प्रेमलहरी....... पुस्तक समीक्षा
| Rainbow News - Dec 4 2018 4:03PM

-डॉ. अविनाश कुमार झा/ इतिहास के अनछुए पहलुओं को उजागर करती कृति" प्रेम लहरी"।लेखक " त्रिलोक नाथ पांडेय "की यह पुस्तक  इतिहास होने का दावा नही करती और न लेखक द्वारा इतिहास लेखन का बल्कि एक प्रेम कहानी को केंद्र  मे रखकर लिखी गई पुस्तक है। ऐतिहासिक तानेबाने मे बुनी प्रेम कहानी लोक संस्कृति और जमीन से जुड़े लोगों की कहानी भी कहती है तो दूसरी ओर शाही रहन सहन का अंतर्विरोध भी दिखाती है।लेखक की यह पहली रचना है पर मंझे हुए रचनाकार के समान बनारस, मेवाड़, दिल्ली, आगरा से लेकर कूचबिहार तक के घटनाओं को अपनी कूंची से रंगते हैं।

संस्कृत का झंडा फहराने वाले पंडित जगन्नाथ जब लवंगी के साथ प्रेम का झंडा लहराने लगते हैं तो मुगलिया सल्तनत के शहंशाह भी अपनी जान मुमताजमहल से किए वादे को निभाने के लिए नियम तोड़कर शहजादी को पंडित के साथ चले जाने की आज्ञा दे देते हैं।  पूरी कहानी मे दाराशिकोह और जहांआरा का चरित्र और निखर कर सामने आता है। शाहजहां का चरित्र ताजमहल और लालकिला के चलते विख्यात है पर उसका दूसरा पहलु  औरतखोर, रंगीला, अय्याश बादशाह भी सामने आता है। मुगल हरम की अय्याशियों पर और गुप्तचरी विद्या पर लेखक ने विस्तार से प्रकाश डाला है।पुस्तक की खासियत इसके सुफियाना अंदाज, स्थानीय गीत संगीत का वर्णन, बीच बीच मे संस्कृत के श्लोकों का वर्णन है।

मुगल दरबार मे पंडित जगन्नाथ का बेसुध होकर नाचना और लवंगी का प्रेम मे पागलपन, लवंगी को पाने के लिए कुश्ती की चुनौती स्वीकार करना पराकाष्ठा है।उपन्यास का अंत तो दारुण है , यह भावविभोर कर देता है जब गंगा मैया स्वयं मे समाहित कर लेने के लिए आ जाती है। प्रेम लहरी गंगा के लहरों मे समाहित हो जाती है।दाराशिकोह तो इतिहास मे गंगा जमुनी संस्कृति का अभिन्न अंग है । हिंदु मुस्लिम एकता के उसके कृति उसके परदादा अकबर से भी आगे के थे, यदि वो बादशाह बनता तो भारत का भविष्य कुछ और होता परंतु इतिहास किंतु परंतु से बनता। औरंगजेब द्वारा उसकी और सूफी संत सरमंद की नृशंस हत्या गद्दी पर कब्जा जमाने के लिए हरेक पुश्तों मे हुई घटना से पृथक नही थी।

हालांकि इतिहास मे पंडित जगन्नाथ की कृतियाँ दर्ज है पर उसका प्रेम नही क्योंकि उसने मुगलिया सल्तनत की शहजादी से प्रेम करने का दुस्साहस किया तो भला उसे मुगलिया तवारिखों मे स्थान कैसे मिलता? हालांकि लेखक अपने मूल विषय और पात्रों पर आने से पूर्व काफी इधर उधर भटकता प्रतीत होता है जैसे एक ही पुस्तक मे बहुत सारी बातों को समेटने की कोशिश की गयी है।मसलन शाहजहां और मुमताज की प्रेम कहानी और इस कथा को अपने पारिवारिक इतिहास से जोड़ने की कोशिश, हालांकि जानने मे अच्छा लगता है पर यह अध्याय न भी होता तो " प्रेम लहरी" अक्षुण्ण रहती। जैसा कि लेखक दावा करते हैं कि लवंगी ऊर्फ गौहर आरा और पंडित जगन्नाथ की यह प्रेम दास्तान किसी इतिहास के पन्नों मे नही मिलती है तो इसे जनश्रुतियों और कल्पनाओं के सहारे बुना गया है।

मध्यकालीन इतिहास मे किसी मुस्लिम लड़की की हिंदू लड़के के साथ प्रेम की एकमात्र और अनुठी दास्तान है। लेखक ने एक जगह सती प्रथा का भी जिक्र किया है तो महिलाओं के जबर्दस्ती हरम मे पहुचाये जाने का भी। मुगल शहजादियों की अय्याशियों के वर्णन मे लेखक के हाथ कांपे नही हैं जिसकी मिसाल रोशन आरा थी जिसने पंडित का अपहरण और हत्या तक कराने की कोशिश की थी। अपनो के कत्लेआम के बीच शहजादियों के कुंवारे रह जाने की दास्तान एक पीड़ादायक किस्सा है जो इनकी अय्याशियों को जायज ठहराता है। इतिहास के कई अनछुए पहलुओं को जानने के लिए इस किताब को पढना चाहिए। संपूर्ण रुप से पुस्तक" प्रेम लहरी" पठनीय और संग्रहणीय है। पुस्तक को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।



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