत्पादन पर इसका बड़ा गहरा असर पड़ सकता है। परंतु अपनी हांड तोड़ मेहनत के बावजूद दुर्भाग्यवश इन उत्तर भारतीय कामगारों को देश के दूसरे राज्यों में अपनत्व मिलने के बजाए सौतेलापन ही हासिल होता है।

यूपी व बिहार देश को लगभग एक चौथाई सांसद देते हैं। गोया इन दो राज्यों में सत्ता पर नियंत्रण रखने वाली सरकारों या दलों को दिल्ली दरबार की राह करीब व आसान दिखाई देती है। इसके बावजूद आ$िखर क्यों इन राज्यों के कामगारों को कभी महाराष्ट्र,कभी आसाम तो अब गुजरात में क्षेत्रवाद का शिकार होना पड़ रहा है? सियासी हल$कों में इस समय यह चर्चा ज़ोरों पर है कि 2019 का चुनाव आते-आते देश अभी और भी कई प्रकार के सामाजिक विभाजन का सामना कर सकता है। इनमें धर्म, जाति, समुदाय, क्षेत्र व भाषा आदि के नाम पर होने वाले विभाजन भी शामिल हैं। गुजरात में हो रही घटनाएं उसी कड़ी का एक हिस्सा हैं। उधर राम मंदिर निर्माण को लेकर भी साधू-संतों को आगे किए जाने की योजना तैयार हो चुकी है। वर्तमान समय में आरक्षण के समर्थन तथा इसके विरोध में एक ऐसा वातावरण तैयार किया गया है जो देश की सामाजिक एकता के लिए बहुत बड़ा $खतरा साबित हो सकता है। शिया व सुन्नी समुदायों के बीच न$फरत को हवा देने के लिए कई प्रकार की साजि़शें रची जा रही हैं। तीन तलाक जैसे मामूली एवं समुदाय विशेष से संबंधित विषय को लेकर पुरषों व स्त्रियों के मध्य समुदाय विशेष में फासला पैदा करने के प्रयास किए गए हैं। वैसे भी भाजपा ने उत्तर भारतीयों पर महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं द्वारा करवाए गए हमलों के विरुद्ध कभी भी ाुलकर अपने विचार नहीं व्यक्त किए। क्योंकि भाजपा को महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं की ज़रूरत पहले की ही तरह कभी भी पड़ सकती है।

                उत्तर भारतीयों पर होने वाली हिंसा व इसके कारण लगातार हो रहे पलायन को लेकर देश भर में राजनैतिक वातावरण गरम हो उठा है। विपक्षी दल केंद्र व गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा पर क्षेत्रवाद की आग भड़काने का आरोप लगा रहे हैं। तो दूसरी तर$फ सत्तारुढ़ भाजपा कांग्रेस पार्टी पर ही गुजरात में अस्थिरता पैदा करने का इल्ज़ाम लगा रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी भी उत्तर भारतीयों पर होने वाले हमलों के विरोध में 12 अक्तूबर को 'उत्तर भारतीय स्वाभिमान यात्रा' निकाल रही है। भाजपा के सहयोगी मु यमंत्री होने के नाते नीतिश कुमार भी केवल गुजरात के मु यमंत्री से संपर्क साधने की बात कह रहे हैं। यही भाषा उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री भी बोल रहे हैं। आ$िखर क्या वजह है कि हमलावरों के हौसले इस समय इस कद्र बुलंद हैं कि वे गुजरात के मु यमंत्री, प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष की या तो परवाह नहीं कर रहे या फिर इनकी सरपरस्ती होने की वजह से ही इनके हौसले इतने बुलंद हैं। जो स्थिति 2002 में राज्य में भड़की  सांप्रदायिक हिंसा के बाद पैदा हुई थी उससे भी भयावह स्थिति व दहशत का माहौल राज्य में उत्तर भारतीयों पर छाया हुआ देखा जा रहा है। अर्थशास्त्री व औद्योगिक जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि इस समय होने वाले कामगारों के पलायन का सीधा प्रभाव राज्य के उत्पादन तथा औद्योगिक बाज़ार में पड़ सकता है। राज्य का प्रसिद्ध हीरा व कपड़ा उद्योग भी इससे प्रभावित हो सकता है। कई बड़ी इकाईयों पर तो कामगारों के पलायन के कारण इसके प्रभाव दिखाई देने अभी से शुरु हो चुके हैं।

                ऐसे में एक बार फिर यही सवाल उठता है कि भारतवासियों में आ$िखर भारतीयता की भावना कब प्रमुख भावना के रूप में अपनी जगह बना पाएगी और क्षेत्रवाद,धर्म व जाति का प्रभाव कब कम हो सकेगा? क्षेत्रवाद की भावना के प्रबल होने के कारण ही भारतीयता या राष्ट्रीयता की भावना में ह्रास की स्थिति पैदा होती है। जब हम स्वयं को पहले हिंदू, मुसलमान, बिहारी, गुजराती, पंजाबी, बंगाली या मराठी, असमी आदि कहते हैं वहीं से हमारी भारतवासी होने की भावना दूसरे दर्जे पर चली जाती है। और यही स्थिति समाज में विभिन्न आधार पर वैमनस्य को जन्म देती है। धर्म व जाति को लेकर खींची जाने वाली दीवारों के साथ भी ठीक वैसी ही स्थिति है। कोई भी व्यक्ति पहले स्वयं को भारतीय नागरिक समझने के बजाए हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, शिया, सुन्नी, ठाकुर, पंडित, जाट, वैश्य, दलित, यादव, कुर्मी, पासी आदि समझता है। और इसी आधार पर वह अपने जीवन में अनेक ऐसे पक्षपातपूर्ण फैसले कर बैठता है जो उसे अपने समुदाय के पक्ष में लिए जाने वाले निर्णय तो प्रतीत होते हैं परंतु ऐसे फैसले देश को विभाजित करने में मददगार साबित होने वाले फैसले होते हैं। नहीं मालूम सत्य,शांति व अहिंसा के संदेश देने वाले इस देश में अभी और कितने प्रकार के सामाजिक विभाजन का सामना करना पड़ेगा?



Browse By Tags



Other News