कर्जमाफी बढ़ा रही मुफ्तखोरी की आदत
| Rainbow News - Jan 7 2019 12:52PM

-प्रियंका वरमा माहेश्वरी/ भारतीय राजनीति में बदलाव की हवा चलती रहती है। अब तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत से कयास लगाया जा रहा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में राहुल और विपक्षी दल दमखम के साथ दाखिल होंगे। इन चुनाव परिणामों के मद्देनजर भाजपा को 2019 में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। वैसे ये हार भाजपा के लिए एक चुनौती भी है कि आने वाले समय में वो विपक्ष को कमजोर न समझे।

कांग्रेस द्वारा कर्ज माफी की घोषणा कुछ समय तक जनता को फुसला तो सकती है, लेकिन लंबे समय तक राहत नहीं पहुंचा सकती है। वैसे भी बीते कुछ सालों में राजनीति में किसानों की कर्ज माफी के वायदों की बाढ़ सी आ गई है। राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार हो, किसानों के लिए सरकारी खजाने से पैसा देने में कोई सरकार पीछे नहीं रहती है, यदि इतनी तत्परता किसानों के मुद्दों को सुलझाने में दिखाई जाए तो किसानों की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। हालांकि रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि सरकारों की कर्जमाफी की नीति सही नहीं है और इससे बैंकों पर बुरा असर पड़ता है लेकिन इस टिप्पणी के बावजूद सरकारों पर कोई असर नहीं दिखाई देता है। हर साल किसानों को लोन मुहैया कराने का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है और ये आंकड़ा सालाना 10 करोड़ के ऊपर पहुंच गया है लेकिन इन आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि मूल रूप से कितने किसानों को इसका फायदा मिल रहा है कि नहीं? लगातार बढ़ते हुए कर्ज़ों के कारण बैंकों में फंसे कर्ज यानी एनपीए का स्तर बढ़ रहा है।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कर्ज माफी यदि किसानों का समाधान होती तो इसकी जरूरत बार-बार क्यों पड़ रही है? गौरतलब है कि कर्नाटक में किसानों का असंतोष कम नहीं हो रहा है और यही हालत महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के किसानों की भी है। कर्जमाफी से तत्काल राहत तो मिल जाती है लेकिन स्थाई लाभ नहीं मिलता है। सरकारों का ध्यान सिंचाई सुविधाओं, बीज, उर्वरक, ग्रामीण सड़कों और बिजली आपूर्ति की ओर क्यों नहीं जाता? दूसरी बात यह भी है कि कर्ज माफी द्वारा मुफ्त खोरी की आदत को बढ़ावा मिल रहा है। गांव में एक ऐसा वर्ग बढ़ता जा रहा है जो कर्ज माफी की घोषणाओं को ध्यान में रखकर कर्ज लेता है और इस योजना का लाभ उठाता है। सत्ता सुख के लिए ये राजनीतिक दल देश की अर्थव्यवस्था और उसके भविष्य को ताक पर रख देते हैं। किसान और देश को नजरअंदाज कर देते हैं। किसान वाकई में आज सिर्फ एक चुनावी जीत का मोहरा भर बनकर रह गया है।

हालांकि भाजपा की हार लोगों की नाराजगी का नतीजा है। लोगो की रसोई में खाना कम बनेगा तो कोई भी राम मंदिर से खुश नहीं होगा। लोगों को रोजगार चाहिए और जीने के लिए सर्व सुलभ सुविधाएं चाहिए। आर्थिक मुद्दे, किसान, खेती के मुद्दे, युवाओं को रोजगार के मुद्दे, महंगाई जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जब तक सरकार विचार नहीं करेगी तब तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकती। सिर्फ वायदों से सरकार नहीं चलती फिर वो सरकार चाहे कोई भी हो।



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