फ्लाप-शो साबित हुआ पाँच दिवसीय किसान मेला
| Rainbow News - Dec 24 2018 3:56PM

मेला में खाली पड़ी रहीं कुर्सियाँ, किसानों की अनुपस्थिति बनी चर्चा का विषय 

अम्बेडकरनगर। पूर्वांचल के प्रसिद्ध ऐतिहासिक गोविन्द साहब मेले में आयोजित पाँच दिवसीय किसान मेला महज औपचारिक रहा। इस आयोजन में लाखों रूपए के बन्दरबांट किए जाने की चर्चा जोरों पर है। इस बार के किसान मेला आयोजन में किसानों की उपस्थिति ना के बराबर रही, जिसके बारे में कहा जाता है कि प्रचार-प्रसार व जागरूकता के अभाव में ऐसा हुआ। परिणाम यह रहा कि पाँच दिवसीय किसान मेला में नाम मात्र किसान पहुँचे और इसके उद्देश्य का लाभ उठा पाए। यह किसान मेला 16 दिसम्बर 2018 को गोविन्द साहब मेला के उद्घाटन अवसर पर प्रारम्भ हुआ था। 

चर्चा है कि जिले के कृषि महकमे द्वारा आयोजित किसान मेला में जबरिया लाए गए तथाकथित किसानों के अलावा अन्य किसानों को कृषि विभाग से सम्बन्धित कोई लाभ नहीं मिल सका। बताया जाता है कि कागजी कोरम पूरा करके मेला में पहुँचने वाले श्रद्धालुओं व दर्शनार्थियों से हस्ताक्षर कराकर उन्हें किसान दर्शा कर आंकड़े ठीक किए गए और रूपयों की बन्दरबांट की गई। पारम्परिक किसान मेला/कृषि मेला में किसानों की संख्या के अनुपात में नाश्ता, जल-पान एवं भोजन पैकेटों के अलावा अन्य व्यवस्थाओं का ब्योरा तैयार कर लिया गया।

किसान सम्मान मेला में लूट-खसोट और बन्दरबांट काहे की होगी : रामदत्त बागला

उप कृषि निदेशक रामदत्त बागला

किसान मेला में लगे स्टाल शुरूआत से लेकर समापन अवधि तक खाली ही पड़े रहे। मेला उद्घाटन के दिन थोड़ी-बहुत संख्या में व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किए गए अथवा विभागीय कर्मचारियों के मित्र अनुरोध पर किसान बनकर पहुँचे लोगों के अलावा जिले के वास्तविक किसानों का कहीं अता-पता ही नहीं था। स्टाल में भीड़ को कौन कहे इक्का-दुक्का कर्मचारियों के अलावा और कोई नहीं दिखा। किसानों के लिए लगी कुर्सियाँ उनके इन्तजार में खाली ही पड़ी रही।

सूत्रों के अनुसार कृषि महकमे के कर्मचारियों द्वारा मेलार्थियों व श्रद्धालुओं को जबरिया बैठाकर उनसे हस्ताक्षर करवाया गया। अपुष्ट जानकारी के अनुसार पाँच दिवसीय किसान मेला में 1300 से अधिक किसानों का पंजीयन दर्शाया गया है। दवा एवं अन्य कई यन्त्रों की बिक्री कागज में दिखा कर खानापूर्ति की गई है। वास्तविकता क्या है यह जाँच का विषय है। जोरदार चर्चा है कि उक्त किसान मेला में कम्बल वितरण का भी प्रलोभन देकर महिलाओं को जुटाया गया, और जब वास्तविकता का पता लगा तो नाराज महिलाएँ किसान मेला आयोजकों को भला-बुरा कहते हुए वहाँ से खाली हाथ चलती बनीं। सूत्रों के अनुसार कई महिलाओं ने यह भी बताया कि कृषि विभाग के कुछ कर्मचारियों ने रैली के बहाने उन्हें किसाना मेला परिसर में बुलाकर भीड़ जुटाया। 

इस तरह पाँच दिवसीय पारम्परिक किसान मेला/कृषि मेला जिसका आयोजन कृषि महकमे द्वारा महात्मा गोविन्द साहब मेला परिसर में किया गया था वह महज औपचारिक ही रहा। जिसे फ्लाप शो कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। मेला को कागजों में भले ही सफल दिखा दिया गया हो परन्तु वास्तविकता यह है कि किसानों को इसकी भनक ही नहीं लगी।

ऐसा क्यों हुआ.....और यह बात मीडिया की सुर्खियों में कैसे आ रहीं हैं इस बावत जब उप कृषि निदेशक रामदत्त बागला से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह आयोजन तो किसानों के सम्मान के लिए था। किसान सम्मान मेला में लूट-खसोट और बन्दरबांट काहे की होगी? यह चर्चा कहाँ से आ गई और मीडिया में क्यों उछाली जा रही है मुझे नहीं पता। 



Browse By Tags



Other News