सावित्रीबाई फुले का त्यागपत्र : एक साहसिक कदम 
| Rainbow News - Dec 10 2018 2:48PM

          -घनश्याम भारतीय/ बेबाक टिप्पणी, निर्भीक सोच, साफगोई और बगावती तेवर के लिए चर्चित भाजपा सांसद सावित्री बाई फूले का पार्टी से त्यागपत्र सियासी गलियारों में विभिन्न नजरिए से देखा जा रहा है। नफा नुकसान के आकलन के बीच उनका यह कदम बहस का मुद्दा बन गया है। एक तरफ जहां इसे सामान्य बात कह कर टाल दिया जा रहा है वहीं इसके तमाम निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं। फिलहाल सत्ताधारी दल में रहते हुए सरकार के विरुद्ध बोलने की कूवत दिखाते हुए बगावती तेवर अपनाने वाली सावित्री के साहस की सराहना भी खूब हो रही है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दलित, शोषित, वंचित वर्ग में इस त्यागपत्र के बाद सावित्री से आशा की एक किरण दिखी है।
          एक सावित्रीबाई फुले वह थीं, जिन्हें देश की प्रथम शिक्षित दलित महिला होने का गौरव हासिल है। उन्होंने दलित, पिछड़े, शोषित, वंचित समाज को शिक्षित बनाने के लिए तमाम दुश्वारियों का सामना करते हुए कभी हिम्मत नहीं हारी। जिसका परिणाम यह हुआ की उस उपेक्षित समाज से निकल कर तमाम वीरांगनाओं ने एक नया इतिहास रचा। उनसे प्रेरित होकर आज तमाम महिलाएं विभिन्न रूपों में अपने समाज को आगे बढ़ाने में लगी हैं। उत्तर प्रदेश के बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले उन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने दलित, वंचित और शोषित जन के हक व अधिकार के लिए कठिन संघर्ष हेतु स्वयं को समर्पित किया है। समाज के तमाम महापुरुषों से प्रेरित और अनेकानेक वीरांगनाओं के नक्शे कदम पर चलते हुए यह युवा महिला सांसद दबे कुचलों की गूंगी वेदना को स्वर दे रही हैं।
           1 जून 1981 नानपारा के अनुसूचित जाति के एक साधारण गरीब परिवार में जन्मी सावित्रीबाई फुले ने बचपन से ही तमाम सामाजिक विद्रूपताओं का सामना किया है। इन्हीं सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों के झंझावातों ने उन्हें संघर्ष को प्रेरित किया है। टोली बनाकर संघर्ष करते हुए जब उन्होंने वंचित वर्ग की पीड़ा को करीब से देखा और उसे महसूस किया तो कम आयु में ही गृहस्थ आश्रम को छोड़ सन्यास धारण कर लिया और साध्वी हो गई। इस बीच उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अध्ययन जारी रखा। धीरे-धीरे बढ़ती लोकप्रियता के क्रम में जिला पंचायत सदस्य होकर 2012 में विधानसभा तक का सफर तय किया और 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के ही टिकट पर सांसद चुनी गई। भाजपा के रंग में रंगने के बावजूद भी उन्होंने वंचित वर्ग की पीड़ा को दूर करने हेतु अपना संघर्ष जारी रखा।
           इसी बीच 6 दिसंबर 2018 को बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर सावित्री बाई फुले ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर सियासी हलचल मचा दिया। उन्होंने जिस तरह के आरोप भाजपा पर लगाए उसे लेकर अब नई बहस शुरू हो गई है। हालांकि भाजपा के उच्च पदस्थ लोग उनके आरोपों को खारिज करते हुए इस्तीफे को आम बात मानकर नजरअंदाज करने का प्रयास कर रहे हैं और गैर भाजपाई दल नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। नफा नुकसान का आकलन भी हो रहा है।
            सावित्रीबाई फुले का यह कहना कि जिस दल में उनकी और उनके समाज की भावनाओं की कद्र न हो वहां रहना मुश्किल है। इस बात में पूरी तरह सच्चाई बेशक न हो परंतु कुछ न कुछ दम तो है ही। यही बात भाजपा में शामिल होने से पहले सोचना चाहिए था। इससे लगता है कि कुछ समय के लिए ही सही पद लोलुपता की हवा से वे स्वयं को नही बचा पायीं थी। पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देने के साथ ही लोकसभा की सदस्यता भी त्याग देती तो आमजन में उनका कद और बढ़ जाता, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
         इससे हटकर यदि देखे तो दलितों, पिछड़ों, वंचितों में सावित्रीबाई फुले का कद इन दिनों काफी बढ़ा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि उन्होंने सवर्णों के साथ रहकर भी हमेशा वंचित वर्ग के हित की ही बात की। चाहे वह आरक्षण का मुद्दा रहा हो अथवा एससी-एसटी एक्ट का। सभी के पक्ष में उन्होंने सदैव बगावती तेवर अपनाया और अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने जितने भी आरोप लगाए हैं उसमें कुछ सच्चाई अवश्य छिपी है।एक एससी-एसटी एक्ट को छोड़ दिया जाए तो सरकार ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे दलितों, पिछड़ों, शोषितों, वंचितों का आत्मबल बढ़े। यदि सरकार इस समुदाय की वास्तविक  हितैषी होती तो देश के विभिन्न हिस्सों में जाति के नाम पर लोगों का उत्पीड़न, शोषण, दुराचार, बलात्कार व हत्या जैसी जघन्य वारदातें न होती। इस समाज के लोगों द्वारा भगवान सरीखे पूजित बाबा साहब की प्रतिमाएं खंडित न होती। दिल्ली में भारतीय संविधान की प्रतियां न जलाई जाती।... परंतु अफसोस कि यह सब कुछ हो रहा है और उच्च पदासीन लोग मौन हैं। कदम कदम पर दलितों, वंचितों की आवाज दबाने की साजिश हो रही है। विकास के नाम पर महंगाई चरमोत्कर्ष पर है। गरीबों के जरूरत की वस्तुओं के दाम निरंतर बढ़ रहे हैं।
              इस तरह ढेर सारे ऐसे मुद्दे हैं जो इस समुदाय से निकले जनप्रतिनिधियों को उद्वेलित तो करते हैं परंतु वे लोग आवाज उठाने के बजाय अपनी कुर्सी बचाने और अगले चुनाव में टिकट पाने की जुगत जुगत में अपने ही समाज का गला घोंटने से नहीं हिचकते। ऐसे में दलित मुद्दों पर अपनी ही सरकार को घेरती आयी सावित्रीबाई फुले ने ऐसे समय में यह साहसिक कदम उठाया जब कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव चल रहे थे और कुछ ही दिनों में लोकसभा के आम चुनाव होने वाले हैं।
          अब सवाल यह उठता है कि सावित्री के अलावा आरक्षित वर्ग से चुनकर सदन में पहुंचे अन्य सांसद क्या वास्तव में कायर और दब्बू हैं। जवाब कहीं न कहीं से हां मैं जरूर मिलेगा। इनकी दलीय प्रतिबद्धता ने इनकी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। ऐसे में वे मुद्दे उन्हें दिखते ही नहीं। कुल 545 सदस्यों वाली संसद में 131 सदस्य आरक्षित वर्ग से चुनकर जाते हैं। इसमें 84 अनुसूचित जाति के 47 अनुसूचित जनजाति के होते हैं। वर्तमान संसद में आरक्षित सीटों से चुनकर पहुंचे 131 सांसदों में से अकेले बीजेपी के पास 67 सांसद हैं। कांग्रेस के पास 13, तृणमूल कांग्रेस के पास12, अन्नाद्रमुक व बीजद के पास सात-सात सांसद हैं। शेष अन्य के पास हैं। ऐसे में दलित,वंचित लोगों की अनदेखी आखिर कैसे हो रही है। बढ़ते उत्पीड़न के साथ साथ आरक्षण से छेड़छाड़ की हो रही साजिश के बीच अपने अपने समुदाय के हितों की रक्षा में आरक्षित कोटे से आए सांसदों का मौन बहुत बड़ा प्रश्न लिए खड़ा है। आरक्षित सीट से चुनकर आए सभी सांसद अपने अपने समुदाय के हित में यदि दलीय प्रतिबद्धताएं त्याग एक मंच पर आ जाएं तो शोषित वंचित वर्ग के हितों की न अनदेखी हो और न ही उनकी तरफ किसी दबंग की आंख ही उठे। ऐसे में बहराइच से सांसद साध्वी सावित्री बाई फुले ने जिस साहस का परिचय दिया है,आने वाले दिनों में उसकी मिसाल दी जाएगी।



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