विधानसभा चुनावों के बाद भविष्य के लिए राजनैतिक खेमों में हो रही है माथा-पच्ची
| Rainbow News - Dec 17 2018 4:24PM

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बाद राजनैतिक दलों में आत्म मंथन का क्रम शुरू हो गया है। जहां भाजपा अपनी पराजय के कारणों का मूल्यांकन करने में जुटी है वहीं कांग्रेस सहित सफल होने वाले सभी दल अपने प्रदर्शन को और बेहतर करने के लिए चिन्तन-मनन में जुटे हैं। लोकसभा के चुनावों का बिगुल निकट भविष्य में बजने वाला है। समय कम है और काम अधिक। हमारे चिन्तन की दिशा बहुआयामी मार्गों की ओर अग्रसर हो रही थी कि तभी फोन की घंटी ने चल रहे विचारों को विराम दिया। फोन पर हमारे मित्र और भाजपा के निष्ठावान सिपाहसालार जीतेन्द्र सिंह बुंदेला मौजूद थे। श्री बुंदेला विधानसभा से लेकर लोकसभा तक में कमल के फूल को खिला चुके थे। व्यक्तिगत चर्चा के उपरान्त हमने प्रत्यक्ष मुलाकात की इच्छा जाहिर की। उन्होंने स्वागत भरे लहजे में आमंत्रित ही कर लिया। कुछ समय बाद हम आमने-सामने थे।

आपसी कुशलक्षेम पूछने के बाद चुनावी चर्चायें चल निकलीं। भाजपा की अप्रत्यशित हार पर हमने अपनी जिग्यासा प्रगट की। उन्होंने विचार-मंथन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि केन्द्र और प्रदेश सरकारों के कार्य को रचनात्मकता का प्रमाण पत्र हर बुद्धिजीवी ने दिया है। विश्वमंच पर देश का नाम रोशन हुआ। प्रदेश के लोगों की भावनात्मक संतुष्टि रही। विकास के मापदण्ड स्थापित हुए। भावनात्मकता को रेखांकित करते हुए हमने बीच में ही टोकते हुए आनन्दम् की स्थापना से लेकर तीर्थदर्शन जैसे कारकों के सामाजिक प्रतिमानों की व्याख्या का अनुरोध किया। उन्होंने अंतरिक्ष में कुछ ढूढते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा कि जीवन का अर्थ सुखद और संतुष्टि से है। मानवीय काया को जिस-जिस कारक में संतुष्टि और तृप्ति मिले, वही वास्तविक विकास है। हमारी केन्द्र सरकार में दुनिया में देश को जो सम्मान दिलाया है वह स्वाधीनता के बाद कभी भी नहीं मिल सका, केवल अटल जी के कार्यकाल को छोडकर।

विकसित राष्ट्रों के साथ हम विकासशील होते हुए भी समकक्ष पहुंच गये। हमने उन्हें पुनः वर्तमान परिस्थितियों की ओर मोडा। विधानसभा चुनावों की समीक्षा करते हुए उन्होंने खुले मन से यह स्वीकारा कि पार्टी की छवि अच्छी होने के बाद भी मिली हार के लिए प्रत्याशियों के चयन में कहीं न कहीं चूक हुई है, जिसका खामियाजा हमें भुगतना पडा। अब आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए हम अपनी असफलताओं पर गहराई से विचार कर गलतियों का भूल-सुधार अवश्य करेंगे। कहने-सुनने के लिए तो बहुत कुछ था परन्तु उनकी मनःस्थिति को और ज्यादा कुरेदना, ताजे घाव को उधेडने जैसा होता। अतः गहन दिशा को सामान्य बातचीत की ओर मोड दिया। तभी हमें लगा कि क्यों न लगे हाथों कांग्रेस के कद्दावर नेता से भी इस संदर्भ में चर्चा हो जाये। अचानक जेहन में कांग्रेस के साथ स्वाधीनता के पूर्व से जुडे परिवार के एक राष्ट्रीय नेता का चेहरा उभर आया जिसे राष्ट्रीयस्तर पर सत्यवृत चतुर्वेदी के रूप में जाना जाता है।

श्री चतुर्वेदी ने विधानसभा से लेकर लोकसभा, राज्यसभा तक में अपनी विद्वता का झंडा फहराया है। उनसे फोन पर सम्पर्क किया। उन्होंने अपनत्व भरे शब्दों में न केवल स्वीकारोक्त दी बल्कि मिलने की इच्छा भी जाहिर की। भाजपा के खेमें से निकलकर दूसरी ओर रुख किया। यह अलग बात है कि किन्हीं कारणों से श्री चतुर्वेदी की नाराजगी पार्टी से चल रही है और पार्टी में चल रहे हाशिये पर भेजने की प्रक्रिया भी समानान्तर ही है। उनकी मौजूदगी फार्म हाउस में थी। सो कुछ समय बाद हम उनके साथ गुनगुनी धूप में प्रकृति की छांव तले बैठे थे। हमने वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर चर्चा छेड दी। उनके पुत्र नितिन चतुर्वेदी ने भी मध्यप्रदेश की राजनगर सीट से कांग्रेस का टिकिट न मिलने पर सपा के बैनर तले चुनाव लडा था। इसी कारण सत्यवृत चतुर्वेदी को कांग्रेस में अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौर से गुजरना पड रहा है। दुर्भाग्य से उनके पुत्र की पराजय हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि राजनगर में किस तरह 25 नवम्बर के बाद कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों ने धनबल से चुनाव को ललच के घेरे में ले लिया। जिस प्रत्याशी को उसके विरोधी ही 25 नवम्बर के पहले 10 हजार से अधिक मतों से विजयी होने की आशंका जता रहे हों, वह चुनाव हार जाये।

यह सब पैसे का कमाल है और हमने कभी अपने सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया, सो बेटा हार गया। भाजपा और कांग्रेस दौनों ही प्रत्याशियों ने जमकर पैसा लुटाया। मौके की नजाकत भांपते हुए हमने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के साथ उनके जुड जान की संभावना पर प्रश्न दाग दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि अखिलेश हमारे लिए पुत्रवत है। उसे जब आशीर्वाद की जरूरत होगी, हम अवश्य देंगे। तभी नौकर ने आकर कुछ और लोगों के काफी देर से मुलाकात की प्रतीक्षा के संदर्भ ने जानकारी दी। सो हमने भी ज्यादा देर अवरोध न बनते हुए पुनः लम्बी चर्चा की आश्वासन लेकर उनसे विदा ली। कुल मिलाकर आरोपो-प्रत्यारोपों, मंथन-चिन्तन और सफलता-असफलता के विश्लेषणों का दौर चल रहा है जिसका परिणाम निकट भविष्य के चुनावों में देखने को अवश्य मिलेगा। इस बार बस इतना ही। अगले हफ्ते एक नये मद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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