दिल्ली की सुबह
| Dr. Avinash Kumar Jha - Oct 22 2018 11:39AM

सुबह-सुबह भागते-दौड़ते शहर मे  होड़ लगी है, फिट रहने की। कोई देखे तो लगेगा जैसे यहां तो कोई बीमार हो ही नही सकता। पार्क मे, रोड पे तेजी से चलते, लगभग भागते लोग!पार्क मे टहलने के लिए प्रतिदिन 10 रु. का खर्च या दो सौ का मासिक खर्च ज्यादा नही लगता? हजारों रुपये डाक्टरों को देने के बदले इतनी कीमत ज्यादा नही लगती है! इसी के बीच  पार्क के बाहर एक ब्लडप्रेशर जांचने की मशीन टेबल पर रखे महाशय के इर्द गिर्द जांच कराने वालों की भीड़, 40 रु. का फीस स्वास्थ्य के दृष्टि से ज्यादा नही लगता, वजन जांचने की मशीन रखे दो चार लोगो की आजीविका सुबह ही शुरू हो गई।

बंद कमरे जहाँ ,शुद्ध हवा भी नही है, गमलों मे रखे पेड़- पौधों से आक्सीजन लेने का प्रयास कर रहे मेट्रोपोलिटनो के लिए घर मे एयर प्युरीफायर  और बाहर पार्कों के पेड़ पौधे आकर्षित करते हैं पर क्या शहरों की हवा रहने लायक है?क्या करेंगे ये, क्या आप्शन्स हैं इनके पास? अपना ही तो किया धरा है? सिर्फ आगे बढ़ने और स्वकेन्द्रित लाइफ स्टाइल ने समाज , आसपास, पर्यावरण इत्यादि के बारे मे सोचने भी नही दिया और न ही उसके लिए कुछ किया तो एक दिन होना ही था। श्वास की बिमारी से जूझते शहरें, जहाँ प्रतिदिन एक व्यक्ति बिना पिये बीस सिगरेट के बराबर धुंआ पी लेता है, लेकिन जायें तो जायें कहाँ?

शहरों मे बढ़ते हास्पिटल, नर्सिंग होम, पैथोलॉजी सेंटर और क्लीनिक की संख्या ,इस इंडस्ट्री के गगनचुंबी होते जाने की ओर इशारा करते हैं! फ्रेश हवा की दरकार इमारतों के गगनचुंबी होते जाने और सबसे उपर वाले फ्लैटो की बढ़ती डिमांड से भी दिखती है। शहरें अब नीचे रहने लायक नही रह गई। सड़कों पर चलने की जगह नही,रोड जाम, सांस लेने मे तकलीफ, शोर गुल आदि से पीड़ित इंसान उपर बढ़ने लगा है!दम घुटता है यहां, यदि कोई खुले वातावरण से यहां आ जाये तो कैसे सरवाइव करे? ना तो आंगन ,ना दीवारों मे खिड़की, ना रोशनदान। एक इंच जमीन कोई अपनी छोड़ना नही चाहता तो खुली हवा घरों को मिले कैसे?

फ्लैटो की दरो दीवारें हांफ रही है, कोई कान लगाकर इन दीवारों की हर्ट बीट सुने तो मंद पड़ती जा रहा है! पत्थरों के जंगल मे इंसान रोबोट सी जिंदगी जीने लगा है पर दिल प्रत्यारोपित पूरी तरह नही हो पाया है! टेरेस बची कहीं हैं जिसपर गमले सजाये जा सके । गमलो मे लगे पौधों को देखें तो इनके भी दम घुटते से नजर आते हैं। ऐसे कहां जाये लोग! घर मे सफोकेशन से दम घुटे और बाहर मे हवा मे जहर ! ये अलग बात है कि इन रोबोटों ने अपने को इतना व्यस्त कर रखा है कि इन्हें पता ही नही कि ये किस वातावरण मे जी रहे हैं, कैसा भविष्य दे रहे अपनी आनेवाली पीढी को?वाकई बहुत कठिन है, मेट्रो शहर मे जीना! ऐसा नही है कि ये मात्र इनके कर्मों का फल है बल्कि आसपास के क्षेत्रों मे किसानों द्वारा जलाये गये खेतों की पराली से उठा धुंआ, शहरों को अंधा कुंआं बना रहे हैं।

एनजीटी लाख प्रयास कर ले, सैटेलाइट से आंकड़े निकाल ले पर जबतक हार्वेस्टर और कंबाइन से कटे फसल अवशेषों के निस्तारण संबंधी ठोस वैज्ञानिक उपाय नही सुझा देता, इस पर रोक लगाना संभल नही। कागजी तौर पर हम जिला और राज्य को भले ही ओडीएफ घोषित कर खुश हो लें पर शहरों मे, झुग्गी झोपड़ियों, सड़क के बाशिंदों को सड़क किनारे और खाली पड़े जगहों पर ही मल त्याग करना पड़ रहा है, गंदगी के बारे मे सोच भी नही है और उपाय भी नही है!

शहरों मे जनसंख्या मैनेजमेंट और दूसरे क्षेत्रों/गांवो मे आजीविका के उपाय विकसित करना विकल्प है। हम जैसे छोटे शहरों मे रहनेवाले लोग जब इन मेट्रो शहर मे आते हैं तो अकबका जाते हैं। घुटते दम से परेशान सुबह सुबह घर से बाहर रोड़ पर टहलने निकल जाते हैं तो आसपास का माहौल देखकर ये ख्याल आता है" "ये कहां आ गये हम, यूंही राह चलते चलते"! पर यहां के बाशिंदों के लिए" हर फिक्र को धुंए मे उड़ाता चला गया!" हम तो कल इस शहर से चले जायेंगे अपने जंगल की ओर और यहान के बाशिंदे युं ही भागते फिरते रहेंगे अपने पत्थरों के जंगल और प्रदूषण के जानवरों के साथ।



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