सरकारी दावे और गंदगी व प्रदूषण का साम्राज्य
| Rainbow News - Dec 26 2018 3:19PM

                 निर्मल रानी/ देश की जनता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले की प्राचीर से होने वाला उनका प्रथम संबोधन ज़रूर याद होगा जिसमें उन्होंने स्वच्छता अभियान की 'शुरुआत' करने की घोषणा करते हुए यह वादे किए थे कि महात्मा गांधी  की 2019 में होने वाली 150वीं जयंती तक देश के प्रत्येक गली-मोहल्ले, गांव-शहर, स्कूल, मंदिर-अस्पताल आदि समस्त क्षेत्रों में हम गंदगी का नाम-ो-निशान नहीं रहने देंगे। ऐसा ही एक वादा यह भी था कि देश के प्रत्येक घर में शौचालय बनाए जाएंगे ताकि खुले में शौच करने की समस्या से निजात पाया जा सके। और तीसरा प्रमुख वादा यह भी था कि सांसदों तथा विधायकों द्वारा आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत् गांव को गोद लिया जाएगा तथा इसका विकास सुनिश्चित किया जाएगा। कुछ ही समय बाद 2019 के लोकसभा चुनाव पुन: होने जा रहे हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री के वादों व संकल्पों के पूरा होने या न होने पर एक नज़र ज़रूर डाली जाए।
                दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2 अक्तूबर 2014 को गांधी जयंती के अवसर पर शुरु किया गया स्वच्छ भारत अभियान कोई नया या अद्भुत अभियान था ही नहीं। सर्वप्रथम 1986-1999 के मध्य केंद्र सरकार द्वारा इस अभियान को केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के नाम से शुरु किया गया था। इसे संपूर्ण स्वच्छता अभियान भी कहा जाता था। 2012 में इसी संपूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम बदलकर निर्मल भारत अभियान कर दिया गया था। और 2014 में इसी अभियान को स्वच्छ भारत अभियान का नाम देकर भाजपा ने इसे अपने शोर-शराबे व भरपूर मार्किटिंग के अपने विशेष अंदाज़ के साथ कुछ इस प्रकार से शुुरू किया व इसका प्रचार किया गोया देश में कोई सरकार पहली बार स$फाई के लिए कुछ करने जा रही है। इसी अभियान के तहत देश के विभिन्न राज्यों में प्रत्येक शहरी घरों में सरकार द्वारा प्लास्टिक के दो टब रखवाए गए जिनमें सूखा व गीला कूड़ा अलग-अलग डालने का निर्देष दिया गया तथा इस 'सरकारी टब' से कूड़ा इक_ा करने हेतु बाकायदा ठेके पर सफाई कर्मचारी भर्ती किए गए। यह कर्मचारी ठेले व रेहड़ियों पर घर-घर जाकर कूड़ा इक_ा करते तथा सरकार द्वारा निर्धारित किसी स्थाई या अस्थाई ठिकाने पर डालते। यहां से कूड़े की छंटाई कर उसे नष्ट करने हेतु अन्य स्थानों पर भेजा जाता।
                नगरपालिकाओं व नगर निगमों द्वारा घर से कूड़ा उठाने वाले इन अस्थाई कर्मचारियों को तन्$ वाह देने हेतु प्रत्येक शहरी नागरिक पर अधिक अधिभार भी लगा दिया गया जो प्रत्येक वर्ष गृह कर शुल्क के साथ वसूला जाता था। कुछ दिनों तक तो नियमित रूप से हर घर का कूड़ा इक_ा किया गया। गली में कूड़ा एकत्रित करने वाले कर्मचारी दरवाज़े पर आकर सीटी बजाते व कूड़ा इक_ा कर ले जाते। परंतु सरकार की उदासीनता या लापरवाही के चलते संभवत: स्वच्छता अभियान से जुड़ी यह योजना अब दम तोड़ने लगी है। गत् कई माह से हरियाणा के अंबाला जैसे कई शहरों में घरों से कूड़ा उठाए जाने वाले कर्मचारियों ने उनकी तन्$ वाहें न मिलने की वजह से कूड़ा उठाना बंद कर दिया है। परिणामस्वरूप एक बार फिर गली-मोहल्ले के लोग अपने आस-पास के पड़े $खाली प्लाटों पर कूड़ा फेंकने लगे हैं। ज़ाहिर है प्रत्येक घर से निकलने वाले कूड़े-करकट में सबसे अहम हिस्सा पॉलिथिन की थैलियोंं,पौलिथिन अथवा प्लास्टिक के पाऊच व इसी प्रकार की दूसरी पैकिंग का ही होता है। विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा पॉलिथिन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद अभी भी देश के अधिकांश हिस्सों में दुकानदारों द्वारा पॉलिथिन की थैलियां सरेआम ग्राहकों को दी जा रही हैं। कूड़े के रूप में $खाली प्लाटों पर पड़ी यही थैलियां कभी नगरपालिका के कर्मचारियों द्वारा तो कभी मोहल्ले के ही किसी व्यक्ति द्वारा इक_ी कर जला दी जाती हैं। ज़रा सोचिए कि सर्दी एवं धुंध के इस वातावरण में ज़हरीला धुंएं का मिश्रण आम लोागेां के स्वास्थय पर कितना दुष्प्रभाव डालेगा? यदि आप नगरपालिका कर्मचारी से इन पॉलीथिन में आग लगाने हेतु मना करिए तो उसका जवाब यह होता है कि यदि यह थैलियां जलाई नहीं गई तो हवा चलने पर यह पुन: सड़कों पर आ जाती हैं और नालियों को जाम कर देती हैं।
                इसी प्रकार कई शहरों में प्रात:काल अथवा सांध्य काल के समय इन्हीं स$फाई कर्मचाररियों द्वारा जो कूड़ा इक_ा किया जाता है उसे भी इकट्टा करने के साथ ही आग के हवाले कर दिया जाता है। इस प्रकार शहरी क्षेत्रों में सुबह व शाम दोनों समय इस प्रकार के ज़हरीले धुंए चारों ओर फैले दिखाई देते हैं। गोया एक ओर तो सरकार प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के संबंध में तरह-तरह के प्रवचन देती है। सैकड़ों करोड़ रुपये की बंदरबांट इसी अभियान के नाम पर हो जाती है। अभियान से संबंधित मशीनों व अन्य सामग्रियों के आपूर्तिकर्ता ठेकेदार तथा इस अभियान की देख-रेख हेतु निर्धारित किए गए नेताओं के प्रियजन अपनी व अपनी आगामी पुश्तों के लिए तो बहुत कुछ बना डालते हैं परंतु एक कूड़ा उठाने वाला स$फाई कर्मचारी अपनी मेहनत के पैसे समय पर नहीं हासिल कर पाता। और नतीजा फिर वैसा का वैसा यानी जैसे पहले कूड़ा-करकट व इसकी दुर्गंध सड़कों-गलियों व $खाली प्लाटों में फैली रहती थी उसी प्रकार की स्थिति दोबारा भी पैदा हो गई है।
                यदि देश में इस प्रकार के स्वच्छता अभियानों का कुछ भी प्रभाव हुआ होता तो आज देश में डेंगु, चिकनगुनिया, इंसेलाईटिस, कालाजार तथा जापानी बुखार जैसी और भी कई बीमारियां न फैलतीं या इनमें का$फी कमी आ गई होती। परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और यदि कुछ हुआ तो यही कि सरकार ने देश की जनता के हज़ारों करोड़ रुपये इस प्रकार की योजना पर तथा इस योजना के प्रचार-प्रसार व शोर-शराबे पर $खर्च कर डाले। और स्वच्छता का बहुत बड़ा आदर्श बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनकी पार्टी के छुटभैय्यों तक ने हाथों में झाड़ू पकड़ कर सा$फ-सुथरी ज़मीन पर झाड़ू चलाते हुए अपनी $फोटो ज़रूर खिंचवा ली। आज अधिकांश देश में उसी प्रकार के ्रंगंदगी के ढेर व प्रदूषण युक्त वातावरण देखा जा सकता है। दरअसल नगरपालिाका व नगर निगम के लोगों द्वारा कूड़ा जलाए जाने के पीछे जो तर्क दिया जाता है कि यदि उन्होंने इस कचरे को जलाया नहीं तो यह हवा से उड़कर पुन: गलियों व नालियों में चला जाएगा, यह तर्क बिल्कुल सही है। परंतु इसका समाधान केवल यही है कि जैसे ही स$फाई कर्मचारी कूड़ा इक_ा करे उसी समय एक कूड़ा इक_ा करने वाले वाहन से उस कूड़े को उठाकर निर्धारित स्थानों पर पहुंचा दिया जाए। परंतु नगरपालिका या नगर निगम की मशीनरी इतनी तत्परता नहीं दिखा पाती।
                यही स्थिति प्राय: नाली व नाले आदि की स$फाई के समय भी नज़र आती है। जब स$फाई कर्मचारी अपनी पूरी मेहनत से किसी नाले व नाली का गीला कचरा निकाल कर नाले के बाहर इक_ा करते हैं तो वह कई दिनों तक नालियों के किनारे ही पड़ा रहता है और बदबू फैलती रहती है। यदि उस कचरे के उठने से पहले बारिश आ जाए तो वही गंदगी दोबारा नाली में वापस चली जाती है। और कर्मचारियों की सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। यहां भी सफाई कर्मचारी यही कहता है कि इस गीले कीचड़नुमा कचरे को सूखने के बाद उठाया जाएगा। अब चाहे इसके सूखने में कितने ही दिन क्यों न लगें। सरकार की इन्हीं असफल योजनाओं तथा इन्हें कार्यान्वित किए जाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं का ही नतीजा है कि सरकार के लाख दावों व प्रचारों के बावजूद अभी भी गंदगी व प्रदूषण का साम्राज्य पूर्ववत् बना हुआ है।



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