गुदरी के लाल : देशरत्न डा.राजेन्द्र प्रसाद
| Rainbow News - Dec 3 2018 2:53PM

-लाल बिहारीलाल/ गुदरी के लाल देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर1884 को बिहार के तत्कालिन सारण जिला (अबसीवान)के जीरादेई गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता महादेव सहाय हथुआ रियासत के दीवन थे। अपने पाँच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे इसलिए पूरे परिवार में सबके लाडले थे। इन्हें चाचा भी काफी लार प्यार करतेथे। राजेन्द्रबाबू के पिता महादेव सहाय संसकृत एवं फारसी के विद्वान थेएवं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्म परायण महिला थीं। इसका इसर राजेन्द्र बाबू काजीवन पर भी पड़ा ।ये बचपन से ही काफी मेधावी एवं बहुभाषी थे। इनकी हायर सेकेन्ड्रीकी पढ़ाई जिला स्कूल छपरा से शुरु हुई औऱ कोलकाता से डिग्री मिली । अपनी वकालत काअभ्यास भागलपुर में किया। इनकी शादी 13 साल की उम्र में ही हो गई परन्तु इनके पढाईपर कोई असर नहां पड़ा। इनका झुकाव बचपन से ही समाज और साहित्य के प्रति काफी थाइसलिए गांधी जी से प्रभावित होकर अपनी नौकरी छोड़कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा उठा लिया। और साहित्य की श्रीवृद्धि में भी अपना योगदान दिया।

1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलनका 10वाँ अधिवेशन पटना में हुआ तब भी वे प्रधान मन्त्री थे। 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशनकोकीनाडा में होने वाला था तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता केकारण वे उसमें उपस्थित न हो सके अत: उनका भाषण जमना लाल बजाजने पढ़ा था। 1926ई० मेंवे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तरप्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। हिन्दी में उनकी आत्मकथा(1946)बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है। इसके अतिरिक्त कई पुस्तकें भीलिखी जिनमें बापू के कदमों में(1954), इण्डिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चम्पारण (1922), गान्धी जी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र इत्यादि उल्लेखनीय हैं। अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दी के देश और अंग्रेजी के पटना लॉ वीकली समचार पत्र का सम्पादन भी किया था।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनमें उनकापदार्पण वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हो गया था।चम्पारणमें गांधी जी ने एक तथ्य अन्वेषणसमूह भेजे जाते समय उनसे अपने स्वयंसेवकों के साथ आने का अनुरोध किया था।राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधीकी निष्ठा, समर्पणएवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालयके सीनेटर कापदत्याग कर दिया। गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तोउन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे,उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालयसे हटाकरबिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। उन्होंनेसर्चलाईटऔरदेशजैसीपत्रिकाओं में इस विषय पर बहुत से लेख लिखे थे और इन अखबारों के लिए अक्सर वे धनजुटाने का काम भी करते थे। 1914 मेंविहार औऱ वंगालमे आई वाढ़में उन्होंनेकाफी बढ़चढ़ कर सेवा-कार्य किया था। विहारके 1934के बूकंपके समयराजेन्द्र बाबू कारावास में थे। जेल से दो वर्ष में छूटने के पश्चात वे भूकम्पपीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गये और उन्होंने वायसराय के जुटाये धनसे कहीं अधिक अपने व्यक्तिगत प्रयासों से जमा किया। सिंध औफ क्वेटाके भूकम्प केसमय भी उन्होंने कई राहत-शिविरों का इंतजाम अपने हाथों मे लिया था।

1934 में वेभा. रा. कांग्रेसके मुंबईअधिवेशन मेंअध्यक्ष चुने गये।नेता जी एश. सी. बोसके अध्यक्ष पदसे त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939मेंसँभाला था। फिर 1942 में अंग्रैजो भारत छोड़ो आंदोलन में भी अपनी महती भूमिका निभाया। स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में भी सहयोग कियाथा। किसानों के प्रति लगाव एवं जमीनी स्तर पर जूडे होने के कारण स्वतंत्र भारत केप्रथम कृषी एवं खाद्य मंत्री बने थे फिर 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के एकदिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन होगया लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कारमें भाग लेने गये। 26 जनवरी 1950 को वे स्वतंत्र भारत केप्रथम राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति के तौरपर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों मेंप्रधानमंत्रीया कांग्रेस को दखलअंदाजी का मौकानहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे। 

हिन्दू अधिनियम पारित करतेसमय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसेदृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए मिसाल के तौर पर काम करते रहे।12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चातउन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद हीउन्हेंभारत सरकारद्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्नसे नवाज़ा गया। अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लियेउन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963मेंउनके जीवन की कहानी का अंत हो गया। यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्पराकी चट्टान सदृश्य आदर्शों की। हमको इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणादेते रहेंगे। ऐसे राष्ट्रभक्त बहुत कम ही जन्म लेते है जो सबकुछ छोड़कर देश की सेवा में सदा लगा रहे। उनकी वंशावली को जीवित रखने का कार्य उनके प्रपौत्र अशोक जाहन्वी प्रसाद कर रहे हैं। वेपेशे से एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त वैज्ञानिक औऱ मनो चिकित्सकहैं। उन्होंने बाई-पोलर डिसऑर्डर की चिकित्सा में लीथियमके सुरक्षित विकल्प के रूप में सोडियम वैलप्रोरेट की खोज की थी। अशोक जी प्रतिष्ठित अमेरिकन अकैडमी ऑफ आर्ट ऐण्ड साइंस के सदस्य भी हैं।



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