बदलते भारत की तस्वीर के बीच विकास की बाट जोहता एक शहर... 
| Rainbow News - Jan 5 2019 12:02PM

-डॉ. स्वयंभू शलभ/ चलिये नव वर्ष के मौके पर चंपारण के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए थोड़ा चिंतन करें कि विकास के इस दौर में आजादी के 71 वर्ष बाद भी हमारे सीमाई शहर रक्सौल का हाल क्या है और हम कहां हैं...आज हमें यह समझना भी जरूरी है कि विकास केवल मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा एक शब्द मात्र नहीं है और विकास का मतलब केवल मूलभूत सुविधाओं का होना मात्र नहीं है। विकास हमारे व्यवहार और नियमों के प्रति सम्मान में भी दिखाई देना चाहिए।  सरकार बदल जाती है लेकिन प्रशासन तंत्र वही रहता है। उसकी कार्य प्रणाली में परिवर्तन नहीं होता। समस्याओं को एक टेबल से दूसरे टेबल पर सरका देने से समाधान नहीं मिल सकता। पदाधिकारी जबतक आम लोगों की पीड़ा को समझकर मजबूत इच्छाशक्ति के साथ कदम नहीं बढ़ाएंगे तबतक समाधान की राह नहीं खुलेगी।

मेरा मानना है कि केवल सरकार, व्यवस्था या जन प्रतिनिधियों को दोषी ठहराकर विकास की बात करना उचित नहीं। वे अपना काम करें या न करें। हम भी तो अपना काम नहीं कर रहे। हम भी तो सोये हुए हैं। हमें अपने क्षेत्र, अपने गांव, अपने शहर की बदहाली से कोई फर्क नहीं पड़ता... जरा इस शहर की नब्ज टटोलें... अंतरराष्ट्रीय महत्व का यह शहर समस्याओं का शहर बन कर रह गया है... बीते वर्षों में देश में बहुत कुछ बदला लेकिन इस शहर की सूरत नहीं बदली... वर्षों से जर्जर पड़े स्टेशन रोड का काम आधा अधूरा छोड़कर ठेकेदार गायब है... मुख्य सड़क टूट रही है... सरिसवा नदी प्रदूषित है... शहर के नाले जाम पड़े हैं...सड़क पर कूड़े कचरे का अंबार है... शहर की जल निकासी की कोई सही व्यवस्था नहीं है...

रक्सौल में क्लिंकर की उतराई बंद होने के बाद दूसरे तरह के डस्ट मेटेरियल स्टेशन मालगोदाम पर बाकायदा उतारे जा रहे हैं... प्रदूषण के कारण लोगों का जीना आज भी मुहाल है... ओवरब्रिज निर्माण कार्य और मैत्री पुल का मरम्मत कार्य अधर में लटका है, संबंधित मंत्रालय और विभाग की फाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल पर घूम रही हैं, नहर रोड निर्माण कार्य शुरू होने की बाट जोह रहा है... आईसीपी चालू हो जाने के बाद भी भारी वाहनों की आवाजाही शहर से होकर पूरी तरह बंद नहीं की गई...कोई देखने सुनने वाला नहीं है...कितना दर्द गिनाया जाय...एक जगह हो तो बता दें कि दर्द इधर होता है... कैसी विडंबना है कि इन बुनियादी आवश्यकताओं के लिए भी आम लोगों को आंदोलन पर उतरना पड़ता है... समय समय पर जन समस्याओं को उठाना और व्यवस्था की कमी कमजोरियों को बताते हुए सरकार और चुने हुए नुमाइंदों से सवाल पूछना भी जरूरी है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गलत लोगों की सक्रियता समाज को उतना बरबाद नहीं करती जितना सही लोगों की निष्क्रियता समाज को बरबाद करती है।

हम जिस भी क्षेत्र में कार्यरत हैं या जिस भी व्यवसाय से जुड़े हैं अपनी आवाज उठाकर व्यवस्था में सुधार का प्रयास कर सकते हैं। सकारात्मक सोच के साथ हम जितना भी परिवर्तन ला सकें वही देन होगी हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए... परिवर्तन की बातें करने के बजाय कई बार आगे बढ़कर स्वयं उदाहरण बनना पड़ता है। तब जाकर परिवर्तन का बीज पनपता है। यह चंपारण सत्याग्रह की भूमि है और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज इस सीमाई क्षेत्र के लोगों को यह आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद भी यह सीमांचल विकास की मुख्य धारा में शामिल क्यों नहीं हो पाया... आखिर क्यों ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व होने के बावजूद यह क्षेत्र उपेक्षित पड़ा रहा... आखिर क्यों यहां राजनैतिक और सामाजिक संकल्प शक्ति का अभाव बना रहा...

महात्मा गांधी ने जो लौ यहां के लोगों के दिलों में जलायी वह समय के साथ मद्धिम कैसे पड़ गई... यहां के लोग उस सत्याग्रह को कैसे भूल गए... कैसे यह क्षेत्र विकास की मुख्य धारा में जुड़ेगा... कैसे हमारी सरकार और हमारे जन प्रतिनिधि इसके सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध होंगे... कैसे इस क्षेत्र के विकास की लंबित योजनाएं पूरी होंगी...कैसे यहां की ज्वलंत समस्याओं का समाधान होगा... आज इस नव वर्ष के हर्षोल्लास के बीच इस विषय पर भी विमर्श किये जाने की आवश्यकता है। इस नगर के गौरव को पुनर्स्थापित करने और इसे स्वच्छ, सुंदर और समृद्ध बनाने के लिए सरकारी, गैर सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थानों के साथ हरेक व्यक्ति को अपनी भूमिका और अपनी जवाबदेही तय करनी होगी...



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