2019 चुनाव : भाजपा के लिए अस्तित्व की लडाई
| -Jagjeet Sharma - Oct 27 2018 11:46AM

जैसे-जैसे 2018- बीत रहा है और 2019 नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। गली-मुहल्ले में, पान की दुकान पर, नाई की दुकान पर, सोशल मीडिया में हर ओर सिर्फ़ एक ही चर्चा है कि 2019 में राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा। 2019 में सरकार किस पार्टी की होगी, कौन बनेगा प्रधानमंत्री? राजनीति की शतरंज का शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। राजनीतिक शतरंज के शह और मात के इस खेल में देश की सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी गोटिया फिट करने में लगी हुई हंै। गठबंधनों का दौर चल रहा है, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से मजहब और जातियों का समीकरण देखकर अपनी चाले चल रही हैं। ऐसे में देश की 132 करोड़ जनसंख्या के सामने एक यक्ष प्रश्न मुँह बाँया खड़ा है कि आने वाले समय में देश की सर्वोच्च सत्ता किस के हाथों में होगी? कौन बनेगा प्रधानमंत्री? चुनाव से पहले  ही देश यह जानने के लिए उत्सुक है और बडे-बडे मीडिया संस्थानों के टीवी चैनल अपनी टीआरपी बनाने के लिए सर्वे भी दिखाते रहते हैं, पर टीवी चैनलों के सर्वे पर देश के बहुत बड़े प्रबुद्ध तबके का विश्वास नहीं है।

2019 लोकसभा चुनाव से पहले देश के चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में 2018 के अंत में चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों को 2019 से पहले का सेमिफाइनल भी माना जा रहा है।  इन सभी राज्यों में बीजेपी की सरकार है और इन में सीधा मुकाबला देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के बीच में है। क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व इन राज्यों में लगभग ना के बराबर है, यानि साफ जाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी का सीधा मुकाबला कांग्रेस के साथ होने जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस मोदी के विराट व्यक्तित्व के चलते लगातार हाशिए पर चल रही है, मतलब यह कि कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और पाने के लिए बहुत कुछ है। राजनैतिक पंडितों से मिल रही खबरों के अनुसार राजस्थान, मध्यप्रदेश, सहित बाकि के  दोनों राज्यों में बीजेपी की हालत पतली चल रही है, सत्ता परिवर्तन तय है। यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो यह कांग्रेस के लिए मृत संजीवनी बूटी की तरह होगा और बीजेपी के वर्तमान नेतृत्व की उस महत्वाकांक्षा पर कुठारघात होगा जिसमें वह देश  पर 50 साल राज करने का सपना संजोए है। 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही बीजेपी अपराजेय रही है, दिल्ली, और पंजाब को छोड़ दें तो २014 के बाद हुए हर विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जीत हांसिल हुई है, इसके उलट हर उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है।

पिछले चुनाव में बीजेपी की प्रचंड  जीत की सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री मोदी की विकास पुरुष की छवि रही थी, इसी का परिणाम था की उतर भारत में बीजेपी को अप्रत्याशित सफलता मिली थी। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ही अकेले 80 में से 73 सीटें प्राप्त हुई थी। इस बार स्थिति विपरीत रहने वाली है माया, अखिलेश के गठजोड़ ने बीजेपी के रणनीतिकारों के होश उडा कर रख दिए हैं। कांग्रेस हांलाकि फिलहाल गठबंधन से बाहर है लेकिन उम्मीद है आने वाले समय में वो भी गठबंधन का हिस्सा होगी और यादि ऐसा हुआ, महागठबंधन परवान चढा तो तय है की बीजेपी का चाणक्य का तमगा प्राप्त अमितशाह और मोदी की सभी रणनीति धवस्त होने वाली हैं। स्थिति 2014 से एकदम उलट होगी, बीजेपी का ठीक वो हस्र होगा जो पिछले चुनाव में विपक्ष का हुआ था। उतर प्रदेश में 80 में से 73 सीटे पाने वाली बीजेपी हो सकता है 2019 चुनाव में दो या तीन सीटों पर ही सिमट जाए। बिहार में महागठबंधन के चलते बीजेपी को बड़ी हार मिली थी, हालांकि बाद में नितिश कुमार की महत्वाकांक्षा और अमित शाह की कुटिलनीति के चलते बिहार में महागठबंधन टूट गया। बिहार में तो एनडीए की सरकार बन गई पर लालू यादव की पार्टी सबसे बड़ा दल बन कर उभरी और आज भी वो स्थिति कायम है। चारा घोटाले में लालू जेल में है परन्तु उनकी इस स्थिति के चलते आज लालू की भूमिका राजनैतिक शहीद के तौर देखी जा रही है। लालू यादव के उतराधिकारी के तौर पर तेजस्वी की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस गठबंधन एनडीए को जबरदस्त नुकसान पहुंचाने जा रहा है।

दिल्ली में केजरीवाल से पार पाना आज भी बीजेपी के लिए दूर की कौड़ी है। मोदी लहर में भी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में प्रचंड जीत के साथ मोदी के अहम को जबरदस्त चोट करी थी, हांलाकि लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते सभी 7 सीटों पर बीजेपी को सफलता मिली थी पर इस चुनाव में मोदी लहर नहीं है। केन्द्र की मोदी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई हैं इन मुद्दों को चुनाव में कैसे भुनाया जाता है यह मोदी के बाद केजरीवाल से बेहतर और कौन जानता है, इसके अलावा केजरीवाल ने मोदी को रोकने के नाम पर महागठबंधन का हिस्सा बनने के संकेत भी दिए हैं। मतलब दिल्ली में भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन के कयास लगने शुरू हो गए हैं। इस स्थिति में परिणाम का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, हांलाकि कांग्रेस प्रत्यक्ष तौर पर केजरीवाल से किसी भी प्रकार के गठबंधन से इंकार कर रही है पर कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ और झारखंड की बात करें तो आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत हद तक तस्वीर साफ कर देंगे और इस में दो-राय नहीं है कि अगर नतीजे बीजेपी के अनकूल नहीं आये, जैसा कि बहुप्रतिक्षित है तो बीजेपी के साथ ही, एनडीए में भी हडकंप मचना तय है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब व हरियाणा जैसे छोटे राज्यों में जहां कहीं बीजेपी और कांग्रेस में सीधा मुकाबला होता है तो कहीं-कहीं क्षेत्रीय दलो की भूमिका को भी नजऱदांज नही किया जा सकता।

गुजरात को छोड दें तो देश के लगभग सभी क्षेत्रों में बीजेपी की हालत संतोष जनक नहीं कही जा सकती, महाराष्ट्र में बीजेपी का सबसे पुराना साथी शिवसेना लगातार बीजेपी नेतृत्व को आँख दिखा रहा है । इस सब का निष्पक्षता से आंकलन करें तो यह स्पष्ट होता है कि इस चुनाव में कांग्रेस की ताकत बढना तय है। कम से कम वो 44 सीटों तक तो नहीं सिमटने वाली और बीजेपी से भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो पिछली बार की तरह प्रचंड बहुमत हासिल कर लेगी। हम यह बात दावे से कह सकते हैं कि 2019 चुनाव अगर किसी पार्टी का सबसे ज्यादा नुकसान होने जा रहा है तो वो है बीजेपी। अब सबसे बड़ा और सबसे ज्वल्ंत प्रश्न की 2019 में कौन बनेगा प्रधानमंत्री? क्या नरेन्द्र मोदी या राहुल गांधी? तो जवाब मिलता है यह दोनों ही नहीं और इसके पीछे जो कारण नजर आ रहे हैं वह एनडीए यानि बीजेपी के घटक दलों में मोदी की कार्यशैली को लेकर लगातार असंतोष रहा है। उद्वव ठाकरे इसके संकेत कई मौकों पर देते रहे हंै, चन्द्रबाबू नायडू ने भी अभी हाल में ही एनडीए को टाटा बाय-बाय किया है, महबूबा से खुद बीजेपी ने बेवफ़ाई कर दी है, नितिश कुमार के डीएनए से आज की तारीख में पूरा देश वाकिफ हो चुका है। बीजेपी के खुद के अंदर जबरदस्त असंतोष पनप रहा है।

जिस प्रकार मोदी, अमितशाह और जेटली ने पार्टी में वरिष्ठता और अनुभव को ठिकाने लगाने का काम किया है, शायद उसके खमियाजा का समय धीरे-धीरे 2019 के रूप में नजदीक आ रहा है, लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, एवं सुषमा के समर्थकों को पिछले चार साल में ठिकाने लगाने का कार्य जिस प्रकार इस तिकडी ने किया है, उससे हम सब भलि-भांति वाकिफ हैं, धूमल, निशंक, शांताकुमार, यशवंत सिन्हा, शत्रुघन सिन्हा, कलराज मिश्र, विनय कटियार जैसे दिग्गज मौके की तलाश में हंै और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मौका 2019 के चुनाव में मुँह बाँये सामने खड़ा है। कहने का तात्पर्य यह है कि 2019 के चुनाव में बीजेपी अगर 50 सीटें भी दूर रही तो मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। घटक दलों का दवाब व पार्टी का आंतरिक कलह और असंतोष निश्चित तौर पर काम करेगा और बीजेपी से एक नया चेहरा प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी होगा, क्योंकि मोदी अटल जी की तरह स्वीकार्य नेता नहीं है। सबसे ज्यादा संभावित चेहरा राजनाथ सिंह का हो सकता है। अब अगर बीजेपी कमजोर होती है तो कांग्रेस का मजबूत होना तय है पर वो मजबूती इतनी भी नहीं होने जा रही कि कांग्रेस अपने बलबूते सरकार बना ले, राहुल गांधी भी फिलहाल यूपीए के घटक दलों में स्वीकार्य चेहरा बन सकते हैं इसमें भी संदेह है।

और यह भी तय है कि राहुल खुद उस सरकार का नेतृत्व नहीं करेंगे जो अल्पमत में हो, क्योंकि ना तो उनमें वो काबलियत नजर आती है और ना ही इच्छाशक्ति। ऐसे में दो संभावना हैं कि  कांग्रेस सरकार का नेतृत्व करे पर प्रधानमंत्री राहुल चेहरा ना हो जैसा 2004 और 20०9 में सोनिया ने  मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवा कर किया था। दूसरा कांग्रेस नेतृत्व ना करे बल्कि किसी दूसरे दल को आगे कर बाहर से समर्थन दे, जिसकी सबसे ज्यादा संभावना है तो वो चेहरा कौन होगा? दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर जाता है क्योंकि सबसे ज्यादा सीटें इसी राज्य से आती हैं यह जानते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टीयां सबसे ज्यादा ध्यान इसी पर लगा रही हैं, कांग्रेस  उत्तरप्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है कि ऐसे में उसकी उसकी प्राथमिकता है कि वो हर हालत में महागठबंधन का हिस्सा बने और मायावती यह बात भलिभांति समझती है तो उसने एक खास रणनीति के तहत दवाब की राजनीति शुरु कर दी है, मायावती का यह कहना कि अगर सम्मान जनक सीटें नहीं तो गठबंधन नहीं! उसी रणनीति का हिस्सा हैं, वैसे भी मुलायम सिंह यादव पारिवारिक कलह के चलते प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हो चुके हंै तो ऐसे में मायावती किसी भी सूरत में यह मौका हाथ से बाहर नहीं जाने देना चाहेगी।

अखिलेश की सोच भी यह ही दर्शाती है कि प्रदेश में एकछत्र राज करने के लिए मायावती को प्रदेश निकाला दे दिया जाए, मतलब मायावती को प्रधानमंत्री बनवा कर उत्तर प्रदेश की राजनीति से बाहर कर दिया जाए ताकि प्रदेश में दलित, मुस्लिम-यादव के गठजोड से लंबे समय तक एकछत्र राज किया जाए। कहने का मतलब यह है कि देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी की सुप्रीमों, कांग्रेस और सपा के लिए मजबूरी बन गयी है और इसे भी वक्त विडबंना ही कहेंगे कि जिस मायावती की पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी, वो ही 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद की सबसे प्रबल दावेदार है।



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