तीरों की बारिश में भी नमाज़ अदा की इमाम हुसैन ने : मौलाना शब्बर हुसैन खान
| -Ali Askari Naqvi - Oct 18 2018 11:51AM

अंबेडकरनगर। अल्लाह के प्यारे दीन इस्लाम के कट्टर दुश्मनों ने इस बात के लिए पूरी शक्ति लगा दिया था की चौथे इमाम हजरत सज्जाद अलैहिस्सलाम ना तो मस्जिद में पहुंच सकें और ना ही मेंबर तक जा सकें। क्योंकि शत्रुओं को भय सता रहा था कि इमाम के खुत्बे से लोगों में क्रांति की भावना पैदा होगी जो उनके तख्तोताज के लिए खतरे का सबब बन जाएगी। यह विचार मौलाना शब्बर हुसैन खान लोरपुरी ने मंगलवार की रात इमामबारगाह मीरानपुर में मौलाना मोहम्मद अब्बास रिजवी की ओर से आयोजित मजलिस के विशेष कार्यक्रम में प्रतिभाग करते हुए व्यक्त किया।

मौलाना शब्बर खान ने आगे कहा बड़े दुख का विषय है कि फितनापरस्त लोग प्रायः नमाज के मुकाबले अजादारी को और अजादारी के मुकाबले नमाज को वरीयता की बात करते हैं। परंतु वास्तविकता यह है कि मोमिन के लिए अजादारी और नमाज का महत्व एक समान है। उन्होंने बल देकर कहा कि वैसे तो हम सब इशके गमे हुसैन और अजादारी करने के लिए ही पैदा किए गए हैं। लेकिन यह बात काबिले गौर है कि नमाज दीन का स्तंभ है।

लिहाजा नमाज के बगैर कोई भी अमल स्वीकार योग्य ना होगा। अल्लाह ताला जहां रसूल तथा आले रसूल के जिक्र से प्रसन्न होता है, वहीं दूसरी ओर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम नमाज, तिलावत, जिक्र-ए-इलाही से खुश होते हैं। अब यह हमारे ऊपर निर्भर है की हम अपने अमल से   अल्लाह रसूल तथा आलेरसूल को प्रसन्न करना चाहते हैं अथवा नाराज करना चाहते हैं। 10 मोहर्रम सन 61 हिजरी को मैदाने कर्बला में बरसते तीरों के बीच इमाम हुसैन का नमाज पढ़ना और शहीद होने के बाद सरे मुबारक का तिलावत करना इनके महत्व को समझने के लिए पर्याप्त है। इस्लाम में मित्रता का भी बड़ा महत्व है।

इमाम मजलूम ने कहा था की जैसे साथी मुझे मिले ऐसे ना तो बाबा अली को और ना ही नाना रसूल को मिले थे। यही कारण है कि रणभूमि में जाने से पूर्व इमाम हुसैन ने अपने वफादार साथियों को वापस चले जाने की सलाह दिया था। लेकिन एक भी साथी टस से मस ना हुआ और अंतिम सांस तक मित्रता की लाज रखी। जो हम सबके लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के लिए एक सबक है।मीसम अली, जहबी राजीव, दानिश अली, परवेज मेहदी आदि ने कलाम प्रस्तुत किए।



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