सियासी फसल बनते अन्नदाता
| Rainbow News - Jan 4 2019 3:13PM

            -पीयूष चतुर्वेदी/ सनातनी संस्कृति की पृष्ठभूमि वाले देश की तीन चौथाई अर्थव्यवस्था की रीढ़ अन्नदाता हैं। दूसरे शब्दों में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है कृषि व कृषि आधारित व्यवसाय,परन्तु आज़ादी के सात दशक की दीर्घावधि बीतने के बावजूद न तो सियासी दलों के कृत्यों से इनके हालात बदले और न ही कृषि आज तक फायदेमंद व्यवसाय में तब्दील हो पायी।सिर्फ सियासी दलों के नुमाइंदों ने चुनाव दर चुनाव इन्हें इकाई मान आपकी जीत का फलसफा किसानों को बना दिया और तकरीबन हर चुनाव में अपनी सियासी फसल काटते रहे सियासतदां। इसका जीवंत उदाहरण है पाँच राज्यों के हालिया सम्पन्न हुये आम चुनाव जिनके केंद्रबिंदु रहे अन्नदाता। समूचे चुनाव के दौरान अन्नदाताओं पर केंद्रित लोक लुभावने तस्वीर की तामीर करते दिखे राजनेता, तो एक बार फिर चुनाव बाद ठगे से महसूस कर रहे हैं स्वयँ को अन्नदाता। धान का कटोरा कहे जाने वाले प्रांत छत्तीसगढ़ के किसान तो सियासी नारों से इतने प्रभावित हुए कि मतदान तक खेतों में हंसिया चलाना भी उन्हें मुनासिब नहीं लगा और उन्होंने बेतहाशा उपज की कीमतों में वृद्धि के सब्ज़बाग से ही  प्रभावित होकर सत्ता की दिशा ही बदल डाली।

प्रश्न उठना लाज़मी है कि सत्ता की दिशा दशा तय करने का माद्दा रखने वाले अन्नदाताओं की दशा-दिशा, आज़ादी से आजतक  आख़िर क्यों नही बदली जा सकी।यक्ष प्रश्न यह है कि जिनके कंधे पर कदम रखकर सियासतदां नित सफलता के नये सोपान तय करते हैं आखिर वह क्यों आज भी अपनी उपज का स्वामी नहीं बन पाया और लाख-पचास हज़ार रुपये का आज भी कर्ज़दार व मोहताज क्यों है?  सीमेंट, सरिया से लेकर समस्त औद्योगिक उत्पादन रुपी उपज की कीमतें तय करने का अधिकार उसके उत्पादनकर्ता यानि स्वामी को है और बाज़ार का रुख व दर भी स्वयं वह ही निर्धारित करता है।परंतु कृषि उपजों के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया इससे इतर है। यूरिया, डीएपी, मज़दूरी,बीज यानि लागत तय करने का अधिकार सरकार के पास है क्योंकि इन पर नियंत्रण सरकार का विशेषाधिकार है

इतना ही नही कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करने का अधिकार सरकार का है और इसी न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दर पर कृषि उपज को बाज़ार के बिचौलियों द्वारा  ख़रीदकर किसानों का आर्थिक शोषण किया जाता है।निरीह की श्रेणी में पहुँच गये देश के किसानों का कोई पुरसाहाल नहीं है यद्यपि इन्हीं की उपज रुपी पूँजी से बिचौलिये लाखों-करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा कर रहे हैं और किसानों की स्थिति दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही है।किसान क्रेडिट कार्ड जैसी महत्वाकांक्षी योजनायें भी भष्ट्राचार की भेंट चढ़ चुकी हैं क्योंकि इस खाते की रकम का बड़ा अंश तो भ्रष्टाचार की दीमक आज भी चट कर रहा है और अन्नदाता भ्रष्ट सरकारी तंत्र में बझकर कर्ज़दार की कतार में खड़ा हो जाता है। यहीं से शुरु होता है कर्ज़दार, बेबश किसान को सियासी फ़सल बनाने का अंतहीन व घृणित सियासी खेल।जिसके दाग सभी सियासी दलों के दामन पर लगे हैं फर्क महज़ इतना भर है किसी के ज्यादा तो किसी के कम।छत्तीसगढ़, राजस्थान व मध्यप्रदेश तो सिर्फ बानगी मात्र है पूरा सियासी क्षितिज ही इसकी स्याहता की कालिख से इस कदर काला हो चुका है कि वास्तविक तश्वीर ही धुंधली हो चली है।

फसल बीमा योजना तो व्यवस्था से जुड़े चंद लोगों को ही लाभान्वित कर रही है परंतु अंकुरित फसल को चरने के लिये नीलगाय,बनरोज से लेकर सियासी सांड़ तक कमोवेश हर ज़मीन पर तत्पर हैं।यद्यपि किसानों को इस बात का मलाल नहीं है कि साँड़ यानी गोवंश उनके फसलों को चट कर रहे हैं क्योंकि आस्थावान किसान भी हैं परंतु छुट्टा गोवंश उनकी फसल रुपी पूँजी के लिए समस्या बन चुके हैं  जिनका अतिशीघ्र समाधान अति आवश्यक है। किसानों की उपज पर लागत मूल्य में उत्तरोत्तर वृद्धि समय के साथ-साथ होती गयी,परन्तु लागत मूल्य के सापेक्ष कीमतों में वृद्धि के असंतुलन ने किसानी को ही फायदेमंद व्यवसाय बनने से रोक दिया।सरकारी तंत्र का अनावश्यक हस्तक्षेप व भष्ट्राचार भी इसकी एक मुख्य वजह है मसलन ग्रामीण क्षेत्रों में बिना सुविधाशुल्क दिये सरकारी बैंको से कर्ज़ा प्राप्त करना,एक असम्भव सरीखा लक्ष्य बन गया है।

इतना ही नहीं कृषि महकमे द्वारा दी जा रही छूट भी अपनों को उपकृत करने का जरिया बन गया,तो बिचौलियों ने इस छूट को भी व्यवसाय में तब्दील करने में कोई कोताही नहीं बरती।नहरों की कटान,प्राकृतिक आपदाओं  ने भी कोढ़ में खाज जैसे हालात उत्पन्न कर दिये।यही नहीं मुआवजा की जटिल प्रक्रिया व नाकाफ़ी मुआवज़े की धनराशि भी अन्नदाताओं के लिए कम सरदर्द नहीं।योजनायें बनने,मूर्त रूप धारण करने व क्रियान्वयन के तरीके में लगने वाली दीर्घावधि के चलते योजना अपने उद्देश्यों से भटक जाती है।सरकार का आशय कितना भी भावपूर्ण हो परन्तु व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के बिना इसका लाभ जरूरतमंद तक सही तरीके से पहुंचाना असम्भव है।इतना ही नहीं सियासी दलों की मंशा भी सत्ता प्राप्ति के पूर्व व पश्चात परिवर्तित होती रहती है।यह तो तयशुदा है कि यदि सियासी दलों का मंतव्य अन्नदाताओं के प्रति विकासपरक रहा होता तो आज़ादी के सात दशक बीतने के बावजूद न तो किसान आत्महत्या करते और न ही उन्हें विकास का झुनझुना भरे चुनावी जुमलों को सुनना पड़ता।

आखिर विकास का पहिया क्यों इतनी मन्द गति से चलायमान है कि देश पर सर्वाधिक समय तक राज करने वाले दलों को भी अन्नदाताओं की आय बढ़ाने का सब्जबाग दिखाना पड़ रहा है।इस मसले का राजनीतिकरण तो सियासी दलों ने बाखूबी किया परन्तु यदि थोड़ी सी भी नियत साफ करके ईमानदारी से अन्नदाताओं की दशा सुधारने का जतन किया होता तो शायद आज सियासी क्षितिज का केंद्रबिंदु देश के किसान नहीं होते,बल्कि उनकी प्रगति व उपलब्धियां होतीं।न्यूनतम समर्थन मूल्य यूँ तो केंद्र सरकार ही तय करती है परंतु सियासी मूल्य सभी दल तय करके किसानों को एक बार फिर छलने को तत्पर हैं।इतना ही नहीं कर्जमाफी की सियासत से किसानों को सिर्फ पंगु बना रहे सियासी दलों का यह आत्मघाती कदम देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए भी घातक साबित होंगी।किसानों के प्रति सियासी दलों का अतिवाद उनकी दशा तो शायद ही सुधार पाये, इतना तो तयशुदा है कि सियासी दलों की उपज किसान अवश्य बन गये हैं। जिसे चुनाव दर चुनाव सियासी दल काट रहे हैं और इसकी बलिवेदी पर देश के अन्नदाता कटकर तबाह हो रहे हैं।



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